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नई दिल्ली, 25 नवंबर. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने अंतरधार्मिक विवाह को लेकर जारी घमासान के बीच मंगलवार को 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020' को मंज़ूरी दे दी है.
इस क़ानून के अनुसार 'जबरन धर्मांतरण' उत्तर प्रदेश में दंडनीय होगा. इसमें एक साल से 10 साल तक जेल हो सकती है और 15 हज़ार से 50 हज़ार रुपए तक का जुर्माना.
शादी के लिए धर्मांतरण को इस क़ानून में अमान्य क़रार दिया गया है. राज्यपाल की सहमति के बाद यह अध्यादेश लागू हो जाएगा.
उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह अध्यादेश ज़रूरी था.
उन्होंने कहा कि महिलाओं और ख़ास करके अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए यह एक ज़रूरी क़दम है.
सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा, "शादी के लिए जबरन धर्मांतरण के वाक़ये बढ़ रहे थे. ऐसे में यह क़ानून ज़रूरी था. 100 से ज़्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं. ये धर्मांतरण छल से और जबरन कराए गए हैं. यहां तक कि हाई कोर्ट ने भी आदेश दिया है कि जिन राज्यों में शादी के लिए धर्मांतरण हो रहे हैं वो अवैध हैं."
'अवैध धर्मांतरण'
योगी सरकार के इस अध्यादेश के अनुसार 'अवैध धर्मांतरण' अगर किसी नाबालिग़ या अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं के साथ होता है तो तीन से 10 साल की क़ैद और 25 हज़ार रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा.
अगर सामूहिक धर्मांतरण होता है तो सज़ा में तीन से 10 साल की जेल होगी और इसमें शामिल संगठन पर 50 हज़ार रुपये का जुर्माना लगेगा. इसके साथ ही उस संगठन का लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा.
धर्मांतरण जबरन नहीं है, छल से नहीं किया गया है और यह शादी के लिए नहीं है, इसे साबित करने की ज़िम्मेदारी धर्मांतरण कराने और धर्मांतरित होने वाले की होगी.
अगर कोई शादी के लिए अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता/चाहती है तो दो महीने पहले संबंधित ज़िले के डीएम के पास नोटिस देना होगा.
ऐसा नहीं करने पर 10 हज़ार रुपये का जुर्माना लगेगा और छह से तीन साल की क़ैद हो सकती है.
पिछले महीने ही 31 अक्टूबर को जौनपुर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था, "लव-जिहाद पर कड़ा क़ानून बनेगा."
योगी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की सिंगल बेंच जज के उस फ़ैसले का हवाला दिया था जिसमें शादी के लिए धर्मांतरण को अवैध बताया गया था.
हालाँकि बाद में इसी कोर्ट में दो जजों की बेंच ने इस फ़ैसले को क़ानून के लिहाज से ग़लत बताया था. इसी तरह के क़ानून बनाने की बात बीजेपी शासित मध्य-प्रदेश और हरियाणा की सरकारें भी कर चुकी हैं.
योगी सरकार के आरोप जाँच में कितने सही?
हालांकि एक दिन पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता बताते हुए इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप को ग़लत बताया था.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े एक मामले में लड़की के परिजनों की ओर से लड़के के ख़िलाफ़ दर्ज कराई गई एफ़आईआर को निरस्त कर दिया.
यूपी के कुशीनगर के रहने वाले सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार ने पिछले साल अगस्त में शादी की थी. विवाह से ठीक पहले प्रियंका ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था और अपना नाम बदल कर 'आलिया' रख लिया था.
प्रियंका के परिजनों ने इसके पीछे साज़िश का आरोप लगाते हुए सलामत के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी थी जिसमें उस पर अपहरण और जबरन विवाह करने जैसे आरोप लगाए थे. सलामत के ख़िलाफ़ पॉक्सो ऐक्ट की धाराएं भी लगाई गई थीं.
लेकिन पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने सारे आरोप हटाते हुए कहा कि धर्म की परवाह न करते हुए अपनी पसंद के साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार जीवन के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार में ही निहित है.
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर दो बालिग़ व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार और यहां तक कि सरकार को भी आपत्ति करने का अधिकार नहीं है.
यह फ़ैसला सुनाते वक़्त अदालत ने अपने उन पिछले फ़ैसलों को भी ग़लत बताया जिनमें कहा गया था कि विवाह के लिए धर्मांतरण प्रतिबंधित है और ऐसे विवाह अवैध हैं.
कानपुर का मामला
इससे पहले कानपुर ज़िले में अंतरधार्मिक विवाह के मामलों की जाँच के लिये गठित एसआईटी ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट कानपुर के पुलिस महानिरीक्षक को सौंप दी.
एसआईटी ने ऐसे कुल 14 मामलों की जाँच की जिनमें 11 मामलों में अभियुक्त आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाए गए लेकिन किसी भी मामले में साज़िश की बात सामने नहीं आई है.
कानपुर ज़ोन के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल ने बताया कि 11 मामलों में आरोप पत्र दाख़िल किया गया है और अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया गया है.
उन्होंने बताया कि नाबालिग़ लड़कियों को ग़लत नाम बताकर प्रेमजाल में फँसाने वाले अभियुक्तों पर बलात्कार, अपहरण और शादी के लिये मजबूर करने के आरोप भी लगाये गए हैं.
कुछ हिन्दूवादी संगठनों ने कानपुर में अंतरधार्मिक विवाह की घटनाओं को लेकर पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल से शिकायत की थी.
इनकी जाँच के लिये अपर पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में आठ सदस्यीय एसआईटी गठित की गई थी. (bbc)


