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यूपी के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस के खड़े किए हुए एक केस की धज्जियां उड़ाते हुए, उसे पूरी तरह फर्जी, झूठा, गढ़ा हुआ बताते हुए आला अफसरों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की हैं। गाजियाबाद के एक परिवार के खिलाफ पुलिस ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। जमीन-जायदाद और रूपए-पैसे के लेनदेन से जुड़ा हुआ यह मामला आपस का एक सिविल केस था, इसमें किसी संगठित अपराधी गिरोह का हाथ होने का कोई सुबूत या संकेत नहीं था, फिर भी अफसरों ने गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला बनाया, और 35 बरस की एक गृहिणी को भी करीब 80 दिन जेल में रखा। यह मामला हम जज की नजरों से ही देखते हैं, और हमें अपनी संपादकीय टिप्पणियों की अधिक जरूरत नहीं रहेगी।
जस्टिस विनोद दिवाकर ने 31 पन्नों के फैसले में यह लिखा है कि कई अफसर संविधान और कानून के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय राजनीतिक आकाओं को खुश करने को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरी फिक्र जताई। फैसले में लिखा- फील्ड में तैनात अफसर ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था को अच्छी तरह समझते हैं, और उसी के अनुसार अपना व्यवहार तय करते हैं। इस मामले में गाजियाबंद के पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी करते हुए जज ने लिखा कि इस अफसर ने अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हुए इस केस में गैंगस्टर एक्ट की मंजूरी दी। उन्होंने कहा कि यूपी में नेताओं और अफसरों की सामंती मानसिकता अभी भी जारी और असरदार है, जहां संवैधानिक शासन को व्यक्तिगत राज का औजार बना दिया जाता है। जज ने लिखा कि कानून के शासन को ‘कामकाज में असुविधा’, माना जाता है, और कई अफसर संवैधानिक दायित्व के बजाय कानून के शासन की सुविधा देखते हैं। जज ने लिखा- कानून का शासन लोकतंत्र की नींव है, जब पुलिस और प्रशासनिक तंत्र राजनीतिक दबाव में काम करने लगते हैं, तो नागरिकों के संवैधानिक अधिकार कमजोर होते हैं। उन्होंने कहा कि गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल ‘असुविधाजनक व्यक्तियों’ के खिलाफ निशाना लगाकर इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि असली अपराधी और संगठित गिरोह इससे कोई अधिक प्रभावित नहीं हो रहे हैं। कुल मिलाकर जस्टिस विनोद दिवाकर ने यह कहा है कि यूपी पुलिस और अफसर संविधान से अधिक राजनीतिक आकाओं के प्रति वफादार हैं। जज ने इस कड़े फैसले में पुलिस कार्रवाई को खारिज कर दिया।
इस मामले में अदालत ने कहा कि किसी तरह की हिंसा, धमकी, दबाव, जनजीवन में अशांति, या संगठित अपराध जैसी किसी भी बात का कोई सुबूत पुलिस ने नहीं रखा है। हो सकता है कि आरोपियों ने किसी से वित्तीय धोखाधड़ी की हो, लेकिन उसे संगठित गैंग चलाना नहीं कहा जा सकता। जज ने कहा कि पुलिस ने सिर्फ खोखले दावे सामने रखे हैं। जज ने लिखा कि एक घरेलू महिला को बिना किसी सुबूत और संकेत के गैंगस्टर एक्ट में गिरफ्तार करके 80 दिन जेल में रखा गया। इस पूरी कार्रवाई को जज ने पूरी तरह से गैरकानूनी, मनमानी, और कानून के बेजा इस्तेमाल का मामला बताया, और यह भी लिखा कि पुलिस कमिश्नर ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी जरा भी नहीं निभाई। जज ने लिखा कि कड़े कानूनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, और पुलिस के अधिकारों का बेजा इस्तेमाल इस मामले में दिखता है। जज ने कहा कि छोटे-छोटे मामलों में गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है, और बड़े गैंगस्टर बचे रहते हैं।
