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मूर्तिकला में पीएचडी कर रहीं महासमुंद की तृप्ति खरे, हाल ही में मिला गोल्ड मेडल
15-Feb-2026 7:58 PM
मूर्तिकला में पीएचडी कर रहीं महासमुंद की तृप्ति खरे, हाल ही में मिला गोल्ड मेडल

पशुओं में अधिक भाव भंगिमाएं-चुहल होती हैं जो मन तो एकदम निर्मल कर देती हैं-तृप्ति

उत्तरा विदानी
महासमुंद, 15 फरवरी (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। महासमुंद की तृप्ति खरे वर्तमान में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ में मूर्तिकला विषय में पीएचडी कर रही हैं। वे जिले की ऐसी विद्यार्थी हैं जिन्होंने मूर्तिकला में मास्टर्स करने के बाद शोध कार्य प्रारंभ किया है। हाल ही में उन्हें मास्टर्स डिग्री के दौरान गोल्ड मेडल प्राप्त हुआ।
तृप्ति ने एक वर्ष का फाउंडेशन कोर्स तथा चार वर्ष का बैचलर कोर्स पूरा करने के बाद मूर्तिकला में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की। वर्तमान में उनके शोध कार्य का मार्गदर्शन प्रोफेसर एस.पी. चौधरी कर रहे हैं।
 गणित से कला तक का सफर
तृप्ति ने कक्षा 12वीं तक की पढ़ाई गणित विषय के साथ केंद्रीय विद्यालय, महासमुंद से की। वे बताती हैं कि विद्यालय में पढ़ाते समय शिक्षक उपेन्द्र देवांगन की पेंटिंग से प्रेरित होकर उन्होंने कला के क्षेत्र में आगे बढऩे का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने खैरागढ़ विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर मूर्तिकला को अपना विषय चुना।
तृप्ति के पिता बंधु राजेश्वर खरे जिला पशु चिकित्सालय, महासमुंद से सेवानिवृत्त हैं। परिवार के अनुसार बचपन से ही तृप्ति का रुझान पशुओं की ओर रहा। वे बताती हैं कि पशुओं की भाव-भंगिमाएं उन्हें आकर्षित करती हैं, इसलिए उनकी अधिकांश कृतियां पशु आकृतियों पर आधारित हैं।
मूर्तिकला पर दृष्टिकोण
तृप्ति का कहना है कि मूर्तिकला एक त्रि-आयामी कला है, जिसमें ऊंचाई, चौड़ाई और गहराई के आयाम होते हैं। वे फाइबर, लकड़ी, प्लास्टर ऑफ पेरिस और मिट्टी जैसी सामग्रियों से मूर्तियां तैयार करती हैं। उनके कार्यों में मानव आकृतियों के साथ-साथ पशु आकृतियां भी प्रमुख हैं।
वे आगे चलकर शिक्षण कार्य से जुडऩा चाहती हैं, ताकि अधिक विद्यार्थी इस कला विधा से जुड़ सकें।
 परिवार का समर्थन
पिता राजेश्वर खरे का कहना है कि प्रारंभ में उन्हें आश्चर्य हुआ था कि तृप्ति ने विज्ञान पृष्ठभूमि के बावजूद मूर्तिकला को चुना, लेकिन बाद में उन्होंने बेटी के निर्णय का समर्थन किया। माता संगीता खरे बताती हैं कि तृप्ति बचपन से ही रचनात्मक गतिविधियों में रुचि रखती थीं।
 माता संगीता खरे कहती हैं कि दो बेटियों में तृप्ति छोटी बेटी है। उसे बचपन से ही पशुओं से पहुत प्रेम था। घंटों उनके साथ खेलती रहती थीं। पिता जब पशुओं का इलाज करते तो तृप्ति उन पर खास निगरानी रखतीं।
तृप्ति की बनाई मूर्तियां उनके घर में प्रदर्शित हैं, जिनमें पशु और मानव आकृतियां शामिल हैं। उनके अनुसार कला के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्त करना उनके लिए महत्वपूर्ण है।
तृप्ति से ‘छत्तीसगढ़’ की हुई बातचीत में उन्होंने दोहराया कि मूर्तिकला भारतीय उपमहाद्वीप में हमेशा से कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रिय माध्यम रही है। बताया कि मूर्तिकला एक त्रि-आयामी कलाकृति है जिसे भौतिक रूप से ऊंचाई, चौड़ाई और गहराई के आयामों में प्रस्तुत किया जाता है। चित्रकला में यह खूबियां नहीं मिलतीं। यह प्लास्टिक कलाओं में से एक है। मूर्तिकला एक कलात्मक विधा है जिसमें कठोर या लचीली सामग्रियों को त्रि-आयामीकला वस्तुओं में ढाला जाता है। इसकी डिज़ाइन स्वतंत्र वस्तुओं, सतहों पर उभरी हुई आकृतियों या दृश्यों से लेकर दर्शक को घेरने वाले परिवेशों तक विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं। उन्होंने फाइबर, लकड़ी, प्लास्टर आफ पैरिस, मिट्टी आदि से अनेक मूर्तियां बनाई हैं जो जीवंत हैं।  
हालांकि तृप्ति ने एक बेढंगे से पत्थर को मानव का आकार देकर उसे जीवंत किया है जैसे उस मूर्ति का अंग-अंग मानो बोल उठेंगी। फिर भी तृप्ति का कहना है कि इस कला को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षक बनना चाहती हैं। ताकि अनेक हाथ इस कला में माहिर हो सकें।
तृप्ति का कहना है कि पशुओं में अधिक भाव भंगिमाएं-चुहल होती हैं जो मन तो एकदम निर्मल कर देती हैं। इंसानों में ऐसा नहीं होता। इंसान अपनी भावनाओं को छिपाता है। इसलिए अधिकांश मूर्तियां पशुओं की बनाती हैं। घर में उनकी बनाई एक महिला की बड़ी मूर्ति जो किसी वाहन का इंतजार कर रही हैं। एक बकरी है जो मुंह ऊपर उठाकर मिमिया रही है। लकड़ी की एक बिल्ली है जो मुंह ऊपर करके ऐसे देख रही है जैस सचमुच कोई बिल्ली आपके सामने हो। सभी पात्रों की भाव भंगिमा एकदम जीवंत हैं। परछी में उनकी बनाई एक आकृति है जिसमें दो कुत्ते हैं,एक प्लास्टर आफ पपैरिस से बनी सफेद बिल्ली है, लकड़ी से बने कुछ मानव चेहरे हैं। एक ने कैप लगा रखा है। लहींपास में ही लकड़ी का एक कुत्ता सोया हुआ है लेकिन चौकन्ना है और आवाज देते ही मानों दौड़ पड़ेगा। ऊंचे कद काठी की लकड़ी से तराशी गई एक महिला है जो सर्पकी तरह दिखती हैं उनकी खाल किसी सांप की तरह केंचुली वाली है। इस तरह तृप्ति की मूर्तिकला की अलग दुनिया है, जो हमें जीवन की गहराई तक ले जाती हैं।


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