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जातिसूचक गाली और ब्लैकमेलिंग मामले में हाईकोर्ट ने बरी करने का फैसला बरकरार रखा
15-May-2026 1:53 PM
जातिसूचक गाली और ब्लैकमेलिंग मामले में हाईकोर्ट ने बरी करने का फैसला बरकरार रखा

'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 15 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जातिसूचक गाली, धमकी और ब्लैकमेलिंग के आरोपों से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने रायगढ़ की विशेष अदालत द्वारा आरोपियों आनंद अग्रवाल और मांगे राम अग्रवाल को सबूतों के अभाव में बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराया।

यह फैसला न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल की एकलपीठ ने सुनाया। मामला रायगढ़ जिले के छाल गांव का है। शिकायतकर्ता नीलांबर सिंह ने 19 नवंबर 2009 को छाल थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी ग्राम पंचायत छाल की सरपंच थीं और पंचायत के निर्माण कार्यों में अनियमितताओं की खबर प्रकाशित करने की धमकी देकर आरोपियों द्वारा लंबे समय से अवैध वसूली की जा रही थी।

शिकायत में कहा गया था कि आरोपी आनंद अग्रवाल, पैसे नहीं देने पर शिकायतकर्ता और उनकी पत्नी को बदनाम करने, झूठी खबरें छापने और जेल भिजवाने की धमकी देते थे। आरोप यह भी था कि गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, दशहरा और दीपावली जैसे अवसरों पर भी पैसों की मांग की जाती थी। मांग पूरी नहीं होने पर जातिसूचक गालियां देने और अपमानित करने का आरोप लगाया गया था।

पुलिस ने मामले में आईपीसी की धारा 294, 506 (भाग-2), 384 और एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध दर्ज कर जांच के बाद विशेष अदालत में चालान पेश किया था। सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने 20 जून 2013 को दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता के मौखिक बयान और लिखित रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए गए। अदालत ने कहा कि जिन तारीखों पर अवैध वसूली और झूठी खबरें छापने की धमकी का आरोप लगाया गया था, उनका स्पष्ट उल्लेख अदालत में दिए गए बयान में नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने अदालत में गाली-गलौज की बात कही, जबकि मूल रिपोर्ट में इसका उल्लेख नहीं था। इसके अलावा शिकायतकर्ता की पत्नी को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। एक कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाह ने भी अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया, जबकि दूसरे गवाह को अदालत में प्रस्तुत ही नहीं किया गया।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया बरी करने का फैसला उचित है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।  

 


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