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-अनंत प्रकाश
भारतीय जनता पार्टी ने बिहार चुनाव में जीत के साथ ही पश्चिम बंगाल चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेता लगातार पश्चिम बंगाल में रैलियां कर रहे हैं.
बीजेपी का ध्यान सबसे पहले आदिवासी इलाक़ों में अपनी जगह बनाने पर है जहां उन्हें इससे पहले भी राजनीतिक समर्थन मिला था.
अमित शाह से लेकर बीजेपी के शीर्ष नेता इसी दिशा में आदिवासी इलाक़ों का दौरा कर रहे हैं.
Had delicious food for lunch at Shri Navin Biswas ji‘s home in Gauranganagar, Kolkata.
— Amit Shah (@AmitShah) November 6, 2020
Grateful to the Biswas family for being such a great host. Will always remember their love and affection that they have shown towards me. pic.twitter.com/A59GuopBEs
बीजेपी की ओर से ममता सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि राज्य सरकार ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया और केंद्र सरकार की ओर से भेजी गई मदद भी उन तक नहीं पहुंचने दी.
अमित शाह ने भी अपनी दो दिवसीय पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान एलान किया कि बीजेपी दो तिहाई बहुमत के साथ अगले साल विधानसभा चुनाव जीतने जा रही है. जबकि अभी पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीजेपी के विधायकों की कुल संख्या दस तक भी नहीं पहुंची है.
लेकिन पश्चिम बंगाल में बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा, “पड़ोसी राज्य बिहार में जो भगवा लहर दिखी है, वो पश्चिम बंगाल में टीएमसी को उड़ाकर रख देगी. इन दोनों राज्यों के चुनावों में बस एक अंतर है कि बिहार में हम 15 सालों से सत्ता में थे लेकिन यहां पर हम चुनौती दे रहे हैं.”

कई राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि बिहार चुनाव में जीत से पश्चिम बंगाल में कार्यरत आरएसएस काडर और बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है.
क्योंकि बीजेपी ने मात्र 110 सीटों पर चुनाव लड़कर 74 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की है.
लेकिन सवाल उठता है कि कार्यकर्ताओं का बढ़ा हुआ मनोबल अगले छह महीने में होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए कितनी सीटें ला पाएगा.
बीजेपी के लिए ख़ास है बंगाल
उत्तर भारत के तमाम राज्यों में परचम फहराने, जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार बनाने, और उत्तर-पूर्व के राज्यों में खाता खोलकर बीजेपी के मोदी-शाह युग ने मात्र छह सालों में बहुत कुछ हासिल कर लिया है.
लेकिन बीजेपी के लिए बिहार और पश्चिम बंगाल दो ऐसे राज्य थे जहां वह अपना जनाधार बनाने में नाकाम रही थी.
मगर बिहार चुनाव में बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी है. और अब बीजेपी के सामने बस पश्चिम बंगाल में टीएमसी का क़िला ढहाने की चुनौती है. लेकिन बीजेपी के लिए ये करना इतना आसान नहीं है.
साल 2016 में बीजेपी ने 291 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन बीजेपी कुल दस सीट भी नहीं जीत पाई थी.
ऐसे में बीजेपी के लिए बहुत ज़रूरी है कि वह पश्चिम बंगाल में अपने दम पर सरकार बनाए. पश्चिम बंगाल में एक शानदार जीत 2024 के आम चुनाव के लिहाज़ से भी अहम है.
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल मानते हैं कि बीजेपी के लिए ये राज्य जीतना भावनात्मक स्तर पर ज़रूरी है.

