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(सौगत मुखोपाध्याय)
कोलकाता, 4 जून। पश्चिम बंगाल की राजनीतिक नब्ज पर पकड़, जन आंदोलन और हर चुनौती के सामने डटकर खड़े रहने के दम पर अपना राजनीतिक सफर तय करने वाली ममता बनर्जी के लिए पिछले महीने विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद का समय किसी राजनीतिक भूचाल से कम नहीं रहा है।
ठीक एक महीने पहले ममता तृणमूल कांग्रेस का निर्विवाद चेहरा थीं और उनके पास एक मजबूत विधायी शक्ति थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हाथों मिली करारी चुनावी हार ने बंगाल में तृणमूल के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल कर रखा दिया है।
राजनीतिक रूप से लगा यह जोरदार झटका इसलिए भी कचोट देने वाला था क्योंकि उन्हें भवानीपुर से अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी शुभेंदु अधिकारी से हार का सामना करना पड़ा जबकि यह निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय से उनका राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा था।
चुनाव नतीजों ने विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस की ताकत घटाकर महज 80 विधायकों तक सीमित कर दी, जिससे ममता बनर्जी को अभूतपूर्व रूप से कमजोर स्थिति में विपक्ष का नेतृत्व करना पड़ रहा है।
राज्य में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल के सदन में 215 विधायक निर्वाचित हुए थे।
हालांकि पिछले महीने हुए चुनाव में मिली करारी हार ने तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच तृणमूल के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।
ममता ने पार्टी की स्थापना 1998 में की थी।
तृणमूल के बागी विधायकों के एक समूह ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे, जिसमें निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी को अपने विधायक दल का नेता बताया गया और विपक्ष के नेता पद पर दावा किया गया।
रिताब्रता ने दावा किया कि बागी गुट के समर्थन में दो अन्य विधायक भी हैं।
कुछ ही दिन पहले तृणमूल ने रिताब्रता बनर्जी और उनके साथी विधायक संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था तथा उन पर संगठन को कमजोर करने का आरोप लगाया गया था।
बगावत को शांत करने के बजाय इस निष्कासन ने आग में घी डालने का काम किया।
बंगाल विधानसभा में तृणमूल का सफर शुरू में जितना शानदार रहा उसका अंत उतना ही भयावह स्थिति को दर्शाता है।
वाम दल विरोधी लहर पर सवार तृणमूल ने 2011 में 184 सीट पर जीत दर्ज की थी और सहयोगियों के साथ मिलकर वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत किया था।
वर्ष 2016 में 211 सीट पर जीत हासिल कर तृणमूल ने अपना दबदबा कायम रखा और 2021 में ममता के नेतृत्व में विधानसभा की 294 सीट में से 215 पर अपना परचम फहराया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी के सामने अब एक ऐसी चुनौती है, जिसका सामना उन्होंने अपने लगभग तीन दशकों के सार्वजनिक जीवन में कभी नहीं किया।
राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्रा ने कहा, “चुनावी हार के बाद पार्टी में फूट कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि पार्टी का प्राथमिक उद्देश्य वाम मोर्चे को सत्ता से हटाना, 2011 के चुनाव में जीत के साथ ही पूरा हो गया था।”
उन्होंने कहा, “तृणमूल का कोई वैचारिक आधार नहीं था और न ही राज्य के लिए कोई दीर्घकालिक विकास योजना। पार्टी के विधायकों के पास निजी हितों के अलावा कुछ भी नहीं बचा था।”
तृणमूल ने पार्टी पर पकड़ मजबूत करने के प्रयास में कई महत्वपूर्ण संगठनात्मक समितियों और अग्रिम इकाइयों को भंग कर दिया, जिसे व्यापक रूप से औपचारिक फूट को रोकने के अंतिम प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
ममता बनर्जी स्वयं भाजपा पर पार्टी में फूट डालने के लिए “धन, गिरफ्तारियों और धमकियों” का इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही हैं।
मैत्रा ने कहा, “ममता बनर्जी के शानदार सार्वजनिक जीवन के बावजूद इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक है। इस उम्र में, पिछले चार दशकों में उन्होंने जिस जोश के साथ राजनीति में सक्रियता दिखाई, उसी जोश के साथ वापसी करना मुश्किल लगता है। बशर्ते कोई ऐसी राजनीतिक रूप से अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो जाए जो उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त कर दे।”
फिर भी, ममता के राजनीतिक करियर का अंत मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। (भाषा)


