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अग्निवेश अब स्मृतियों में, सक्ती-बिलासपुर से गहरा जुड़ाव रहा
11-Sep-2020 10:35 PM
अग्निवेश अब स्मृतियों में, सक्ती-बिलासपुर से गहरा जुड़ाव रहा

उन पर किताब लिख रहीं शिष्या से राजेश अग्रवाल की एक्सक्लूजिव बातचीत

बिलासपुर, 11 सितम्बर (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता) । मजदूरों, वंचितों और आदिवासियों के हक की लड़ाई लडऩे वाले स्वामी अग्निवेश का आज शाम निधन हो गया। उनका जाना खास तौर पर छत्तीसगढ़ के लोगों को गहरा सदमा दे गया। उन्होंने अविभाजित बिलासपुर जिले और अब जांजगीर-चाम्पा के जिले के लोगों को भी शोक में डुबा दिया। उन्होंने एक असाधारण जीवन जिया लेकिन साधारण लोगों के साथ रिश्ता सदैव बना रहा। जब भी वक्त मिला वे छत्तीसगढ़ आने का मौका नहीं चूकते थे क्योंकि उन्हें अपनी माटी से बेहद लगाव था।

जांजगीर-चाम्पा जिले के सक्ती के राजा स्वर्गीय निलाम्भर सिंह के यहां स्वामी अग्निवेश के नाना एम. दासरथी राव दीवान थे। उनकी पैदाइश यहीं 30 सितम्बर 1939 को हुई। हाई सेकेन्डरी तक की पढ़ाई उन्होंने यहां की। सरकारी स्कूल में हर साल टॉपर होते थे पर चर्चा में तब आये जब मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की 11वीं की परीक्षा का नतीजा सामने आया। पूरे प्रदेश में उन्होंने प्रावीण्य सूची में पहला स्थान प्राप्त किया।

स्वामी अग्निवेश का असल नाम श्याम कुमार राव था। सक्ती में वे इसी नाम से जाने जाते थे। सक्ती के पत्रकार अशोक अग्रवाल बताते हैं कि उनका जाना बड़ा दुख दे गया। वे जब भी मौका मिलता सक्ती जरूर आते थे और बचपन के साथियों से मिलते थे, जिस स्कूल में पढ़े वहां कुछ वक्त बिताते थे। उनके बाल सखा ओमप्रकाश अग्रवाल दो साल पहले गुजर गये। उनके बेटे प्रमोद बताते हैं कि वे बचपन से देखते आ रहे हैं पिता से उनकी गहरी दोस्ती को। श्याम कुमार से स्वामी अग्निवेश बनने के बाद भी उनमें हमारे लिये कोई बदलाव नहीं आया। लोगों से मिलने-जुलने के लिये निर्धारित समय के बाद वे सारा समय परिवार के साथ बिताते थे। प्रमोद ने पिता जी से सुना है कि वे प्रोफेसर रहे, मिलिट्री में रहे, लॉ किया, मैनेजमेंट की पढ़ाई की। सब जानकर रोमांचित होते हैं। उनको लगता है कि आज सक्ती का बेटा उनसे बिछुड़ गया है।

श्याम कुमार यानी स्वामी अग्निवेश के परिवार में दो भाई और तीन बहनें हैं। एक भाई राजेश राव बिलासपुर में हैं जिनके पास वे अक्सर रुका करते हैं। उनकी शिष्या स्वामी अग्नेयानंदी उन पर किताब लिख रही हैं। वे सक्ती में बहुत सी जानकारियों को हासिल करने पहुंचीं। जिस जगह पर उन्होंने जन्म लिया उसकी मिट्टी अपने साथ लेकर गईं। वह बताती हैं कि हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद स्वामी अग्निवेश कोलकाता चले गये। वहां उन्होंने मैनेजमेंट का कोर्स किया, लॉ की पढ़ाई की और फिर वहीं सेंट जेवियर्स कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी भी की।

इसके बाद दिल्ली आये। उन्होंने सबसे पहले छत्तीसगढ़ के बंधुआ मजदूरों के लिये संघर्ष शुरू किया। जिस इलाके जांजगीर जिले से वे थे वहां से बड़ी संख्या में मजदूर देशभर में जाते रहे हैं फिर उन्होंने इस अभियान को विस्तार दिया और देशभर में बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के लिये संगठन बनाया। वे दिल्ली से देशभर ही नहीं दुनियाभर में मजदूरों की आवाज बने। हरियाणा से जनता पार्टी की टिकट पर विधायक और शिक्षा मंत्री भी बने।

स्वामी अग्नेयानंदी ने ही बताया कि रातभर उनका शव हॉस्पिटल में रखा गया है। सुबह लीवर एंड बिलियरी साइंस हॉस्पिटल नई दिल्ली से पार्थिव शरीर उनके कार्यालय 7, जंतर-मंतर रोड ले जाया जायेगा। सुबह 11 से दोपहर 2 बजे तक दर्शन का समय तय किया गया है और उसके बाद बहेलपा, गुडग़ांव हरियाणा स्थित अग्नियोग आश्रम ले जाया जायेगा, जहां उनका अंतिम संस्कार होगा।

स्वामी अग्निवेश का बिलासपुर के लोगों से भी गहरा नाता रहा है। किसान नेता आनंद मिश्रा और नंदकुमार कश्यप ने उन्हें सन् 2017 में हुए किसान आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ प्रवास को याद किया। आम आदमी पार्टी की नेत्री व अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने बस्तर की सोनी सोढ़ी की मदद, तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लुरी की गतिविधियों पर उनके विरोध की चर्चा की। बिलासपुर में पूर्व मंत्री स्व. अशोक राव से उनकी गहरी मित्रता रही। दोनों मूल रूप से आंध्रप्रदेश के थे और दूर की रिश्तेदारी भी थी। 


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