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एक साल से अधिक सेवा शेष तो नहीं मिलेगी तबादले से छूट
04-Jun-2026 12:12 PM
एक साल से अधिक सेवा शेष तो नहीं मिलेगी तबादले से छूट

वन विभाग के एसडीओ के मामले में हाईकोर्ट ने रखा एकलपीठ का आदेश बरकरार

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 4 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तबादला नीति की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रहे कर्मचारियों को तबादले से संरक्षण देने वाली स्थानांतरण नीति की धारा 1.6 केवल उन्हीं कर्मचारियों पर लागू होगी, जिनकी सेवानिवृत्ति में एक वर्ष से कम समय शेष हो। यदि किसी कर्मचारी की सेवा अवधि एक वर्ष से अधिक बची है, तो वह इस प्रावधान का लाभ नहीं ले सकता।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की खंडपीठ ने वन विभाग के एसडीओ उत्तम प्रसाद पैकरा द्वारा दायर रिट अपील को खारिज करते हुए एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा। इससे जून 2025 में जारी तबादला आदेश प्रभावी बना रहेगा।

मामला 30 जून 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें उत्तम प्रसाद पैकरा को एसडीओ (वन) जनकपुर से स्थानांतरित कर जिला यूनियन मनेन्द्रगढ़ में उप प्रबंध संचालक पद पर भेजा गया था। वहीं लक्ष्मी नारायण ठाकुर को जनकपुर पदस्थ किया गया था।

पैकरा ने इस तबादले को चुनौती दी थी। इसके बाद मामला स्थानांतरण नीति के तहत वरिष्ठ सचिव समिति के पास गया। समिति की अनुशंसा पर 22 सितंबर 2025 को दोनों अधिकारियों के तबादले निरस्त कर उन्हें पूर्व पदस्थापना स्थल पर वापस भेज दिया गया।

इस निर्णय को लक्ष्मी नारायण ठाकुर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और एकलपीठ ने तबादला निरस्तीकरण आदेश को रद्द कर दिया। इसी आदेश के खिलाफ पैकरा ने खंडपीठ में अपील दायर की थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विभागीय अभिलेखों के अनुसार पैकरा की जन्मतिथि 19 अक्टूबर 1964 और सेवानिवृत्ति की तिथि 31 अक्टूबर 2026 थी। यानी 30 जून 2025 को तबादला आदेश जारी होने के समय उनकी सेवा अवधि में लगभग एक वर्ष चार माह शेष थे।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में स्थानांतरण नीति की धारा 1.6 लागू ही नहीं होती। इसलिए वरिष्ठ सचिव समिति और राज्य सरकार ने जिस आधार पर तबादला रद्द किया, वह तथ्यात्मक रूप से गलत था।

अदालत ने यह भी कहा कि जब तबादला रद्द करने का मुख्य आधार ही गलत साबित हो गया, तब अन्य सहायक तर्कों के सहारे उस आदेश को वैध नहीं ठहराया जा सकता। राज्य सरकार ने सेवानिवृत्ति संबंधी कठिनाइयों और संबंधित पद पर संविदा कर्मचारी की पदस्थापना जैसे तर्क दिए थे, लेकिन अदालत ने इन्हें पर्याप्त नहीं माना।

हाईकोर्ट ने सेवा कानून के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि तबादला और पदस्थापना सरकारी सेवा का सामान्य हिस्सा हैं। कोई कर्मचारी किसी विशेष स्थान पर बने रहने का अधिकार नहीं जता सकता, जब तक कि दुर्भावना या कानून के उल्लंघन का स्पष्ट मामला न हो।

खंडपीठ ने विभागीय अधिकारियों द्वारा दायर शपथपत्रों पर भरोसा जताते हुए माना कि लक्ष्मी नारायण ठाकुर ने 4 जुलाई 2025 को जनकपुर में कार्यभार ग्रहण कर लिया था। अदालत ने कहा कि कार्यभार ग्रहण करने के संबंध में विभागीय रिकॉर्ड स्पष्ट हैं और केवल प्रक्रिया संबंधी आपत्तियों के आधार पर इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता।

पैकरा ने यह भी आरोप लगाया था कि ठाकुर की पदस्थापना सामान्य पुस्तक परिपत्र की धारा 9.19 का उल्लंघन है, जिसमें कर्मचारी को उसके गृह जिले में पदस्थ नहीं करने का प्रावधान है। इस पर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि जिला पुनर्गठन के बाद मनेन्द्रगढ़ को ठाकुर का गृह जिला नहीं माना जा सकता और वे मूल रूप से कोरिया जिले के निवासी हैं। अदालत ने इस संबंध में किसी कानूनी उल्लंघन का प्रमाण नहीं पाया।

विवादित पद पर कार्यरत एक संविदा कर्मचारी ने भी हस्तक्षेप आवेदन प्रस्तुत किया था। हालांकि अदालत ने कहा कि मुख्य अपील खारिज होने के बाद इस आवेदन पर अलग से निर्णय की आवश्यकता नहीं रह जाती।

अदालत ने अंततः रिट अपील खारिज कर दी और एकलपीठ के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें राज्य सरकार द्वारा 22 सितंबर 2025 को जारी तबादला निरस्तीकरण आदेश को रद्द किया गया था। इसके साथ ही 30 जून 2025 की मूल तबादला व्यवस्था फिर से प्रभावी हो गई है।


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