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क्या भूख और कुपोषण भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है
15-Dec-2020 7:14 PM
क्या भूख और कुपोषण भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है

photo credit raviprakash


"क्या भारत भूखे लोगों, कुपोषित बच्चों और एनीमिया से पीड़ित महिलाओं का देश बनता जा रहा है? क्या पिछले छह साल के नरेंद्र मोदी शासन के दौरान देश में सामाजिक सुरक्षा और भोजन की उपलब्धता के मामले में लापरवाही हुई है? क्या सरकारी सुविधाओं में आदिवासियों, दलितों और वंचित समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है?"


नई दिल्ली, 15 दिसंबर | इन सवालों का जवाब 'हां' में दिया जा सकता है. इसका आधार हैं राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर हाल ही में जारी तीन विश्वसनीय रिपोर्टें, जिनमें से एक 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे' (एनएफएचएस) रिपोर्ट खुद भारत सरकार ने जारी की है. इस रिपोर्ट का पहला भाग 12 दिसंबर की शाम जारी किया गया था.

बाकी दो रिपोर्टों में से एक 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स' (जीएचआई) अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में जारी की गई. इसकी मान्यता पूरी दुनिया में है. इसे जर्मनी और आयरलैंड की दो नामी संस्थाएं संयुक्त तौर पर हर साल जारी करती हैं.

तीसरी रिपोर्ट है 'हंगर वॉच', जो भारत में काम कर रहे 'भोजन का अधिकार अभियान' (राइट टू फूड कैंपेन) ने पिछले सप्ताह जारी की है.

इन तीनों रिपोर्टों का सारांश यह है कि विश्व शक्ति बनने की चाह रखने वाले भारत में भूख आज भी सबसे बड़ी चिंता है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स -2020

इस वैश्विक सूचकांक में भारत का स्कोर 27.2 है. यह स्थिति गंभीर स्तर की मानी जाती है. दुनिया के 107 देशों में हुए इस सर्वेक्षण में भारत 94वें नंबर पर है, सूडान के साथ.

अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में भारत से कमज़ोर पाकिस्तान (88), नेपाल (73), बांग्लादेश (75) और इंडोनेशिया (70) जैसे देशों को हंगर- इंडेक्स में भारत से ऊपर जगह मिली है. मतलब ये कि वहां हालात भारत से बेहतर हैं.

हंगर-इंडेक्स में चीन दुनिया में सबसे संपन्न 17 देशों के साथ पहले नंबर पर है. अफ़ग़ानिस्तान, नाइजीरिया और रवांडा जैसे गिनती के कुछ देश ही इस सूचकांक में भारत से पीछे हैं.

हंगर-वॉच की रिपोर्ट

भारत के 11 राज्यों में सर्वेक्षण के बाद राइड टू फूड कैंपेन ने यह रिपोर्ट जारी की है. इसमें साल 2015 के बाद से अब तक भूख से कथित तौर पर हुई कम से कम 100 मौतों का भी ज़िक्र किया गया है.

रोज़ी-रोटी अधिकार अभियान के कार्यकर्ताओं ने झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के 3,994 लोगों से बातचीत कर यह रिपोर्ट तैयार की है. इनमें शहरी और ग्रामीण दोनों आबादी को शामिल किया गया था.

इस सर्वे में दावा किया गया है कि लॉकडाउन के दौरान भारत के कई परिवारों को कई-कई रातें भूखे रह कर गुज़ारनी पड़ीं. इनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था. यह स्थिति क़रीब 27 फीसदी लोगों की थी.

लॉकडाउन से पहले जिन 56 प्रतिशत लोगों को रोज़ खाना मिलता रहा, उनमें से भी हर सात में से एक को सितंबर-अक्तूबर के महीने में अक्सर या कभी-कभी ही खाना नसीब नहीं हुआ.

क़रीब 71 प्रतिशत लोगों के भोजन की पौष्टिकता में लॉकडाउन के दौरान कमी आई. इनमें से 40 फीसदी लोगों के भोजन की गुणवत्ता काफ़ी ख़राब रही. दो-तिहाई लोगों के भोजन की मात्रा में कमी आई. 28 फीसदी लोगों के भोजन की मात्रा लॉकडाउन के बाद काफ़ी कम हो गई है.

45 फीसदी लोगों को खाने का इंतज़ाम करने के लिए कर्ज़ लेना पड़ा. यह हालत सिर्फ निम्न आय वर्ग के लोगों की नहीं रही. 15,000 रुपये या इससे अधिक की मासिक आमदनी वाले 42 प्रतिशत लोगों को भी इस दौरान पहले की अपेक्षा अधिक कर्ज़ लेना पड़ा.

कर्ज़ लेने वाले लोगों में दलितों की संख्या सामान्य जातियों के लोगों से 23 फीसदी अधिक थी. हर चार दलितों और मुसलमानों में से एक और क़रीब 12 प्रतिशत आदिवासियों को रोटी के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ा.

इस सर्वे से यह भी पता चला है कि लॉकडाउन समाप्त होने का बावजूद आर्थिक संकट जारी है. उस दौरान नौकरी गंवाने वाले अधिकतर लोगों को दोबारा नौकरियां नहीं मिल सकी हैं. लोगों ने स्कूलों से अपने बच्चों के नाम तक कटवा लिए हैं.

लॉकडाउन के दौरान खाने का इंतज़ाम करने के लिए लोगों को अपने गहने और दूसरी संपत्तियां भी बेचनी पड़ी है. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (पीजीकेवाई) में घोषित उपाय नाकाफ़ी रहे और कई लोगों का कहना है कि इसमें उन्हें शामिल ही नहीं किया गया.

