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देश के उन राज्यों में अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम चल रहा है जहां इस बरस चुनाव होने हैं। इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ जैसे दूसरे कुछ राज्यों में भी यह अभियान चल रहा है। चुनाव के किसी काम के लिए जमीनी स्तर पर अलग से कर्मचारी नहीं रहते, इसलिए सबसे पहले शिक्षक-शिक्षिकाओं को इस काम में जोता जाता है, उसके बाद म्युनिसिपल या दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारियों को। पहली बार इस बड़े पैमाने पर इतनी जटिलता के साथ हो रहे इस काम में छोटे राज्यों में दसियों लाख वोटरों को नोटिस मिल रहे हैं, कि वे अपने कागजात साबित करें। बड़े राज्यों में ऐसे वोटरों की संख्या करोड़ों में जा रही है। एसआईआर नाम से चल रहे इस अभियान को सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दे दी गई, लेकिन वहां से कुछ मामूली शर्तों के साथ इसे जारी रखा गया है, इसलिए अब इस पर कोई कानूनी लड़ाई बची हुई नहीं है। जिन राज्यों में लोगों को नोटिस मिल रहे हैं, अगर वे चुनाव आयोग के निर्धारित दफ्तरों में जाकर अपने कागजात साबित नहीं कर पाएँगे, तो शायद उनका नाम मतदाता सूची से कट जाएगा। अभियान इतना बड़ा है कि किसी-किसी राज्य में इसमें लगे कर्मचारी काम के बोझ से हार्टअटैक से मर गए, ऐसा बताया गया, और कुछ जगहों पर कर्मचारियों ने लक्ष्य पूरा न होने की दहशत में खुदकुशी भी कर ली। हमने छत्तीसगढ़ में ही देखा है कि एक से अधिक बार तारीख बढ़ाई गई, क्योंकि काम पूरा होने का आसार नहीं दिख रहा था।
जिस देश में वोटरों का एक हिस्सा वोट डालने ही नहीं जाता है, या जाता है तो उसमें से कुछ लोगों को कोई उम्मीदवार या पार्टी पसंद नहीं रहते, इसलिए वे नोटा में वोट डालते हैं, ऐसे देश में जो लोग वोट डालते आए हैं, उनमें से जो सही मतदाता हैं, उनके नाम अगर कट जाएंगे, तो उन पर क्या गुजरेगी? और जिस तरह कानून के बारे में यह कहा जाता है कि उसकी आंखों पर पट्टी बंधी रहती है, मतदाता पुनरीक्षण के इस काम में भी चुनाव आयोग की आंखों पर पट्टी बंधी हुई है, और ऐसे-ऐसे लोगों के नाम कटने का खतरा झेल रहे हैं जिन पर देश को गर्व होना चाहिए। अब भारत में गिने-चुने लोग ही नोबल पुरस्कार विजेता हैं, और उनमें से एक, अमत्र्य सेन को नोटिस मिला है कि वे अपने कागजात साबित करें, क्योंकि उनकी और उनके माता-पिता की उम्र में फासला कुल 15 बरस का दिख रहा है। अब 92 बरस के अमत्र्य सेन को अपने मां-बाप की सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज उम्र से पर्याप्त फर्क न होने का जवाब मांगा जा रहा है। अमत्र्य सेन तो पढ़े-लिखे हैं, उन्हें मदद करने वाले लोग भी मिल सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में दसियों करोड़ लोग एकदम ही अनपढ़, गरीब, और बिना किसी मदद वाले हैं। दसियों लाख लोग बाढ़ से बेदखल होते हैं, करोड़ों लोग अपना घर छोडक़र दूर-दूर मजदूरी करने जाते हैं, और शायद आधी आबादी ऐसी गरीब होगी कि वह एक दिन का रोजगार छोडक़र चुनाव आयोग के दफ्तरों तक नहीं जा पाएगी। इससे हो सकता है कि देश में बसे हुए अवैध घुसपैठियों के नाम तो लिस्ट से कट जाएं, लेकिन उनके अलावा कई ऐसे हिन्दुस्तानी नागरिकों के नाम कटने का भी एक खतरा रहेगा, है, जिनके पास कागज कम हैं, या जो कागज दिखाकर साबित करने की हालत में नहीं हैं।
