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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : तीसरे और चौथे बच्चे पर प्रोत्साहन राशि की घोषणा, चन्द्राबाबू नायडू की सोच
सुनील कुमार ने लिखा है
18-May-2026 8:27 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : तीसरे और चौथे बच्चे पर प्रोत्साहन राशि की घोषणा, चन्द्राबाबू नायडू की सोच

आंध्र के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने एक बार फिर अपनी यह सोच दुहराई है, और आंध्र के लोगों से अपील की है कि वे अधिक बच्चे पैदा करें। पहले भी वे अपने राज्य के लोगों से तीन-चार बच्चे पैदा करने को कह चुके हैं क्योंकि वहां से काम करने के लिए देश के दूसरे हिस्सों में, और खासकर विदेशों में बड़ी संख्या में लोग जाते हैं। आंध्र की हालत यह हो गई है कि स्थानीय रोजगार के लिए लोगों की कमी आने वाले बरसों में पड़ सकती है, और सामाजिक समस्या भी आ गई है कि परिवारों में सिर्फ बुजुर्ग बचते जा रहे हैं, स्थानीय काम करने वाले बच्चे कम होते जा रहे हैं। आंध्र और तेलंगाना जो कि कल तक एक ही राज्य थे, वहां के तेलुगुभाषी लोग अमरीका में कम्प्यूटरों का काम करने वाले भारतीयों में सबसे बड़ी संख्या में माने जाते हैं। आंध्र-तेलंगाना में हर गांव-कस्बे के बच्चों में अमरीका जाने का सपना रहता है, जो कि काफी हद तक पूरा भी होता है। अभी मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने कहा है कि राज्य में किसी भी जोड़े के तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवार को 30 हजार दिए जाएंगे, और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रूपए। उन्होंने एक जनसभा में यह घोषणा की और कहा कि वे पहले जनसंख्या नियंत्रण के हिमायती थे, लेकिन अब वक्त बदल गया है, अब स्वाभाविक रूप से जनसंख्या वृद्धि दर गिरती जा रही है, दूसरी तरफ पढ़े-लिखे और कामकाजी बच्चे देश पर बोझ न होकर देश की संपत्ति हैं। उनका कहना है कि आजकल कई जोड़े आमदनी बढऩे के बाद सिर्फ एक बच्चा रखना पसंद करते हैं, दूसरी तरफ कुछ परिवार दूसरे बच्चे का तभी सोचते हैं, जब पहला बच्चा लडक़ा न हो। इसलिए राज्य में 2019-21 के आंकड़ों के अनुसार जनसंख्या वृद्धि दर 2.1 के रिप्लेसमेंट लेबल से नीचे पहुंच चुकी है, आंध्र में टीएफआर करीब 1.7 और तेलंगाना टीएफआर करीब 1.8 है। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि 2025-26 में यह आंकड़ा 1.5, और 1.6 तक नीचे जा चुका है। यही रफ्तार रही तो इन दोनों राज्यों की आबादी गिरती चलेगी, जैसा कि जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, इटली, जैसे कई देशों में हो चुका है, और दक्षिण के कुछ राज्यों, तमिलनाडु और केरल में भी यह 1.5 पर आ गया है।

इसके लिए किसी समाजशास्त्री या वैज्ञानिक अध्ययन और समझ की जरूरत नहीं है कि अगर राज्य के पास बच्चों को बेहतर स्कूल-कॉलेज शिक्षा देने की ताकत है, उन्हें स्वस्थ रखने लायक इलाज की ताकत है, तो ऐसे बच्चे राज्य और सरकार पर बोझ नहीं रहते, वे राज्य के लिए कमाऊ संतान साबित होते हैं। आज पूरी दुनिया में यह माना जा रहा है कि जिस देश में हुनरमंद नौजवान पीढ़ी के जितने अधिक लोग होंगे, उसी का भविष्य होगा। लेकिन इस सोच में सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘हुनरमंद’ है। पढ़े-लिखे डिग्रीधारी, बिना हुनर वाले नौजवान किसी भी अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा बोझ होते हैं। हमने अभी दो-चार दिन पहले ही यह लिखा है, या अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर जिक्र किया है कि भारत में स्नातक शिक्षित नौजवानों में से 30 फीसदी बेरोजगार हैं, जबकि पूरी तरह से अशिक्षित लेकिन हुनरमंद मजदूरों या कारीगरों में से कुल 3 फीसदी बेरोजगार हैं। आज ही फेसबुक पर एक मजेदार तंज वाली तस्वीर आई है जिसमें एक कारीगर जोरों से मुस्कुराते दिख रहा है, और उसके साथ लिखा हुआ दिख रहा है कि जब कॉलेज-शिक्षित लोगों के काम एआई खाते चल रहा है, तब प्लंबर और बिजली मिस्त्री इस तरह मुस्कुरा रहे हैं। आज जिस प्रदेश में अपने बच्चों और नौजवान पीढ़ी को हुनरमंद कामकाजी बनाने की ताकत है, जहां पढ़ाई और प्रशिक्षण का स्तर ऊंचा है, वहां पर आबादी कोई समस्या नहीं है। चन्द्राबाबू नायडू की यह बात उस समय सामने आई है जब आंध्र दक्षिण के कुछ दूसरे राज्यों के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय के मामले में थोड़ा पीछे है। लेकिन वे दूरदर्शी व्यक्ति रहे हैं, अविभाजित आंध्र के मुख्यमंत्री रहते हुए चन्द्राबाबू नायडू ने राजधानी हैदराबाद को साइबराबाद बनाने का काम किया था, और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी को  वहां लेकर आए थे। अमरीका के किसी भी हिस्से में जाएं, वहां अविभाजित आंध्र के समय से ही तेलुगु लोगों की बहुत बड़ी मौजूदगी है, और वे सारे के सारे कम्प्यूटर हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर के काम में लगे हुए हैं। वे अपनी कमाई से घर जो पैसे भेजते हैं, या राज्य में जमीन-मकान, या दूसरे कारोबार में जो बड़ा पूंजीनिवेश करते हैं, उससे राज्य की अर्थव्यवस्था को खूब बढ़ावा मिलता है। और ऐसे ही लोगों को देखते हुए चन्द्राबाबू नायडू भविष्य की एक कमाऊ फौज बनाने की उम्मीद रखते हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, और केरल में भी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से खासी अधिक है, और दक्षिण के इन सारे राज्यों ने अपने मानव संसाधन विकास पर खूब मेहनत की है। इन राज्यों में भारत के दूसरे राज्यों से भी पढ़ाई के लिए लाखों नौजवान पहुंचते हैं, इनसे इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है, और कमाऊ रोजगार वाली पढ़ाई करके लौटने वाली युवा पीढ़ी भी अपने-अपने राज्यों के आर्थिक विकास में बेहतर योगदान दे पाती है।

