ताजा खबर

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अब कस्टमर ही किंग, और क्वीन...!
सुनील कुमार ने लिखा है
13-May-2026 4:22 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अब कस्टमर ही किंग, और क्वीन...!

इन दिनों ऑनलाइन शॉपिंग और आसपास के बाजार-दुकानदार को लेकर भारत में एक बहस चलती रहती है कि समाज के व्यापक हित में क्या है। इसमें दो-तीन तरह की तस्वीरें बनती है, पहली तो मोहल्ले, या शहर की पुरानी परंपरागत दुकानें हैं, जिनके मुकाबले अब हर शहर-कस्बे में सुपर बाजार खुलते जा रहे हैं, जहां लोग महीने का घरेलू सामान ट्रॉली भर-भरकर एक साथ खरीदते हैं, और 10-15 फीसदी तक बचत पा लेते हैं। ऐसी सारे सुपर बाजार  स्थानीय दुकानों की कीमत पर बढ़ते हैं और चलते हैं। लोगों को बड़े बाजारों में सामान रूबरू देखने और छांटने भी मिलते हैं, और हर सामान के साथ यह आकर्षक हिसाब-किताब लगे दिखता है कि उन्हें कितने फीसदी की रियायत मिल रही है। नतीजा यह हो रहा है कि मोहल्लों की छोटी दुकानें अब बंद होने की ओर बढ़ रही हैं, और सुपर बाजार हैं कि वहां कुछ कर्मचारियों को नौकरियां जरूर मिल रही है, लेकिन सबकुछ बहुत ही व्यवस्थित होने से कम रोजगार और अधिक कारोबार की बात भी इन बाजारों का मुनाफा बढ़ाती हैं। लेकिन ऐसे सुपर बाजारों को टक्कर देते हुए अब सामानों की घरेलू डिलीवरी का एक नया कारोबार शुरू हुआ है जो दुपहियों पर भाग-भागकर सामान डिलीवर करते हुए बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार भी दे रहा है, और गिगवर्कर कहलाने वाले ऐसे लोग देश में करोड़ों की संख्या में रोजगार पा रहे हैं। अब फल-सब्जी से लेकर किराना तक कुछ मिनटों में घर पहुंचाने के ये कारोबार लोगों को उनकी आदतें बिगाडऩे तक का तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं कि जब तक आपकी कढ़ाही में तेल गरम होगा तब तक राई-जीरा पहुंच जाएगा। फिर मानो लोगों की इतनी पसंद भी काफी न हो, ऑनलाइन खरीदी का हाल यह है कि लोग सौ-दो सौ रुपए के सामान भी सुपर मार्केट से सस्ता मिलने पर ऑनलाइन खरीद लेते हैं, और बहुत से सामान असंभव किस्म के कम दामों पर ऑनलाइन आ जाते हैं। इस बाजार ने लोगों की आदतें बिगाडऩे का अपना तरीका निकाला है, लोग इससे मंगाए कपड़ों को पहनकर और फोटो खींचाकर भी, रील बनाकर भी वापिस कर सकते हैं और कंपनियां बिना कुछ बोले पूरा भुगतान लौटा देती हैं। इन दिनों आप किसी को किसी मॉल में लेबल और प्राइज टैग लगे कपड़े पहने देखें तो समझ जाएं कि वापिस करना तय करके ही ऑनलाइन खरीदी की गई है। अब ऑनलाइन का बाजार देश और दुनिया में कारोबारियों के बीच इतने बड़े मुकाबले की जगह बन गई है कि लोग किसी एक सामान को दस-दस विक्रेताओं के बीच दाम और डिस्काउंट से भी तौलते हैं, और यह भी देखते हैं कि किससे सामान लेने पर उनके पास मौजूद किस बैंक के कार्ड पर अतिरिक्त छूट मिलेगी। ऑनलाइन खरीदी में छूट का यह सिलसिला और मुकाबला खत्म ही नहीं होता है। कुछ दशक पहले का भारत का ग्राहकों का बाजार अब एक सिर से दस सिरों वाला हो चुका है और ग्राहक के पास यह पसंद आ गई है कि वे किसी एक जगह से ऑर्डर किए गए सामान से सस्ता मिल जाने पर पहला ऑर्डर कैंसल करके दूसरी जगह ऑर्डर दे सकें। देश की अर्थव्यवस्था का चक्का जो कि बाजार में सुबह 10 से रात 10 के बीच घूमता था, अब ऑनलाइन बाजार में वह चौबीसों घंटे घूमता है। लोगों की खरीदी जरूरी सामानों से ऊपर निकलकर, आगे बढक़र बहुत सारे गैरजरूरी सामानों तक पहुंच गई है क्योंकि अब तीन सौ रुपए की टी-शर्ट भी 15 रुपए महीने की 20 किस्तों पर पाने के लिए ऑनलाइन उकसावा आते ही रहता है। क्या कभी कल्पना की जा सकती थी कि दो-चार सौ रुपए के सामान भी लोग रात के दो बजे दस किस्तों पर खरीद सकेंगे, और पसंद न आने पर बिना किसी खर्च के लौटा भी सकेंगे? इस सिलसिले ने भारत के सौ करोड़ से अधिक छोटे-बड़े ग्राहकों को एक अजीब किस्म की बादशाहत दी है, चाहे वह फटेहाल और खाली जेब हो, उन्हें यह अहसास कराया है कि वे अपने सपने भी खरीद सकते हैं और भुगतान बाद में किस्तों में कर सकते हैं। लोगों के सामने पसंद इतनी बड़ी हो गई है कि अब लोग ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों पर तरह-तरह के फिल्टर इस्तेमाल करके ब्रांड, दाम, मटेरियल, रंग, फिटिंग, प्रिंट जैसे दर्जनभर फिल्टर लगा सकते हैं, और किसी बड़े से बड़े मॉल में इतनी शर्तों वाली पसंद तक पहुंचने में लगने वाला घंटों का वक्त अब मिनटों का भी नहीं लगता है। बहुत सस्ते में सामान बेचने वाली कुछ शॉपिंग वेबसाइटें इतनी किफायती दिखती हैं कि घरों में झाड़ू-पोछा लगाने वाली कामगार महिलाएं भी उससे सामान बुला लेती हैं, और अधिक किफायत की हसरत में उनकी मालकिनें भी। इस किस्म के बाजार जमीन पर नहीं थे, ये बाजार ऑनलाइन ही मुमकिन थे, कभी भी बुलाना, कभी भी ठुकराना, कभी भी बदलवाना, ऐसा लगता है कि अब ग्राहक, ग्राहक न होकर किसी बहुत समर्पित मेजबान के घर पहुंचे बाराती हैं जिनकी खातिर ही खातिर होनी है।

