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राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट- छत्तीसगढ़ में कोरोना-मृतकों को जलाने पर बवाल
10-Sep-2020 7:06 PM
राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट- छत्तीसगढ़ में कोरोना-मृतकों को जलाने पर बवाल

राजधानी रायपुर की तस्वीर


खाली जगह तलाशने में प्रशासन के छूट रहे पसीने, जनप्रतिनिधि यहां भी बाज नहीं आ रहे राजनीति करने से

कोरबा के एक श्मशान में उमड़ी भीड़ को तितर-बितर करने के लिये पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। ये भीड़ मृतक में कंधा देने या परिजन को ढांढस बंधाने के लिये नहीं पहुंची थी, बल्कि शव को उस जगह जलाये जाने का विरोध कर रही थी।

कोरबा जिला प्रशासन ने बालको इलाके के दैहानपारा में मृत कोरोना संक्रमितों का शव जलाने की व्यवस्था की थी। इसे लेकर वहां के निवासी नाराज चल रहे थे। सीएसपीडीसीएल के एक कर्मचारी की कोरोना से मौत के बाद वहां शव लाया गया था। 30 अगस्त को वे श्मशान गृह के रास्ते पर धरना देकर नारेबाजी करने लगे। उनका कहना था कि यहां दाह संस्कार करने से आसपास की आबादी में संक्रमण फैलेगा। प्रशासन ने समझाया कि पर्याप्त सावधानी बरती जा रही है, ऐसा कुछ नहीं होगा। इसके बाद भी जब भीड़ नहीं हटी तो उन्हें पुलिस ने लाठियां चलाकर खदेड़ा।

राजनांदगांव की तस्वीर

राजनांदगांव में कोरोना संक्रमित शवों को जलाने के लिये गठुला नाले के पास एक नया मुक्तिधाम बनाया जा रहा था। आसपास के दर्जनभर गांवों के सरपंच और सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण विरोध पर उतरे। यह नगर निगम क्षेत्र से सटा गांव है। ग्रामीणों के साथ आयुक्त की तनातनी भी हो गई। अंत में सरपंचों के साथ प्रशासन की बैठक के बाद नई जगह तलाश की गई। इसके पहले चिखली वार्ड के लोगों ने अपने श्मशान गृह का कोरोना मौतों के अंतिम संस्कार के लिये रोका था, तब प्रशासन ने नई जगह तय की थी।

बिलासपुर में ऊर्जा पार्क के पीछे का हिस्सा शवों को जलाने के लिये तय किया गया तो वहां के लोग सडक़ों पर उतर आये। घंटों विरोध के कारण दाह संस्कार नहीं किया जा सका। जो अधिकारी पहुंचे उनका लोगों ने घेराव किया, जो दल शवों को लेकर पहुंचा उनका रास्ता रोका। बाद में इस बात पर सहमति बनी कि मृतक जिस वार्ड या गांव का निवासी होगा, शव वहीं जलाये जायेंगे। कुछ इसी तरह का विरोध भिलाई के रामनगर में शवों को जलाने पर हुआ। खरसिया के एक श्मशान गृह में 7 सितम्बर को एक शव दोपहर से लाया जा चुका था, पर भीड़ विरोध में डटी रही। अंतिम संस्कार आधी रात के बाद पुलिस हस्तक्षेप और पूरे इलाके को सैनेटाइज करने के आश्वासन के बाद हो पाया।

राजधानी रायपुर जहां कोरोना केस और उससे हो रही मौतों की संख्या सबसे ज्यादा है, विरोध भी सबसे अधिक हो रहा है। मारवाड़ी श्मशान घाट, रायपुरा, गुढिय़ारी, बोरियाकलां में लोग कोरोना संक्रमितों के शवों को जलाने के विरोध में कई बार हंगामा और चक्काजाम आंदोलन कर चुके। अफसरों के साथ यहां भी धक्का-मुक्की की घटनायें हो रही हैं।