भारत में आज 80 करोड़ आबादी सरकार के दिए हुए हर महीने के पांच किलो अनाज की वजह से दो वक्त भरपेट खा पा रही है। अगर राज्य अपनी आबादी को ऐसी ही हालत में रखेंगे, तो वह राज्य और देश पर बोझ रहेगी। लेकिन अगर बेहतर शिक्षा, और बेहतर स्वास्थ्य का इंतजाम करके समझदार राज्य अपने बच्चों, और अपनी युवा पीढ़ी को बाकी देश और दुनिया में मुकाबले के लायक तैयार करेंगे, तो वे अधिक से अधिक आबादी के जायज हकदार भी हैं। एआई की मार से दुनिया में रोजगार चाहे कम होते जाएं, हुनरमंद लोगों के लिए कई किस्म के रोजगार कम नहीं होने हैं, क्योंकि एआई और रोबोटिक्स मिलकर भी हर तरह के रोजगार नहीं खा सकेंगे। आंध्र से देश के बाकी राज्यों को यह सीखने का मौका मिलता है कि वे अगर स्कूल-कॉलेज, और यूनिवर्सिटी को महज बच्चों और नौजवानों को व्यस्त रखने की जगह बनाकर न चलें, उन्हें सचमुच ही काबिल बनाने के लिए इस्तेमाल करें, तो ऐसे राज्य तीन-चार बच्चों के लिए बढ़ावा देने का एक जायज हक रखते हैं।

आज चन्द्राबाबू नायडू की कही हुई बात धर्म और जाति के फतवों से परे है। भारत में बहुत सारे धार्मिक नेता इसी किस्म के फतवे देते हैं जिनमें चार-चार बच्चे पैदा करने के लिए अपनी आबादी को भडक़ाया जाता है। देश में किसी भी धर्म या जाति के संगठन के पास ऐसे बढ़े हुए बच्चों की बात तो दूर रही, मौजूदा बच्चों को भी काबिल बनाने के बारे में कोई योजना नहीं है, कोई सोच भी नहीं है। फतवों के सैलाब पर बच्चों की फौज खड़ी कर देने की बेवकूफी तो तमाम भडक़ावे के बाद भी गरीब लोग नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें भी हकीकत मालूम है, वे एक-दो बच्चे भी पालने को मुश्किल पा रहे हैं। इसलिए राजनीतिक फतवों, धार्मिक और साम्प्रदायिक फतवों का कोई वजन नहीं है, वे अधिक से अधिक अखबारी सुर्खियां पा जाते हैं, टीवी के चैनलों पर बेवकूफी की बहसों का सामान बन जाते हैं। लेकिन चन्द्राबाबू नायडू जैसे जिम्मेदार मुख्यमंत्री जब आबादी बढ़ाने का फतवा जारी करते हैं, तो वह किसी जात और धर्म के लिए है, वह किसी साम्प्रदायिक नीयत से नहीं हैं, वह उनके प्रदेश के हर व्यक्ति के लिए है, और उनके कहने के नीचे एक ठोस आर्थिक बुनियाद है। ऐसे ही नेता को इस तरह की बातें कहने का हक है जिसने बीते दशकों में अपनी जनता को अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार किया है। यह बात देश के बाकी राज्यों के नेताओं के सामने, केन्द्र सरकार के नेताओं के सामने एक बड़ी चुनौती है कि उनमें से कौन-कौन अपने लोगों को लिए तीसरे और चौथे बच्चे पर इस तरह की प्रोत्साहन राशि रखने का जायज हक रखते हैं? नाजायज हक से तो कोई भी नेता किसी भी तरह की मुनादी कर सकते हैं, लेकिन ठोस आर्थिक नीतियों के आधार पर, योजनाओं के आधार पर, अगली पीढ़ी को किसी भी मुकाबले के लिए तैयार करने की तैयारी के आधार पर ऐसा कहना एक अलग मायने रखता है। देखते हैं कौन-कौन से प्रदेश इस चुनौती को किस तरह लेते हैं।

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