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-श्रुति मेनन
कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ किसानों का प्रदर्शन जारी है. पंजाब समेत कई रज्यों के किसान इन क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं. अन्य राज्यों से लगने वाली राजधानी दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर किसान एक सप्ताह से अधिक वक़्त से डटे हुए हैं.
कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे किसानों का मानना है कि ये नया क़ानून उनके हित में नहीं है और इससे उनकी आजीविका पर बुरा असर पड़ेगा.
एक ओर जहां किसानों का दावा है कि यह प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्वक संचालित हैं वहीं सोशल मीडिया पर कई पार्टियों और लोगों द्वारा प्रदर्शन से जुड़ी कई तरह की ग़लत सूचनाएं भी शेयर की जा रही हैं.
भ्रम पैदा करने वाले कुछ ऐसे ही ग़लत दावों की बीबीसी ने पड़ताल की है.
कमला हैरिस ने सार्वजनिक तौर पर किसानों के प्रदर्शन का समर्थन नहीं किया

सोशल मीडिया पर एक फ़र्जी पोस्ट का स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है. जो अमरीका की नव-निर्वाचित उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस से जुड़ा हुआ है.
फ़ेसबुक पर शेयर हो रहे इस फ़ेक स्क्रीनशॉट के मुताबिक़, कमला हैरिस ने भारत में चल रहे किसानों के प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया है.
इस फ़र्जी स्क्रीन शॉट में लिखा है, "नए क़ानून का विरोध कर रहे किसानों का भारत सरकार जिस तरह से दमन कर रही है उसे देखकर हम आश्चर्यचकित हैं. इस नए क़ानून से उनकी आजीविका ख़तरे में पड़ जाएगी. भारत सरकार को वाटर कैनन और आंसू गैस के इस्तेमाल के बजाय किसानों के साथ खुलकर बात करनी चाहिए."
लेकिन फ़ेसबुक ने इस पोस्ट पर गड़बड़ी के तहत वॉर्निंग दी है. कमला हैरिस किसानों के प्रदर्शन को लेकर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की है. ना ही उन्होंने अपने पर्सनल अकाउंट पर कोई टिप्पणी की है और ना ही किसी दूसरे अकाउंट पर.
जब बीबीसी ने उनकी मीडिया टीम से इस बारे में जानकारी मांगी तो उन्होंने हमें बताया कि, यह फ़ेक है.
कनाडा के एक सांसद जैक हैरिस ने 27 नवंबर को भारत में विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों का समर्थन करते हुए ट्वीट किया था. यह ट्वीट हूबहू वैसा ही है जो कमला हैरिस के ट्वीट के तौर पर शेयर किया जा रहा है और जिसे कमला हैरस की मीडिया टीम ने फ़ेक बताया है.
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने किसानों के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस की ओर की गई कार्रवाई पर सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की थी. कनाडा में भारतीय मूल की एक बड़ी आबादी रहती है.
ट्रूडो की टिप्पणी पर भारत सरकार ने नाराज़गी ज़ाहिर की थी और कहा था कि उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं.
पुरानी तस्वीर को लेकर हुआ विवाद

भारतीय सोशल मीडिया पर एक ट्वीट शेयर किया जा रहा है जिसमें कुछ सिख भारत प्रशासित कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. तस्वीर के साथ दावा किया गया है कि ये बीते दस दिनों से जारी किसान प्रदर्शनों से जुड़ी तस्वीर है.
इस ट्वीट को अब तक 3,000 बार री-ट्वीट किया गया है जबकि इसे 11,000 से अधिक लाइक्स मिले हैं. इसे प्रीति गांधी ने भी री-ट्वीट किया है जो सत्ताधारी बीजेपी की महिला शाखा की सोशल मीडिया प्रमुख हैं.
इस पोस्ट पर जो कॉमेन्ट्स किए गए हैं उनमें दावा किया गया है कि किसानों के विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल निहित स्वार्थ वाले ऐसे समूह कर रहे हैं जिसका एजेंडा कश्मीर विवाद को हवा देना है या फिर पंजाब में सिखों के लिए अलग देश की मांग करना है.
बीबीसी ने इस तस्वीर के बारे में पड़ताल की और पाया कि दरअसल, ये तस्वीर साल 2019 के अगस्त महीने में पंजाब की राजनीतिक पार्टी शिरोमणी अकाली दल ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर साझा की थी.
ये तस्वीर बीते साल उस वक्त पोस्ट की गई थी जब भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने का फ़ैसला किया था. उस वक्त शिरोमणी अकाली दल समेत कुछ राजनीतिक पार्टियों ने सरकार के इस फ़ैसले का विरोध किया था.
तो, ये तस्वीर किसी तरह से मौजूदा किसान आंदोलन से जुड़ी नहीं है.
फर्क़ बताना मुश्किल
ऐसा नहीं है कि केवल बीजेपी नेता ही किसान आंदोलन से जुड़ी भ्रामक तस्वीरें शेयर कर रहे हैं.
कांग्रेस की युवा वाहिनी से जुड़े लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट और वरिष्ठ विपक्षी कांग्रेस नेताओं ने भी साल 2018 की तस्वीर को किसान आंदोलन की तस्वीर कह कर शेयर किया है.
अक्तूबर 2018 की इस तस्वीर में सड़कों पर लगे बैरिकेड्स देखे जा सकते हैं. तस्वीर में यहां बड़ी संख्या में लोग जमा हैं और पुलिस भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी क बौछारें कर रही है. इस तस्वीर को देख कर लगता है कि ये विरोध प्रदर्शन की तस्वीर है.
इस तरह की एक तस्वीर के साथ लिखे पोस्ट में कहा गया है कि सरकार किसानों के साथ ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे वो "आतंकवादी" हों.

हालांकि हाल के दिनों में पुलिस ने वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया है.
लेकिन जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैरती हुई आपकी नज़रों से गुज़रीं वो सभी इसी प्रोटेस्ट की नहीं हैं. इसमें से कुछ तस्वीरें किसी दूसरे विरोध की हैं. जो शायद एक या दो साल पुरानी हैं और उनकी जगह भी अलग है.
रिवर्स इमेज सर्च से पता चलता है कि उनमें से कुछ तस्वीरें उत्तर प्रदेश के किसानों के विरोध प्रदर्शन की हैं. साल 2018 में उत्तर प्रदेश के किसानों ने कर्ज़माफ़ी और कर्ज़ के भुगतान के लिए दिल्ली में मार्च किया था.
उत्तर प्रदेश के इन किसानों को राजधानी दिल्ली के पूर्व में उत्तर प्रदेश-दिल्ली के बॉर्डर के पास रोक दिया गया था. जबकि मौजूदा प्रदर्शन राजधानी दिल्ली के उत्तर में पंजाब-हरियाणा सीमा पर हो रहा है. हालांकि प्रदर्शन कर रहे कुछ किसान दिल्ली के बुराड़ी मैदान में भी मौजूद हैं.(https://www.bbc.com/hindi)


