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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 13 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पुलिस को धारा 188 (महामारी एक्ट) के अंतर्गत एफआईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने राजनांदगांव की एक डॉक्टर के खिलाफ जिला पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को शून्य कर दिया है।
जस्टिस संजय के अग्रवाल की सिंगल बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई। राजनांदगांव की डॉ. अपूर्वा घिया (25 वर्ष) मेडिकल ग्रेजुएट हैं जो लॉकडाउन के दौरान सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली में थीं। याचिका में बताया गया कि ई पास लेकर 7 जून को दिल्ली से राजनांदगांव और अगले दिन अपने घर अम्बागढ़ चौकी पहुंची। वहां उन्होंने सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में अपना चेकअप कराया और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को अपने पहुंचने की जानकारी दी। वह इसकी जानकारी मुख्य नगर पंचायत अधिकारी (सीएमओ) को नहीं दे पाईं।
सीएमओ की शिकायत पर अम्बागढ़ चौकी थाने में उनके विरुद्ध आईपीसी की धारा 188 के तहत 16 जून को अपराध दर्ज कर लिया गया। याचिकाकर्ता ने इस आधार पर कोर्ट से एफआईआर रद्द करने की मांग की कि किसी भी लोक सेवक को एफआईआर दर्ज कराने या करने का अधिकार नहीं है। जिला दंडाधिकारी द्वारा इस तरह का कोई प्रचार भी नहीं किया गया था यात्रा से आने के बाद किन किन लोगों को सूचना देनी है। मुख्य नगर पंचायत अधिकारी कलेक्टर के अधीन कार्य करने वाले व्यक्ति हैं और उन्हें स्वयं अपराध दर्ज कराने का अधिकार नहीं है। दिल्ली से लौटने के बाद उसने स्वयं को मेडिकल जांच के लिये प्रस्तुत किया था जो प्रशासन को सूचित करने का पर्याप्त आधार है।
इस एक्ट के तहत आती है धारा
कोरोना वयारस से लडऩे के लिए लॉकडाउन की घोषणा महामारी कानून के तहत लागू किया गया है। इसी कानून में प्रावधान किया गया है कि अगर लॉकडाउन में सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का कोई व्यक्ति उल्लंघन करता है, तो उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
क्या है आईपीसी 188
1897 के महामारी कानून के सेक्शन 3 में इस बात का जिक्र किया गया है कि अगर कोई प्रावधानों का उल्लंघन करता है, सरकार/कानून के निर्देशों/नियमों को तोड़ता है, तो उसे आईपीसी की धारा 188 के तहत दंडित किया जा सकता है। इस संबंध में किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा दिए निर्देशों का उल्लंघन करने पर भी आपके खिलाफ ये धारा लगाई जा सकती है। अगर आपको सरकार द्वारा जारी उन निर्देशों की जानकारी है, फिर भी आप उनका उल्लंघन कर रहे हैं, तो भी आपके ऊपर धारा 188 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
क्या मिल सकती है सजा
आईपीसी की धारा 188 के तहत सजा के दो प्रावधान हैं। पहला-अगर आप सरकार या किसी सरकारी अधिकारी द्वारा कानूनी रूप से दिए गए आदेशों का उल्लंघन करते हैं, या आपकी किसी हरकत से कानून व्यवस्था में लगे शख्स को नुकसान पहुंचता है, तो आपको कम से कम एक महीने की जेल या 200 रुपये जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है। वहीं दूसरा- अगर आपके द्वारा सरकार के आदेश का उल्लंघन किए जाने से मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा, आदि को खतरा होता है, तो आपको कम से कम 6 महीने की जेल या 1000 रुपये जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है।
क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सीआरपीसी 1973) के पहले शेड्यूल के अनुसार, दोनों ही स्थिति में जमानत मिल सकती है और कार्रवाई किसी भी मैजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है।


