ताजा खबर
वेश्यावृत्ति को दुनिया का सबसे पुराना पेशा माना जाता है। भारतीय संस्कृति में भी सैकड़ों बरस पुरानी कहानियों में वेश्याओं का जिक्र रहा है। हाल के दशकों में तो भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने लगातार देह का धंधा करने वाली महिलाओं के साथ हमदर्दी दिखाई है, और उन्हें मुजरिम मानने से पुलिस को मना किया है। अगर महिलाओं को मुजरिमों या किसी गिरोह ने देह के धंधे में डाला, तो उन्हें जुर्म का शिकार मानने के लिए अदालत ने पुलिस को साफ-साफ निर्देश दिए थे। इसका नतीजा यह होता था कि जुर्म की शिकार महिला मानकर ऐसी किसी जगह पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद पुलिस ऐसी महिला को पुनर्वास केन्द्र भेज देती थी, क्योंकि जुर्म की शिकार महिला के लिए कानून और सरकार की नजर में वही पहला ठिकाना रहता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक बड़ा ही लंबा फैसला दो दिन पहले दिया है। करीब तीन सौ पेज के इस फैसले में जस्टिस जे.बी.पारदीवाला, और जस्टिस, आर.महादेवन ने समाज, सरकार, और न्यायपालिका के वेश्याओं के बारे में नजरिए को लेकर बहुत सी तीखी बातें लिखी हैं, और यह भी लिखा है कि इतने विस्तृत फैसले के बाद इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को और कहीं कुछ पढऩे की जरूरत नहीं रहेगी। इतने लंबे फैसले का निचोड़ यहां लिखना मुमकिन नहीं है, लेकिन हम इसकी कुछ बुनियादी बातों को यहां जरूर लिखना चाहते हैं क्योंकि भारत में समाज और सरकार दोनों का नजरिया वेश्याओं के खिलाफ रहता है, और इस फैसले से उनके बारे में एक अलग व्यवस्था कायम हो रही है।
जजों ने इस बात पर गहरी फिक्र जताई है कि भारतीय समाज कानून से परे जाकर वेश्याओं के बारे में एक नैतिक पाखंड को लादता है। फैसले में कहा गया है- सेक्स वर्कर्स के प्रति समाज का जो दृष्टिकोण है वह अक्सर गहरे पूर्वाग्रहों, और एक प्रकार के नैतिक पाखंड से संचालित होता है। यह समझना होगा कि कानून का काम समाज की नैतिकता को थोपना नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की रक्षा करना है। जब तक इस पेशे से जुड़े सामाजिक कलंक को कम नहीं किया जाएगा, तब तक इन महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में गरिमामय जीवन देना असंभव रहेगा। जजों ने आगे लिखा है- यौनकर्मियों को समाज या राज्य की किसी दया या सहानुभूति की जरूरत नहीं है। वे भारत की नागरिक होने के नाते कानूनन बराबरी के नागरिक अधिकारों की हकदार हैं। राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह इन महिलाओं को स्वास्थ्य, कानूनी सहायता, और सुरक्षा के वे सारे मौके मुहैया कराए जो किसी भी अन्य नागरिक को प्राप्त हैं। जजों ने आगे लिखा है- कि हमारी साफ राय है कि वेश्यावृत्ति के बारे में बने आईटीपीए कानून के पुराने प्रावधान आज के वक्त और जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। संसद को इस विसंगति को दूर करने के लिए तुरंत ऐसा व्यावहारिक कानून बनाना चाहिए, जो कि महिलाओं की जबरन तस्करी को तो पूरी तरह कुचले, लेकिन उन वयस्क महिलाओं को प्रताडि़त होने से बचाए, जो अपनी मर्जी, या परिस्थितियों के कारण इस पेशे में हैं। एक नजर में इस फैसले को देखें, तो इससे देह का धंधा करने वाली महिलाओं की जिंदगी पर सीधा असर यह पडऩे जा रहा है कि पुलिस किसी कार्रवाई के बाद इस काम में लगी महिला को जबरिया पुनर्वास केन्द्र नहीं भेज पाएगी। अदालत ने यह साफ किया है कि अगर देश का कानून वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा नहीं भी देता है, तो भी वेश्यावृत्ति करने वाली महिला के अधिकार देश के किसी भी दूसरे नागरिक के मुकाबले कम नहीं हैं। इसके साथ-साथ उस महिला को ऐसा पेशा करने का पूरा नागरिक हक हासिल है।