हालांकि, लॉकडाउन के दौरान पीडीएस से मुफ्त मिले अनाज, मिड डे मील योजना के तहत मिले सूखा राशन और आंगनबाड़ी केंद्रों से मिली खाद्य सामग्री से लोगों को कुछ राहत ज़रूर मिली.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे

भारत सरकार द्वारा 22 राज्यों में कराए गए इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि देश में कुपोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. महिलाओं में एनीमिया की शिकायत आम है और बच्चे कुपोषित पैदा हो रहे हैं.

इस कारण पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की लंबाई 13 राज्यों में सामान्य से कम है. 12 राज्यों में इसी उम्र के बच्चों का वजन लंबाई के मुताबिक नहीं है.

यह सर्वे असम, बिहार, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, कर्नाटक, मिज़ोरम, केरल, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, हिमाचल प्रदेश, लक्ष द्वीप, दादरा एवं नगर हवेली और महाराष्ट्र आदि राज्यों के 6.1 लाख परिवारों के साथ किया गया.

सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक़, उम्र की तुलना में कम लंबाई वाले बच्चों की संख्या के मामले में बिहार 43 फीसदी हिस्सेदारी के साथ मेघालय के बाद देश में दूसरे नंबर पर है. गुजरात में यह आंकड़ा 39 फीसदी है.

मतलब, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में बच्चों का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है. वे कुपोषित हैं. इस कारण उनमें लंबाई कम होने की शिकायत है. उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों की संख्या बिहार में सबसे अधिक 22.9 फीसदी है.

हालांकि, शिशु मृत्यु दर के मामले देश के अधिकतर राज्यों में कम हुए हैं. इसकी वजह टीकाकरण बताई गई है, लेकिन भूख और कुपोषण की स्थिति अभी चिंतनीय स्तर पर है.

भारत की यह हालत क्यों है?

मशहूर अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ मानते हैं कि भारत की इस हालत के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियां ज़िम्मेदार हैं. उन्होंने कहा कि कुपोषण और भूख के मामले में देश की हालत ख़राब होने के बावजूद भारत सरकार को इसकी चिंता है, ऐसा नहीं लगता.

ज्यां द्रेज ने बीबीसी से कहा, "नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे से पता चलता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में पिछले चार-पांच साल में बच्चों के पोषण के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है. लॉकडाउन में यह हालत और ख़राब हुई होगी. हंगर-वॉच का सर्वे बताता है कि 76 फीसदी लोग अब कम खा रहे हैं. लॉकडाउन में उनकी हालत ख़राब हुई है. इसके बावजूद भारत की मौजूदा सरकार मिड-डे मील और आइसीडीएस जैसी योजनाओं का बजट लगातार कम कर रही है. जबकि ये योजनाएं कुपोषण और भूख से लड़ाई में मददगार हैं."

ज्यां द्रेज के मुताबिक़, "दरअसल इस सरकार की विकास की समझ उल्टी है. यह सरकार सिर्फ़ आर्थिक वृद्धि को ही विकास मानती है, जबकि विकास का मतलब यह नहीं है. आर्थिक वृद्धि और विकास में काफी फ़र्क है. विकास का मतलब यह भी है कि किसी देश में प्रति व्यक्ति आय या उसकी जीडीपी बढ़े, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, डेमोक्रसी, सामाजिक सुरक्षा की हालत में भी सुधार हो."

"भारत में अभी ऐसा नहीं हो रहा है. यह संपूर्ण विकास नहीं है. हंगर वॉच और एनएफ़एचएस के सर्वे दरअसल एक 'वेकअप-काल' है. लेकिन दुख की बात यह है कि न सरकार और न ही मुख्यधारा का मीडिया इस पर ध्यान दे रहा है. इस कारण भारत में भूख और कुपोषण जैसी समस्याओं का समाधान नहीं निकल पा रहा है."

तारा पड़हिया की कहानी

इस मसले को तारा पड़हिया की कहानी से समझिए. तारा झारखंड के लातेहार जिले के मनिका प्रखंड के रांगीकला गांव में रहती हैं. इनका नाता आदिम जनजाति (पीटीजी) से है. वे लुप्तप्राय पड़हिया जनजाति की हैं. इनके लिए कई सरकारी योजनाएं चल रही हैं. इसके बावजूद तारा के घर में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता नहीं है.

हंगर-वॉच सर्वे के शोधकर्ताओं ने अपने सर्वे के दौरान इनसे भी बातचीत की थी. तब उन्होंने भोजन को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी. 14 दिसंबर को जब मैंने उनसे बातचीत की, तो वे खुश थीं. उन्होंने मूली की सब्ज़ी और भात बनाया था. घर के लोगों ने यह खाना भरपेट खाया और खुश हो गए. क्योंकि, लॉकडाउन के दौरान उन्हें कई बार भरपेट भोजन नहीं मिल सका था.

उन्हें इसका दुख नहीं था कि उनके खाने में दाल या मांस जैसी चीजें शामिल नहीं हैं. वे रोज़ ऐसा ही खाना खाती हैं, जिसमें भात के साथ सब्जी या साग होता है. दाल, मांस, घी, दूध, फल या दूसरी पौष्टिक चीजें उनके भोजन में शामिल नहीं है. उन्होंने बताया कि ऐसी चीजें उन्हें कभी-कभार ही मिल पाती हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "अभी धान काटे हैं इसलिए चावल की कमी नहीं है. छह लोगों का परिवार है. कोई नौकरी नहीं करता है. अभी अनाज है, तो खा रहे हैं. जब नहीं रहेगा, तब भूखे भी सो जाएंगे."

भूख और कुपोषण को लेकर आए इन तीन सर्वेक्षणों के बीच तारा पड़हिया भारत की वास्तविक स्थिति का सजीव उदाहरण हैं.(bbc.com)


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