अब एक घटना जिसकी वजह से आज यहां लिखने की जरूरत पड़ रही है, वह कल रिटायर्ड एडमिरल अरूण प्रकाश की लिखी हुई एक ट्वीट है। जिसमें उनके घर पर तीन बार पहुंचे बीएलओ जितनी जानकारी लेकर गए, उससे भी चुनाव आयोग संतुष्ट नहीं है, और अब 82 बरस के एडमिरल को घर से 18 किलोमीटर दूर दफ्तर आकर अपने कागजात से अपनी नागरिकता साबित करने को कहा गया है। उनके साथ उनकी 78 बरस की पत्नी को दूर के इसी दफ्तर में एक दूसरी तारीख दी गई है। अब यह नाशुकरा देश इस बात को भूल रहा है कि भारतीय नौसेना के भूतपूर्व मुखिया रहे एडमिरल अरूण प्रकाश को 1971 के युद्ध के दौरान उनकी बहादुरी के लिए वीरचक्र दिया गया था। वे देश के सबसे बड़े विमानवाहक युद्धपोत विक्रांत के कमांडर रह चुके हैं। रिटायर होने के बाद वे दो बार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। इन सबके बाद भी आज उनके कागजात पूरे नहीं माने जा रहे, और उन्हें इस उम्र में चुनाव दफ्तर बुलाया जा रहा है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है- कि 20 बरस पहले रिटायर होने के बाद से उन्होंने आज तक किसी खास सेवा की मांग नहीं की, और न ही उन्हें कोई जरूरत है। लेकिन अब उनका और उनकी पत्नी का नाम चुनाव आयोग के नोटिस में है, और वे इसे पूरा करने के लिए भी जाएंगे। उन्होंने लिखा है कि बीएलओ तीन बार आकर उनसे जानकारी लेकर गए, और अगर कोई अतिरिक्त जानकारी चाहिए थी, तो उनसे मांग सकते थे। उसके बाद भी अब 82 और 78 बरस के दो नागरिकों को 18 किलोमीटर दूर के दफ्तर में दो अलग-अलग तारीखों पर बुलाया जा रहा है।
जिस देश में बात-बात पर फौज को लेकर एक उन्माद खड़ा किया जाता है, उस देश में रिटायर्ड नौसेनाध्यक्ष के साथ, नोबल पुरस्कार विजेता के साथ इस तरह का बर्ताव हैरान करता है। जिस तरह कानून की आंखों पर पट्टी बंधी रहती है, चुनाव आयोग ने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। यह संपादकीय लिख रहे संपादक एक ही पते पर रहते हुए अपनी पत्नी सहित 1992 के बाद से हर चुनाव में उसी इलाके के मतदान केन्द्र पर वोट डालते आए हैं, लेकिन अभी कुछ हफ्ते पहले जब मतदाता सूची पुनरीक्षण कर रहे तीन कर्मचारी बैठकर इस परिवार के चार नाम जांच रहे थे, तो उनमें से तीन नामों का कोई रिकॉर्ड घंटों की मेहनत के बाद भी नहीं निकला, जबकि पुरानी वोटर लिस्ट से भेजे गए नोटिस सामने रखे हुए थे। जांच और पुनरीक्षण का जाने क्या तरीका है कि शाम से लेकर रात हो गई, और उसके बाद इन कर्मचारियों ने मेहनत करके किसी तरह इन तीन वोटरों को सही माना, जो कि एक ही पते पर रह रहे हैं, और हर चुनाव में लगातार वोट भी डाल रहे हैं।
अगर देश के नियमित वोटरों के नाम ऐसी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर कटने जा रहे हैं, तो क्या ऐसी नई लिस्ट के आधार पर चुनाव करवाना ठीक रहेगा, या फिर सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर कोई और रास्ता निकालना पड़ेगा? जिस तरह पुराने वोटर, दशकों से एक ही जगह बसे हुए लोग, हर तरह के दस्तावेज वाले लोगों में से भी बहुत से लोगों के नाम लिस्ट में फिलहाल नहीं दिख रहे हैं, उनका आगे जाने क्या होगा? और अगर चुनाव आयोग के लिए काम कर रहे कर्मचारियों के साथ चल रहे राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी पसंद से नामों को जुड़वा या कटवा रहे होंगे, तो फिर अगले चुनाव का जाने क्या होगा? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


