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-प्रवीण शर्मा
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की माँग भारत पिछले काफ़ी वक़्त से लगातार कर रहा है. भारत सुरक्षा परिषद में बतौर सदस्य अपनी दावेदारी भी रख रहा है और पिछले कुछ वक़्त से लगातार भारत इन सुधारों की माँग अलग-अलग मंचों से करता रहा है.
दुनिया के कई देश सुरक्षा परिषद में भारत को बतौर सदस्य शामिल करने के पक्षधर भी हैं, लेकिन इस बाबत अभी तक कोई ठोस क़दम उठाया नहीं गया है.
इस साल संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना के 75 साल पूरे कर रहा है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र में सुधारों और सुरक्षा परिषद के विस्तार को लेकर भारत का रुख थोड़ा आक्रामक दिखाई दे रहा है.
हाल के दिनों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई वरिष्ठ राजनयिक और मंत्री संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और सुधारों में इस संस्था की नाकामी को लेकर तल्ख टिप्पणियां भी कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की पहल को लेकर हालिया वक़्त में भारत का रवैया काफ़ी आक्रामक हुआ है.
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इसी कड़ी में सोमवार को संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि (पीआर यानी परमानेंट रेप्रेजे़ंटेटिव) टी एस तिरुमूर्ति ने एक कड़ी टिप्पणी की है. उन्होंने अपने संबोधन में कहा है कि 'संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद "एक ख़राब हो चुका अंग" बन गया है.'
PR T S Tirumurti @ambtstirumurti speaks at UNGA on Security Council reforms
— India at UN, NY (@IndiaUNNewYork) November 16, 2020
Calls for serious result-oriented process. Expresses support for Common African Position. Calls out “handful of countries” using the process as “smokescreen” to stop progress. @DrSJaishankar @MEAIndia ⤵️ pic.twitter.com/kBh2I4n5kj
उन्होंने कहा कि 'यूएनएससी प्रतिनिधित्व की कमी के चलते एक भरोसेमंद तरीक़े से काम करने में नाकाम रहा है.'
तिरुमूर्ति ने यह टिप्पणी यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के 75वें सत्र में अपने भाषण के दौरान की.
आईजीएन पर भी सवाल
दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के निदेशक प्रोफ़ेसर हर्ष पंत के अनुसार, भारत का आक्रामक रुख दिखने की दो वजहें हैं.
वे कहते हैं, "एक तो यह है कि भारत जनवरी से यूएन सिक्योरिटी काउंसिल के अस्थाई सदस्य के तौर पर अपना कार्यकाल शुरू करेगा. ऐसे में भारत इस बात को जताना चाहता है कि भले ही उसकी भूमिका को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती, लेकिन वह पूरी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभा रहा है."
"दूसरी वजह यह है कि भारत ये बताना चाहता है कि चीन सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य होने के तौर पर जिस तरह से डब्ल्यूएचओ समेत दूसरी संस्थाओं का शोषण कर रहा है, उसमें भारत जैसे देश को नजरअंदाज कराना ख़ुद यूएन की साख पर सवाल खड़ा करता है."
तिरुमूर्ति ने इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशंस फ़्रेमवर्क (आईजीएन) पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने बताया कि किस तरह से आईजीएन अभी तक कुछ भी महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने में नाकाम रही है.
आईजीएन देशों का एक ऐसा समूह है जो कि यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार करने के लिए काम करता है.
तिरुमूर्ति ने कहा, "सुधारों की ज़रूरत को लेकर बयानों को छोड़ दिया जाये तो गुज़रे एक दशक के दौरान आईजीएन में कुछ भी काम नहीं हुआ है."
सुधार के मसले
तिरुमूर्ति ने कहा कि 'भारत चाहता है कि सुधारों की दिशा में गंभीरतापूर्वक निष्कर्ष आधारित प्रक्रियाएं शुरू की जानी चाहिए.'
तिरुमूर्ति ने सुधारों की राह में अड़चन बन रहे चुनिंदा देशों को भी आड़े हाथों लिया.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा का मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार सक्रियता से सुरक्षा परिषद में सुधार के मसले को उठा रही है.
वे कहते हैं, "अब तक हम इंतज़ार करते थे कि कोई दूसरा देश कहे कि भारत एक बड़ा महान मुल्क़ है."
महापात्रा कहते हैं कि 'भारत का रुख कोई आक्रामक नहीं है, भारत को डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट पहले ही करना चाहिए था, जो नहीं हुआ. अब मोदी सरकार जोड़तोड़ से इस मसले पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है.'
भारत के स्थाई प्रतिनिधि टी एस तिरुमूर्ति
वे कहते हैं, "भारत की एक साख है कि उसे एक स्थाई सदस्य बनना चाहिए."
इसी साल अगस्त के आख़िर में भारत ने युनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (यूएनजीए) प्रेसिडेंट को चिट्ठी लिखकर सुरक्षा परिषद में सुधारों की दिशा में ठोस क़दम उठाने की माँग की थी. भारत ने कहा था कि 'इन सुधारों में एक दशक से ज़्यादा की देरी हो चुकी है.'
भारत की इस चिट्ठी में "कॉमन अफ़्रीकन पोज़िशन" का भी ज़िक्र किया गया था. इसमें यूएनएससी के विस्तार में अफ़्रीकी देशों की अभिलाषाओं का ध्यान करने की बात है.
