महासमुन्द

अधिकार छीन लिए गए हैं, अछूतों जैसा व्यवहार हो रहा...
13-Feb-2022 1:29 PM
अधिकार छीन लिए गए हैं, अछूतों जैसा व्यवहार हो रहा...

मामले में कलेक्टर-अफसर मौन  

एक कमरे में बैठकर लड़ाई अकेले लड़ रहे हैं बोदले

  भ्रष्ट्राचार की जांच की मांग को ले अनशन पर बैठे थे 
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद, 13 फरवरी।
बीते दिनों व्यापमं की परीक्षा में अपनी दुपहिए से ड्यूटी जा रहे महिला बाल विकास अधिकारी सुधाकर बोदले आज लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित राज्य लोक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में कहीं नहीं दिखे। पिछली बार उन्हें दुपहिए में देखकर शहर के लोग हैरान रह गए थे। ‘छत्तीसगढ़’ ने आज उनसे पूछ लिया..सर आप आज भी दुपहिए में ड्यूटी नहीं पहुंचे हैं? उन्होंने जो बताया उसे शहर के साथ-साथ जिले के लोगों को भी मालूम होना चाहिए। उन्होंने कहा-मुझे जिला प्रशासन की ओर से सिर्फ एक दिन के लिए एक वाहन मिला था।

आज मेरी ड्यूटी नहीं लगाई गई, न जाने क्यों? पिछली बार मैंने उक्त वाहन का उपयोग नहीं किया।
मैं जिले का अधिकारी हूं, मुझे अपने विभाग के दौरे के लिए वाहन नहीं मिलता। मेरी सारी सुविधाएं मुझसे छीन ली गई है। बैठक तक में मुझे शामिल नहीं किया जाता। इसलिए केवल एक दिन का दिखावा क्यों करता? अपनी जिम्मेदारी मैं खुद पूरी कर रहा हूं। इससे जुड़े सवालों के जवाब देने वाले जिले के कलेक्टर, जिम्मेदार अफसर, राज्य के विभागीय अफसरों की बोलती बंद है। किसी भी अफसर ने इससे जुड़े सवालों का जवाब नहीं दिया। मान लेते हैं कि जिले के कलेक्टर नए हैं, लेकिन बाकी अफसर तो सभी पुराने हैं और विभागीय अव्यवस्था के खिलाफ श्री बोदले के अनशन के वक्त से चुप्पी साधे हुए हैं।    

गौरतलब है कि सुधाकर बोदले वही अफसर हैं, जिन्होंने दो साल पहले अपने ही विभाग के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर आंदोलन किया था। उस वक्त उन्होंने थोड़ी बहुत विभागीय कार्रवाई के बाद अनशन वापस ले लिया था। उसके बाद से उसके सारे अधिकार छीन लिए गए हैं। श्री बोदले के साथ जिला प्रशासन अछूत जैसे व्यवहार कर रही है। हालांकि नए कलेक्टर के आने के बाद उन्हें परीक्षा आदि की ड्यूटी में शामिल किया गया लेकिन आज आयोजित परीक्षा में उन्हें फिर से शामिल नहीं किया गया है।
जिला प्रशासन इस अफसर से भले ही कोई काम न ले लेकिन सुुधाकर बोदले आज भी हर सुबह ठीक दफ्तर के समय पर अपनी कक्ष में पहुंच जाते हैं। इसी उम्मीद से कि आज उनका वनवास खत्म होगा और उन्हें कुछ काम की जिम्मेदारी मिलेगी। लेकिन हर रोज न तो उन्हें बैठक में आमंत्रित किया जाता है, और न ही किसी तरह के शासकीय कार्यक्रम में। हर माह नियत तारीख पर उनका वेतन मिल जाता है। महिला और बच्चों की सेहत के लिए कई तरह की उम्दा जानकारी रखने वाले अफसर एक कमरे में बैठकर अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहे हैं, उनकी सारी योग्यता इसी कमरे में व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने जैसी गलती के कारण दफन हो रही है।  

‘छत्तीसगढ़’ को सुधाकर बोदले द्वारा कलेक्टर डोमन सिंह को लिखा एक पत्र हाथ लगा है। इस पत्र में श्री बोदले ने लिखा है-राज्य सरकार में अपने 8 वर्ष की शासकीय सेवा में मैंने 3 जिलों में आप सहित 8 कलेक्टर के  साथ कोआर्डिनेट के रूप में काम किया है। मेरी हमेशा कोशिश रही कि लोकहित में अपने कार्यदायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करूं।

लोक सेवा में मेरा आचकण, मेरी निष्ठा और ईमानदारी खुली किताब की तरह है। पूर्व कलेक्टरों ने मेरी कार्यनिष्ठा को एप्रीसिएट किया। उन सभी से मेरा समन्वय बहुत अच्छा रहा। यह तो मेरा दुर्भााग्य ही रहा कि यह समन्वय आपके साथ नहीं हो पाया। मेरी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और साफगोई के कारण अन्य कलेक्टर के मन में एक विशेष स्थान बनाने में मैं सफल रहा, परंतु आपके घृणा का पात्र क्यूं बन गया, इसका कारण मुझे आज भी ज्ञात नहीं है। मेरे विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने पर आपके द्वारा मुझसे अछूतों जैसा व्यवहार किया जाने लगा है। वर्ष 2021 में मुझे जिला प्रशासन के ग्रुप से रिमूव कर दिया गया। 17 अगस्त 2021 की समय सीमा की बैठक मैं महिला बावल विकास विभाग के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित थी, सभी अफसरों के सामने आपने कहा कि मैं तुमसे बात नहीं करूंगा। 24 अक्टूबर 2021 को जिला प्रशासन एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित ई मेगा कैंप में विभागीय योजनाओं का प्रस्तुतिकरण से मुझे मना किया गया।
 

1 नवम्बर 20221 को राज्य स्थापना दिवस के दिन शासन द्वारा संचालित परीक्षाओं की तैयारी लगने वाली कक्षा के नवीन बैच में उपस्थिति देने और उद्बोधन के दौरान ही आपने जिला शिक्षा अधिाकरी से कहा कि ये यहां कैसे आ गया? आपके कहने पर स्वागत सूची से मेरा नाम हटा दिया गया। इसके अलावा धान खरीदी, विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पर्यवेक्षक इत्यादि की जिम्मेदारी मेरे जिला कार्यक्रम अधिकारी पद पर रहते हुए भी नहीं दी गई। आपने सुनिश्चित किया कि मुझे कोई भी जिम्मेदारी न देकर पूरी तरह आइसोलेट कर दिया जाए। मुझे पूर्व में मेरे दायित्वों और पद की गरिमा के अनुरूप मुझे शासकीय वाहन आबंटित किया गया था उसकी वापसी पर भी कई आवेदनों के बाद आपने कोई विचार नहीं किया।
अपने साथ हुए इस व्यवहार से विगत 9 महीने से मैं उसी पीड़ा से गुजर रहा हूं, जिस पीड़ा से कोई अछूत भेदभाव किए जाने कतेबाद गुजरता है। किसी ईमानदार और कर्तव्यष्ठि अधिकारी के लिए यह सबसे बड़ी सजा है कि उसे पूरी तरह आईसोलेट करके काम से वंचित कर दिया जाए।
 

 


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