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भारतीय न्यायपालिका विवाद सुलझाने के मजबूत तरीके के तौर पर मध्यस्थता को देती है बढ़ावा: सीजेआई
11-Jun-2026 9:02 PM
भारतीय न्यायपालिका विवाद सुलझाने के मजबूत तरीके के तौर पर मध्यस्थता को देती है बढ़ावा: सीजेआई

नयी दिल्ली, 11 जून। लंदन में भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित एक परिचर्चा के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने मध्यस्थता को न केवल एक विकल्प के तौर पर, बल्कि विवाद सुलझाने के एक मजबूत तरीके के तौर पर भी बढ़ावा दिया है।

प्रधान न्यायाधीश ने मध्यस्थता को अपने दिल के बहुत करीब बताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय विधिक सेवाएं समिति (एससीएलएससी) ने निपुण मध्यस्थों की एक बड़ी टीम तैयार की है।

सीजेआई ने कहा, ‘‘मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि (भारत में) हर शहर, गली-गली में लोग जानते हैं कि मध्यस्थता क्या है।’’

एक प्रेस बयान के अनुसार, लंदन स्थित उच्चायोग ने बुधवार को ‘‘प्रौद्योगिकी और मध्यस्थता का भविष्य’’ विषय पर एक उच्च-स्तरीय परिचर्चा आयोजित की तथा इसमें भारत और ब्रिटेन की न्यायपालिका और कानूनी क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं।

प्रधान न्यायाधीश के अलावा, इसमें ब्रिटेन के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश लॉर्ड हैम्बलन ऑफ केर्सी, इंग्लैंड और वेल्स बार काउंसिल की अध्यक्ष किर्स्टी ब्रिमेलो केसी, और इंग्लैंड और वेल्स लॉ सोसाइटी के उपाध्यक्ष ब्रेट डिक्सन शामिल हुए।

उच्चायुक्त कुमारन पी ने कार्यक्रम में प्रारंभिक वक्तव्य दिया। परिचर्चा का संचालन उच्चतम न्यायालय की ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ तन्वी दुबे ने किया।

मध्यस्थता को बढ़ावा देने में न्यायपालिका की भूमिका पर बात करते हुए, सीजेआई ने भारत में मध्यस्थता के विकासक्रम को दो चरणों में विभाजित किया: मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के लागू होने से पहले और उसके बाद।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कानून लागू होने से पहले भी, अदालतों ने विवाद सुलझाने के एक मजबूत तरीके के तौर पर मध्यस्थता को बढ़ावा दिया था।

मध्यस्थता को माध्यस्थम (आर्बिट्रेशन) से बेहतर माना जाना चाहिए या नहीं, इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों ही तरीकों की अपनी अहम भूमिका है।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं माध्यस्थम को हतोत्साहित नहीं करता।,’’ उन्होंने यह भी कहा कि देशों के बीच बढ़ते वाणिज्यिक लेन-देन से विवाद पैदा होना स्वाभाविक है।

दोनों प्रक्रियाओं के बीच अंतर बताते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘माध्यस्थम में, फैसला आने के बाद अक्सर आगे की कानूनी कार्यवाही शुरू हो जाती है। वहीं, मध्यस्थता में जब प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है, तो विवाद का समाधान हो जाता है। दोनों के बीच यही मूलभूत अंतर है।’’ (भाषा)


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