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मुंबई, 1 जून। ‘‘रहें न रहें हम...’’ गीत की मार्मिक धुनों के बीच प्रख्यात पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर का सोमवार का यहां राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। लता मंगेशकर और आशा भोसले की समकालीन रहीं सुमन कल्याणपुर को वह पहचान और सम्मान शायद कभी पूरी तरह नहीं मिल पाया, जिसकी वह हकदार थीं।
‘‘ना तुम हमें जानो’’ जैसे भावपूर्ण गीतों से लेकर ‘‘आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे’’ जैसे लोकप्रिय गीतों को अपनी मधुर आवाज देने वाली सुमन कल्याणपुर का रविवार देर रात उनके घर पर उम्र संबंधी समस्याओं के चलते निधन हो गया। वह 89 वर्ष की थीं।
सांताक्रूज़ श्मशान घाट में उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया और मुंबई पुलिस के जवानों ने उन्हें औपचारिक सलामी दी। उनकी बेटी चारू ने अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं।
चिता को अग्नि दिए जाने के दौरान परिजनों, मित्रों और शुभचिंतकों ने 1966 की फिल्म ‘‘ममता’’ का यादगार गीत ‘‘रहें न रहें हम, महका करेंगे’’ गाकर दिग्गज गायिका को अंतिम विदाई दी। मंगेशकर बहनों के दबदबे वाले दौर में भी सुमन कल्याणपुर ने अपनी अलग पहचान बनाई और अपनी प्रतिभा के दम पर संगीत जगत में अमिट छाप छोड़ी।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘भारतीय संगीत को समृद्ध बनाने वालीं सुमन कल्याणपुर का निधन भारतीय कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने हिंदी और मराठी समेत अनेक भारतीय भाषाओं में अपने मधुर गायन से लोगों को मंत्रमुग्ध किया।’’
राष्ट्रपति ने कहा कि शास्त्रीय धुनों से लेकर लोकप्रिय गीतों तक, उनके योगदान का दायरा अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली रहा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि उनकी सुरीली आवाज और भावपूर्ण गायन ने देश के सांस्कृतिक जगत को समृद्ध किया।
मोदी ने पोस्ट में कहा, ‘‘लोकप्रिय गायिका सुमन कल्याणपुर के निधन से दुखी हूं। उनकी सुरीली आवाज और भावपूर्ण गायन ने हमारे सांस्कृतिक जगत को समृद्ध किया। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से संगीत प्रेमियों और भारतीय सिनेमा के प्रशंसकों के बीच विशेष स्थान बनाया। मैं उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। ओम शांति।’’
‘‘बहना ने भाई की कलाई में’’ और ‘‘ना-ना करते प्यार’’ जैसे यादगार गीतों को अपनी आवाज देने वाली सुमन कल्याणपुर अपने दौर की शायद ऐसी एकमात्र पार्श्व गायिका थीं, जिन्होंने लता मंगेशकर और आशा भोसले के दबदबे वाले दौर में अपनी अलग और मजबूत पहचान बनाई थी।
उनकी मधुर आवाज की तुलना अक्सर लता से की जाती थी, जो उनके लिए एक तरह से वरदान भी साबित हुई और अभिशाप भी। जिन संगीतकारों या निर्माताओं के लिए लता मंगेशकर से गीत गवाना संभव नहीं होता, वे सुमन कल्याणपुर को मौका देते थे। उनके करियर का बड़ा मोड़ तब आया जब रॉयल्टी के मुद्दे पर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच मतभेद हो गए। इस दौरान सुमन कल्याणपुर ने मोहम्मद रफ़ी के साथ 100 से अधिक युगल गीत गाए, जिसने उन्हें हिंदी फिल्म संगीत जगत में एक अलग पहचान दिलाई।
मोहम्मद रफी के बेटे शाहिद रफी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘सुमन जी का अब्बा के साथ बहुत अच्छा रिश्ता था और दोनों ने मिलकर कुछ बेहद खूबसूरत गाने गाए। वह सरल और विनम्र व्यक्तित्व की धनी थीं। जब मेरे पिताजी का लता जी से मतभेद चल रहा था, तब सुमन जी उनके साथ थीं... इस दौरान उन्होंने ज्यादातर सुमन जी और आशा जी के साथ ही युगल गीत गाए।’’
