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बाकियों के लिए आशा की किरण
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 7 अगस्त। एक 67 वर्षीय महिला रोगी जो 10 वर्षों से किडनी रोग से पीडि़त थी, 45 दिनों बाद कोरोना से उबर कर फिर से स्वस्थ हो गई हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टॉफ की मदद से उन्होंने इस चुनौती का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। उन्होंने न केवल 23 डायलिसिस सेशन तक अपने किडनी रोग का इलाज करवाया, बल्कि कोरोना के भी ठीक होने तक दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय भी दिया। इस महिला का केस कोरोना और को-मोर्बिडीटी वाले रोगियों की सफलता का अनूठा केस माना जा रहा है।
यह महिला मुंबई के एक अस्पताल में चार वर्षों से डायलिसिस करवा रही थी। तीन माह पूर्व जब उन्होंने नियमित डायलिसिस के लिए उक्त अस्पताल में संपर्क किया तो अस्पताल कोरोना 9 का अस्पताल बन चुका था अत: उन्होंने डायलिसिस के लिए मना कर दिया गया। परिजनों ने नागपुर के अस्पतालों में संपर्क किया तो उनके मुंबई से आने के कारण वहां भी डायलिसिस के लिए मना कर दिया गया। हारकर परिजनों ने रायपुर के एक निजी अस्पताल में संपर्क किया। यहां रोगी के कोरोना लक्षण होने पर डायलिसिस के लिए मना कर दिया गया।
अंत में इस परिवार ने एम्स, रायपुर से संपर्क किया। यहां चिकित्सकों ने उनकी डायलिसिस की आवश्यकता को देखते हुए इलाज करने का निर्णय लिया। कोरोना टेस्ट में यह परिवार पॉजिटिव पाया गया। ऐसे में महिला को एम्स में जबकि उनके पति और पुत्र को दूसरे अस्पतालों में एडमिट कर दिया गया। यह महिला रोगी के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से चुनौतीपूर्ण समय था क्योंकि वह कोरोना की वजह से घबरा रही थी और कोई परिजन भी सहायता के लिए उपलब्ध नहीं था। ऐसे में एम्स के चिकित्सक और नर्सिंग स्टॉफ आगे आया और महिला को चिकित्सा के साथ मनोवैज्ञानिक संबल भी प्रदान किया, जिससे वह कोरोना की चुनौती का मुकाबला कर सके।
45 दिनों तक लगातार पॉजीटिव आने के बाद अभी हाल ही में इनके दो टेस्ट नेगेटिव आए हैं। इस बीच में नेफ्रोलॉजी विभाग के चिकित्सकों ने उन्हें 23 सेशन का डायलिसिस भी दिया। यह चिकित्सकों के लिए भी काफी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि उन्हें आईसीएमआर के प्रोटोकॉल के अनुसार पीपीई किट और अन्य सावधानियों के साथ उपचार प्रदान करना था। अब यह महिला रोगी ठीक होने के बाद अपने परिजनों के साथ है। वह एम्स के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टॉफ का शुक्रिया कहना नहीं भूलती जिनकी वजह से उन्हें एक बार फिर परिजनों के साथ समय बिताने का मौका मिला है।
निदेशक डॉ. नितिन एम. नागरकर का कहना है कि बुजुर्ग रोगियों में जिन्हें किडनी की गंभीर बीमारी भी है और वह कोरोना पॉजिटिव भी हैं, रिकवरी रेट अपेक्षाकृत काफी कम होता है। ऐसे में उक्त केस का पूरी तरह से स्वस्थ हो जाना नेफ्रोलॉजी विभाग के चिकित्सकों, तकनीकी कर्मचारियों और नर्सिंग स्टॉफ की प्रतिबद्धता को परिलक्षित करता है। उन्होंने इसके लिए नेफ्रोलॉजी विभाग को भी बधाई दी है।