इस ऐतिहासिक फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने अपने आपको सुधारवादी और प्रगतिशील तो साबित किया ही है, उसने भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं, और समाज के पाखंड पर भी वार किया है। जनता के बीच चुनावों के लिए जाने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए इस तरह के मामलों में कोई सुधारवादी नजरिया दिखाना आसान नहीं रहता। कोई भी प्रगतिशील बात पार्टियों के खिलाफ चुनावी मुद्दा बन सकती हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के जज ही समाज के नैतिक मूल्यों के ऊपर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को रख सकते थे, और वही उन्होंने किया है। आज के इस संपादकीय में हम अपने विचारों को अधिक लिखने की जरूरत नहीं समझ रहे, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की बातों से पूरी तरह सहमत हैं, और उनकी लिखी हुई बातें ही आज का हमारा लिखना है। जजों ने यह साफ किया है कि अगर किसी जगह सेक्स के धंधे को लेकर पुलिस छापा मारती है, तो वहां मौजूद बालिग यौन-कर्मी को पुलिस उसकी मर्जी के खिलाफ सुधारगृह, या पुनर्वास केन्द्र नहीं भेज सकती। वह महिला अपनी मर्जी से उसी जगह रहना चाहती है, तो उसे उसका हक है।
इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक और बात लिखी है जो कि पुलिस के आम प्रचलित नजरिए के खिलाफ है, और उसे पूरी तरह तोड़ती है। फैसले में लिखा गया है कि यदि कोई सेक्स वर्कर अपने खिलाफ हुए किसी जुर्म, चाहे वह जबर्दस्ती, बलात्कार, या किसी और तरह के यौन-अपराध की शिकायत करने के लिए पुलिस के पास जाती है, तो कानून लागू करने वाली एजेंसियां उसकी शिकायत को सिर्फ इसलिए हल्के में नहीं ले सकतीं, या खारिज नहीं कर सकतीं कि वह सेक्स वर्क करती है। जजों ने लिखा है कि एक महिला की सहमति का कानूनी महत्व हर परिस्थिति में समान रहता है, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो। जजों ने लिखा कि अब समय आ गया है जब संसद और सरकार कानून की इस विसंगति को दूर करें, और पूरे देश में एक समान ‘पीडि़त सुरक्षा योजना’ लागू की जाए ताकि कानून का डर दिखाकर दलाल या पुलिस इनका शोषण न कर सकें।
हमारे पाठकों को यहां लिखे गए कुछ हिस्सों से परे भी इस फैसले की बातों को पढऩा चाहिए क्योंकि पीढिय़ों से हम वेश्याओं को जिस नजरिए से देखते आ रहे हैं, उनसे हमारे पूर्वाग्रह बहुत मजबूत बने हुए हैं, और हम जुर्म की शिकार, या हालात की बेबस महिलाओं को ही मुजरिम समझने लगते हैं। वेश्यावृत्ति को कुछ बरस पहले सुप्रीम कोर्ट के एक दूसरे फैसले ने जुर्म के दायरे से बाहर निकाल दिया गया था, अब यह फैसला ऐसी महिलाओं के हक को कुछ अधिक दूर तक, कुछ अधिक मजबूती के साथ स्थापित करता है। यह फैसला वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की हद तक नहीं जा रहा, क्योंकि अदालत की नजरों में शायद यह काम संसद का होगा, लेकिन इस फैसले ने वेश्यावृत्ति पर पुलिस कार्रवाई के बाद वहां मिली वेश्याओं को जबरिया पुनर्वास केन्द्र में रखने के नजरिए को गलत करार दे दिया है, और यह सिलसिला इस फैसले के साथ ही अब खत्म माना जाना चाहिए। इस फैसले से भारतीय समाज, सरकार, संसद, और राजनीतिक दलों का पाखंड भी चूर-चूर होता है जो कि वेश्यावृत्ति करने को एक हक नहीं मानते, बल्कि जुर्म मानते हैं। अब इस फैसले के बाद भारतीय समाज में वेश्याओं से दलालों, मुजरिमों, और पुलिस की उगाही कुछ कम होगी, क्योंकि अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने इतने लंबे-चौड़े फैसले में उनके हक, जिसमें मर्जी से धंधा करने का हक भी शामिल है, उसे स्थापित किया है। संसद के लिए इस फैसले के आधार पर मौजूदा कानून में फेरबदल सहूलियत की बात नहीं होगी क्योंकि उससे समाज के पाखंड को चोट लगेगी। लेकिन जब तक संसद सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को नया कानून बनाकर पलटती नहीं है, तब तक फैसला ही कानून रहता है, और इस मामले में यह ताजा खुलासा महिलाओं के हक को और अधिक बढ़ाता है। इसके साथ-साथ यह फैसला वेश्याओं के संवैधानिक नागरिक अधिकारों को सामाजिक नैतिकता के पाखंडों के ऊपर भी रखता है।