एक साधारण परिवार के खिलाफ किसी की लेनदेन में धोखाधड़ी की गैरआपराधिक शिकायत पर पुलिस ने जिस तरह की कार्रवाई की है, वह पुलिस, या उसके राजनीतिक आकाओं की बदनीयत का सुबूत है। उत्तरप्रदेश में ऐसी घटनाएं कुछ अधिक हो रही हैं, लेकिन बाकी देश में भी पुलिस का हाल कई जगहों पर इसी तरह का है। सत्तारूढ़ पार्टी और नेताओं की पसंद और नापसंद से आमतौर पर यह तय होता है कि किसी के खिलाफ एफआईआर हो, या न हो। इसके बाद अगर बेकसूर लोगों की ताकत हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाने की रहती है, तो ही वे सत्ता की मार से बच पाते हैं। केन्द्र सरकार अपनी अलग एजेंसियों के बेजा इस्तेमाल के आरोपों से घिरी रहती है, और राज्य सरकारें पुलिस के बेजा इस्तेमाल के आरोपों से। कुल मिलाकर यह लगता है कि कानून का राज भ्रष्ट व्यवस्था का ऐसा बुरा शिकार है कि पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों को फर्जी मामले गढऩे में कोई हिचक नहीं होती। अब इस मामले में ही हाईकोर्ट जज ने सारी बातें तो लिखी हैं, लेकिन ऐसा करने वाली पुलिस पर कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस के साथ-साथ सरकारी वकील भी रहते हैं जो कि अदालत में ऐसे मामलों को लड़ते हैं। यह सिलसिला जिला अदालतों से चालू होता है, और हाईकोर्ट की बारी तो कई बार सालों बाद आती है। क्या जज की गिनाई हुई खामियां सरकारी वकील की समझ से परे की थीं? क्या सरकारी वकील की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि जाहिर तौर पर जो कार्रवाई नाजायज थी, उस पर मुकदमेबाजी का वे विरोध करते? आखिर किसी भी वकील की एक जवाबदेही अदालत के प्रति भी बनती है, और जो वकील सरकार या पुलिस से फीस या तनख्वाह पाते हैं, उनकी जिम्मेदारी तो अफसरों को उनकी खामियां, और उनके गलत काम बताने की भी बनती है। अब यह फैसला 31 पेज का है, इसलिए हम अभी तक इसे पूरा देख नहीं पाए हैं कि ऐसा खोखला केस निचली अदालत में लडऩे के बाद हाईकोर्ट में भी इस केस के लिए खड़े होने वाले पुलिस या सरकारी वकील के बारे में जज का क्या सोचना है? क्या प्रताडि़त बेकसूर को बरसों की यातना से मुक्ति दिला देना ही काफी है, या फिर पुलिस और सरकारी वकील की तनख्वाह से ऐसे पीडि़त को कुछ मुआवजा भी दिलाया जाना चाहिए? जजों की प्रतिकूल और आलोचनात्मक टिप्पणियों का सरकार की राजनीतिक व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ता। आज अगर वही राजनीतिक आका सत्ता पर कायम हैं, तो ये पुलिस अफसर जज की कड़ी टिप्पणियों को ले जाकर, दिखाकर सत्तारूढ़ नेताओं से हमदर्दी और वाहवाही दोनों ही पा लेंगे। लोकतंत्र में होना तो यह चाहिए कि जब अफसर बदनीयत से कोई कार्रवाई करें, और सरकारी वकील कानून के खिलाफ की गई ऐसी कार्रवाई पर सरकार या पुलिस को रोकने के बजाय उनके बनाए हुए केस को अदालत में लड़ें, तो इन दोनों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। वकीलों को अदालत का मददगार कहा जाता है, अदालत को गुमराह करने के उनके काम को अनदेखा नहीं किया जा सकता। हमें कानून की बहुत बारीकियां नहीं मालूम हैं, लेकिन हम प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर यह बात कह रहे हैं कि अगर कोई मामला बिल्कुल ही नाजायज तरीके से बनाया गया था, तो पुलिस के वकील को तो यह पहली नजर में दिख गया होगा कि इसमें गैंगस्टर एक्ट नहीं लगता। इसके बाद निचली अदालत या हाईकोर्ट के कई महीने या बरस बर्बाद करने के लिए तो ऐसे वकील को भी जिम्मेदार ठहराना चाहिए।
समय-समय पर अलग-अलग हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज कई राज्यों की पुलिस के बारे में ऐसी बातें कहते आए हैं। उत्तरप्रदेश को कुछ अधिक आत्ममंथन करना चाहिए कि उसकी पुलिस, और उसकी सरकारी मशीनरी के बारे में इतनी अधिक बार ऐसी नौबत क्यों आती है? सत्तारूढ़ नेताओं की सेहत को ऐसी अदालती टिप्पणियों से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि ऐसी कार्रवाई में कागजों पर उनके कोई आदेश तो रहते नहीं हैं। ट्रांसफर-पोस्टिंग के चक्कर में मोटी कमाई करने के लिए अफसर कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं, और इसमें छत्तीसगढ़ जैसा राज्य यूपी को भी मात करता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