अब अगर बाजार व्यवस्था के हिसाब से देखें तो देश में दसियों लाख छोटे-बड़े दुकानदार धंधे से बाहर होने को हैं, या हो चुके हैं। दूसरी तरफ इन दुकानों-कारोबारों से जितने लोगों का घर चलता था उससे शायद सौ-पचास गुना अधिक नए रोजगार डिलीवरी के लिए पैदा हुए हैं, और हर किस्म के शॉपिंग वेबसाइटों के डिस्पैच में भी दसियों लाख लोगों को काम मिला होगा। जिस तरह धरती के भीतर टेक्टॉनिक प्लेट खिसकने से भूकंप आते हैं, ज्वालामुखी भीतर फटने से बाहर हजारों मील तक धुआं और जाने कितने मील तक लावा बिखर जाता है, वैसे ही बाजार-कारोबार में भारत में पिछले 10-20 बरस में लगातार आए इस फेरबदल से कहीं कारोबार घटे हैं, तो कहीं रोजगार बढ़े हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच नदियों को देखें तो मानसूनी बाढ़ में कई नदियां ऐसी हैं जो किनारे एक गांव, या बस्ती के खेतों को बहाकर ले जाती है, और दूसरे किसी जगह उस मिट्टी को छोड़ देती है, कहीं खेत कम हो जाते हैं और कहीं मिट्टी के इलाके बढ़ जाते हैं। भारत के बाजारों का हाल कुछ ऐसा ही हो गया है, मोहल्ले का पुराना दुकानदार अब न सामानों के उतने ब्रांड रखता, न चीजों पर उतनी रियायत मिलती, अब वह एकाएक कुछ कम अच्छा लगने लगा है, और शॉपिंग के मोबाइल एप से लोकल ऑर्डर करते हुए अनगिनत किस्म के ब्रांड उनकी अलग-अलग साइज और पैकिंग, क्या नहीं दिखता, क्या नहीं मिलता, ग्राहक की मोहल्ले के दुकान से सात फेरों की शादी तो हुई नहीं है कि वे ऑनलाइन रंभा मोबाइल एप की अप्सरा, सुपर मार्केट की मेनका, इन सबको छोडक़र मोहल्ले की किराना दुकान से बंधे रहे।

यह अर्थव्यवस्था में टेक्टॉनिक प्लेट्स खिसकने से आया भूकंप है कहीं जमीन ऊंची उठ गई है, कहीं गड्ढा हो गया है, लेकिन कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था बढ़ गई है, लोगों की जरूरी, और उससे भी बढक़र गैरजरूरी खरीदी अंधाधुंध बढ़ गई है। इससे ग्राहक की फिजूलखर्ची भी बढ़ी है, लेकिन उसकी मनमर्जी भी बढ़ी है। एक लाइन ही सूझती है आज की इस बात को खत्म करने के लिए, अब कस्टमर ही किंग है, कस्टमर ही क्वीन है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


अन्य पोस्ट