यह सब उस स्थिति में हो रहा है जब कोरोना महामारी के कारण प्रदेश के अधिकांश शहरी इलाकों में धारा 144 प्रभावशील है। कोरोना महामारी वास्तविकता है और इससे होने वाली मौतें भी। मौत के बाद अंतिम संस्कार भी एक अनिवार्य प्रक्रिया है। पर लोग इतने भयभीत हैं कि मौत से पैदा होने वाली संवेदना भी खत्म होती जा रही है। किसी भी कोरोना पीडि़त का शव उनके परिजनों को नहीं सौंपा जाता, यह काम प्रशासन की निगरानी में एसओपी का पालन करते हुए किया जाता है। लोगों का भय सिर्फ यह नहीं है कि शवों को जलाने से उठने वाला धुआं उन्हें संक्रमित कर सकता है बल्कि इससे भी है कि जलाने से पहले शव में और शवों को लेकर आ रही टीम के पीपीई किट में मौजूद वायरस उन तक पहुंच सकता है। रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव में विरोध प्रदर्शन करने वालों का कहना था कि दाह संस्कार के दौरान मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। शव जलाने के बाद बचा सामान खुले में फेंक दिया जाता है। यह बात कई जगह से सामने आई है। रायपुर के गुढिय़ारी मुक्तिधाम की बेंच के नीचे शव लाने वालों द्वारा उतारे गये पीपीई किट की तस्वीर वायरल होने के बाद जिला प्रशासन ने जांच भी बिठाई है।

छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े और कम संसाधन वाले राज्य में कोरोना का फैलता संक्रमण बेहद चिंताजनक है। लम्बे लॉकडाउन के बाद लोगों की आजीविका पर गहराते संकट को देखते हुए धीरे-धीरे सभी व्यवसायों को शुरू करने की अनुमति दी जा रही है। इसके बाद से संक्रमण तेजी से बढ़ता जा रहा है। 10 सितम्बर की शाम तक यहां कुल संक्रमितों की संख्या 52 हजार 932 हो चुकी है। इनमें से 23 हजार 938 स्वस्थ हो चुके हैं, 28 हजार 517 केस एक्टिव हैं और 477 की मौत हो चुकी है। छत्तीसगढ़ के लिये यह स्थिति भी भयावह है कि यहां रिकव्हरी रेट पूरे देश में नीचे के पायदान से दूसरा है। जुलाई में रिकव्हरी रेट 83 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। अब यह 53 प्रतिशत पर आ गया है। छत्तीसगढ़ से ज्यादा खराब स्थिति पूरे देश में सिर्फ मेघालय की है। 

छत्तीसगढ़ से दूसरे राज्यों में काम करने के लिये जाने वाले श्रमिकों की संख्या बहुत है। लॉक-डाऊन के बाद जब ट्रेनों, बसों से घर वापसी का रास्ता खुला तो 2.48 लाख मजदूरों ने लौटने के लिये ऑनलाइन पंजीयन कराया। करीब 1.75 लाख मजदूर वापस आये। ये कुछ दिन कोविड सेंटर में रहने के बाद, अपने गांवों, घरों में जाकर रुके। सबसे पहले संक्रमण की गिरफ्त में ये और उनके परिवार के लोग ही आये। पर अब यह सभी वर्गों में फैल रहा है। प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग में सेवा दे रहे लोग बड़ी संख्या में संक्रमित हो रहे हैं।

इसी रफ्तार से मौतें भी बढ़ रही हैं। शवों को जलाने का विरोध तब नहीं था जब मौतें कम थीं। अब राजधानी में ही रोज 10-12 मौतें हो रही हैं। बिलासपुर और राजनांदगांव की भी यही स्थिति है। नि-संदेह प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे ने बड़ी विषम परिस्थिति में कोरोना से निपटने में अपनी ताकत झोंक दी है। ऐसे मौके पर शवों को जलाने का विरोध नई समस्या के रूप में खड़ी हो गई है। जो भीड़ विरोध पर उतर रही है वे यह भी देख रही है कि शवों को मर्च्युरी से श्मशान घाट तक लाने, जलाने और बाद में किट और दूसरी सामग्री को नष्ट करने में लापरवाही बरती जा रही है। यह जरूरी है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और एमसीसीआर द्वारा तय किये गये एसओपी का ठीक तरह से पालन हो। सिर्फ प्रशासन ही नहीं यह जन-प्रतिनिधियों का भी दायित्व है। 

दाह संस्कार के विरोध में भीड़ उतरी तो वे भी सडक़ पर उनके साथ आ गये। यहां भी राजनीति हो रही है। जहां भी प्रदर्शन हुए वहां कोई विधायक, कोई पंचायत का नेता या फिर पार्षद जरूर दिखाई दे रहे हैं। भीड़ के साथ वे सुर मिला रहे हैं बजाय इसके कि उन्हें समझायें और प्रशासन के साथ समन्वय बनायें। वे अब भी घरों से तब निकल रहे हैं जब उन्हें कोई अवसर दिखाई देता हो। इस संकट से निपटने के लिये जुटे लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिये उन्हें अधिक सार्थक भूमिका में सामने आना होगा। वरना कोरोना के खिलाफ लड़ाई कमजोर होती जायेगी।


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