सुमन कल्याणपुर के कई गीत अक्सर गलती से लता मंगेशकर के नाम से जोड़ दिए जाते थे। वर्ष 2022 में सुमन कल्याणपुर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा था कि लता मंगेशकर उनकी करीबी मित्र थीं।
लता के निधन के बाद उन्होंने कहा था, ‘‘हर कोई उनके गीतों से प्यार करता था और वह हमेशा अमर रहेंगी। हमने फिल्म 'चांद' के लिए एक युगल गीत रिकॉर्ड किया था। जब भी मैं उनसे मिलती थी, ऐसा लगता था जैसे किसी बेहद करीबी दोस्त से मुलाकात हुई हो। मेरा मानना है कि वह भी मेरे बारे में ऐसा ही महसूस करती थीं।’’
प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के आनंद वीरजी शाह ने कल्याणपुर को बहुत प्रतिभाशाली बताया।
उन्होंने ‘‘ना ना करते प्यार’’, ‘‘तुम्ही मेरे मीत हो तुम्ही मेरे प्रीत हो’’, ‘‘आप से हमको बिछड़े हुए’’ जैसे गानों में साथ काम किया।
आनंदजी ने कहा, ‘‘हमने उनके साथ कई गीतों में काम किया। वह बेहद सहज स्वभाव की थीं। वह रिहर्सल करती थीं और किसी भी गीत को बहुत जल्दी सीख लेती थीं। हमारे बीच पेशेवर स्तर पर बहुत अच्छे संबंध थे।’’
कल्याणपुर की जीवनी लिखने वाली मंगला खाडिलकर ने बताया कि कल्याणपुर ने 13 भारतीय भाषाओं में 3,500 से अधिक गीत गाए। इनमें हिंदी, मराठी और बांग्ला भाषाओं के गीत प्रमुख रहे।
उन्होंने कहा, ‘‘उनके व्यक्तित्व की झलक उनके गायन में भी दिखाई देती थी। उनके स्वभाव की कोमलता, मधुरता और सौम्यता उनके गीतों में साफ महसूस की जा सकती थी। उनकी आवाज की तुलना अक्सर लता जी की आवाज से की जाती थी, लेकिन कुछ समानताओं के बावजूद दोनों की गायकी और आवाज की अपनी अलग पहचान थी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यदि 'भावगीत' संगीत को एक समबाहु त्रिभुज के रूप में देखा जाए, तो उसके एक कोने पर अपनी दिव्य आवाज के साथ लता जी, दूसरे पर रंगों और विविधता से भरपूर आवाज वाली आशा जी, और तीसरे पर अपनी शहद-सी मधुर आवाज, विनम्रता, संतुलन और गरिमा के साथ सुमन कल्याणपुर जी विराजमान थीं।’’
जनवरी 1937 में ढाका में जन्मीं कल्याणपुर ने शुरू में कला का अध्ययन किया और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाई की। हालांकि, संगीत ही उनका वास्तविक जुनून था। बाद में उन्होंने पंडित केशव राव भोले, अब्दुल रहमान खान और गुरुजी मास्टर नवरंग जैसे प्रतिष्ठित गुरुओं से संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की।
उन्होंने हिंदी सिनेमा में पार्श्वगायक के रूप में अपनी शुरुआत फिल्म ‘‘मंगू’’ से की और तीन गाने गाए, लेकिन जब संगीतकार मोहम्मद शफी की जगह ओ पी नैयर को लिया गया, तो फिल्म में उनके केवल एक ही गाने को शामिल किया गया। वह गाना था ‘‘कोई पुकारे धीरे से तुझे।’’
उनके सबसे लोकप्रिय गानों में ‘‘ना तुम हमें जानो’’ शामिल है जो देव आनंद-वहीदा रहमान की हिट फिल्म ‘‘बात एक रात की’’ से था, जिसमें संगीत एसडी बर्मन का था। उन्होंने ‘‘दिल एक मंदिर है’’ का शीर्षक गीत भी गाया। ‘‘दिल ही तो है’’ के ‘‘यूं ही दिल ने चाहा’’ और ‘‘चुरा ले ना तुमको ये मौसम सुहाना’’ हिट रहे। इस फिल्म में लता, आशा और मुकेश ने भी अपनी आवाज दी थी।
उस दौर के कई संगीत एल्बम में सुमन कल्याणपुर को युगल गीत गाने का अवसर मिलता था, जबकि एकल गीत प्रायः लता मंगेशकर के हिस्से में जाते थे।
‘‘जहां आरा’’ में उन्होंने रफ़ी के साथ युगल गीत ‘‘बाद मुद्दत के ये घड़ी आई’’ गाया। फिल्म के अन्य चार गाने लता मंगेशकर की आवाज में थे। इसी तरह, ‘‘सांझ और सवेरा’’ में, ‘‘अजहुं ना आए बालमा’’ को कल्याणपुर और रफ़ी ने गाया था, जबकि एकल गीत लता मंगेशकर ने गाए थे। भोसले ने भी फिल्म में रफी के साथ युगल गीत गाया।
वर्ष 2023 में कल्याणपुर को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। (भाषा)