वो कहते हैं, “भाजपा बहुत सालों से पश्चिम बंगाल में अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रही है. भाजपा के शीर्ष नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो कि जनसंघ के जन्मदाता थे, उनके राज्य में भाजपा कुछ नहीं कर पाई. इसीलिए बीजेपी पहले भी पश्चिम बंगाल में जगह बनाने की बहुत कोशिशें कर चुकी है. लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में जब ‘जय श्री राम’ का नारा देकर पश्चिम बंगाल में बंगाली जनता का वोट भी बीजेपी को मिला तो इससे बीजेपी की महत्वाकांक्षा बढ़ गई है.
“लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति की तुलना बिहार की राजनीति से नहीं की जा सकती है. बिहार में राजनीतिक पसंद-नापसंद जाति के आधार पर तय होती है. लेकिन बंगाल में चूंकि भक्ति आंदोलन हुआ और यहां शिक्षा का स्तर ऊंचा है, ऐसे में यहां दलित भी ये सोच सकता है कि ऊंची जाति वाला व्यक्ति भी हमारे दर्द को समझेगा और उसके निवारण के लिए संघर्ष करेगा. इसी वजह से यहां जाति के आधार पर बनीं बसपा जैसी पार्टियों का उदय नहीं हुआ.“
कितना असर डालेगा ओवैसी फ़ैक्टर
बिहार चुनाव में सबसे कमज़ोर कड़ी बनकर उभरने वाली कांग्रेस ने एआईएमआईएम को वोट-कटवा पार्टी की संज्ञा दी है.
लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने बिहार के सीमांचल इलाक़े में अमौर, बहादुरगंज, कोचाधामन, जोकिहाट और बायसी विधानसभा सीट पर जीत हासिल की है.
ममता बनर्जी की राजनीति को क़रीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार पुलकेष घोष मानते हैं कि ओवैसी फ़ैक्टर की वजह से ममता बनर्जी को अपनी रणनीतियां बदलनी पड़ रही हैं.
वो कहते हैं, “बंगाल चुनाव पर बिहार चुनाव का असर समझने के लिए ओवैसी फ़ैक्टर समझना ज़रूरी है. ओवैसी की पार्टी ने इस चुनाव में पाँच सीटों पर जीत हासिल की है जिनमें से चार विधानसभा सीटें पश्चिम बंगाल सीमा पर स्थित हैं. और इसके साथ ही उन्होंने 12-15 सीटों पर महागठबंधन का वोट काटा है. एक तरह से उन्होंने बीजेपी को ये चुनाव जीतने में मदद की है.”
“अब बंगाल में भी यही होगा. 2016 में टीएमसी को 212 सीट मिली थीं जिसमें से 98 सीट पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इसमें से तीस सीट पर मुस्लिम जनसंख्या 30 फ़ीसदी है. बाक़ी 38 सीटों पर मुस्लिम जनसंख्या 20 फ़ीसदी है. अभी बीजेपी ने इन 68 सीटों को संभालने की ज़िम्मेदारी मुकुल राय को दी है. इन्हीं सीटों पर ओवैसी की गतिविधियां ज़्यादा रहेंगी.”

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पिछले कई सालों से पश्चिम बंगाल में सक्रिय रूप से बीजेपी के लिए ज़मीन तैयार करने में लगी है.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से लेकर छोटे बड़े शहरों में तमाम जगहों पर प्रतिदिन हज़ारों शाखाएं लग रही हैं.
यही नहीं, सर संघ संचालक मोहन भागवत भी व्यक्तिगत स्तर पर पश्चिम बंगाल में एक भूमिका निभा रहे हैं.
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ऐसे में सवाल उठता है कि पहले से अपनी कोशिशों में लगे आरएसएस कार्यकर्ताओं के लिए ये जीत क्या लेकर आई है.
क्या ये एक ऐसी जीत है जिसे भगवा लहर बताकर आरएसएस कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल के लोगों के बीच जा सकें?
वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी मानते हैं कि “ये ऐसी जीत नहीं है जिसे लेकर आरएसएस के कार्यकर्ता मतदाताओं के बीच में जा सके. ये बात सही है कि इससे मतदाताओं का मनोबल बढ़ा है. लेकिन आरएसएस पहले की तरह ध्रुवीकरण की राजनीति का इस्तेमाल करेगी जो कि उन्होंने पंचायत चुनाव और लोकसभा चुनावों के दौरान किया था. ऐसे में यहां उनका सबसे बड़ा हथियार ध्रुवीकरण ही होगा जिससे वे विधानसभा चुनाव में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल कर सकें.”