इस चिट्ठी में भी भारत ने तल्ख सुर में पूछा था कि कौन इन सुधारों को नहीं चाहता है?
इसमें कहा गया था कि भारत इस वैश्विक संस्था को मज़बूत करने के लिए ठोस उपाय करने की माँग लगातार उठाता रहेगा.
In a letter to President of UN General assembly, India demands tangible action for UN Security Council reform in line with Common African Position, and not let the process be held hostage, as it has been over a decade, by those who do not want reform. pic.twitter.com/SJEMTZMLfz
— India at UN, NY (@IndiaUNNewYork) September 1, 2020
भारत का असंतोष
सितंबर के आख़िर में यूएन की 75वीं सालगिरह के मौक़े पर यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (यूएनजीए) को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, "यूएन की निर्णय करने वाली व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए भारत को कितना इंतज़ार करना पड़ेगा?"
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि रिफ़ॉर्म की बात भारत काफ़ी वक़्त से कर रहा है, लेकिन पीएम ने अपनी स्पीच में एक सीधा संदेश दिया था. उन्होंने भारत की राय को व्यक्त किया था कि लंबे वक्त से रिफ़ॉर्म की बात हो रही है, लेकिन इस पर कोई प्रगति नहीं हो रही. उन्होंने इसे लेकर भारत के असंतोष को ज़ाहिर किया था.
प्रोफ़ेसर महामात्रा कहते हैं कि युनाइटेड नेशंस में रिफ़ॉर्म होना एक जटिल प्रक्रिया है. इसके लिए कमेटी बनती है, सिफ़ारिशें तैयार होती हैं और इन पर वोटिंग होती है. इसके लिए सहमति होना ज़रूरी है.
वे कहते हैं, "सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनने की राह में भारत के सामने सबसे बड़ा रोड़ा चीन है. चीन नहीं चाहता कि भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बने. पाकिस्तान भी चीन पर दबाव बना रहा है."
उन्होंने कहा था कि भारत युनाइडेट नेशंस का एक संस्थापक सदस्य है और उसे इस पर गर्व है.
अक्तूबर में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि ऐसे मौक़े पर जबकि यूएन अपनी स्थापना की 75वीं सालगिरह मना रहा है, इस संस्था का बहुपक्षीय होना बेहद ज़रूरी है.
उन्होंने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के ग़ैर-स्थायी सदस्य के तौर पर भारत विकासशील देशों के हितों के लिए खड़ा रहेगा.
साल 2019 में यूएन में उस वक़्त के भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अक़बरुद्दीन ने कहा था कि "सदस्यता की कैटेगरी के मसले पर 122 में से 113 सदस्य देशों ने चार्टर में दर्ज दोनों मौजूदा कैटेगरीज़ में विस्तार को समर्थन दिया है."
भारत के रवैये में बदलाव
भारत का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र मौजूदा वक़्त की हक़ीक़त के मुताबिक़ ख़ुद को तब्दील नहीं कर पाया है.
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं कि यूएन का गठन 1945 में हुआ था. इस दौरान कई बदलाव आये. वे कहते हैं, "इतने वक़्त में दुनिया बहुत बदल गई है, लेकिन यूएन में इसके मुताबिक़ बदलाव नहीं आये हैं."
मौजूदा महामारी के दौर में दुनिया बड़ी चुनौती से गुज़र रही है. इसने भी शायद भारत समेत कई देशों को चिंतित किया है कि दुनिया की बड़ी संस्थाएं क्या अपनी भूमिका सही तरीके से निभा रही हैं या नहीं?
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं, "कोविड-19 महामारी ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के काम करने के तौर-तरीकों की कलई खोलकर रख दी है. भारत को लग रहा है कि मौजूदा चुनौतियों से निबटने में अगर ये संस्थाएं कारगर साबित नहीं हो पा रही हैं, तो आने वाले वक़्त में अगर कोई बड़ा संकट खड़ा होता है तो ये संस्थाएं कैसे काम करेंगी."
वे कहते हैं कि भारत इसी वजह से यूएन में रिफ़ॉर्म की माँग कर रहा है.
भारत कई वर्षों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए सक्रियता से कोशिशें कर रहा है. सुरक्षा परिषद में चीन को छोड़कर बाकी चारों स्थाई सदस्य भारत की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं.
सितंबर में ही विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत मौजूदा आईजीएन में सक्रियता से काम कर रहा है ताकि सुरक्षा परिषद में सुधार हो सके. उन्होंने कहा था कि भारत दूसरे हमख्याल मुल्क़ों के साथ भी इस दिशा में काम कर रहा है.
हालांकि, गुज़रे कुछ वर्षों में भारत के नज़रिये में एक शिफ़्ट आया है. पंत कहते हैं कि गुज़रे कुछ वर्षों में भारत के रवैये में जो बदलाव आया है वह काफ़ी दिलचस्प है.
वे कहते हैं, "भारत पहले अपनी आबादी, अपनी डेमोक्रेसी जैसी चीज़ें गिनाता था और कहता था कि हमें इसका सदस्य होना चाहिए. लेकिन, अब भारत अपनी डिमांड रखता है कि अगर हम यूएनएससी के सदस्य नहीं बनते तो यह यूएन की साख पर असर डालता है." (bbc.com)


