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लैब रिपोर्ट को माना वैध, प्रक्रिया में नहीं मिली कोई खामी, मालिक की अपील खारिज
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 28 अप्रैल। शहर के तारबाहर स्थित मिष्ठान के प्रसिद्ध प्रतिष्ठान महेश स्वीट्स के संचालक महेश चौकसे की अपील हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा लगाए गए एक लाख रुपये के जुर्माने को बरकरार रखते हुए कहा है कि मिसब्रांडिंग एक गंभीर अपराध है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया और लैब रिपोर्ट पूरी तरह वैध है और इसमें किसी तरह की त्रुटि नहीं पाई गई।
मामला 15 अक्टूबर 2011 का है, जब खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने महेश स्वीट्स में निरीक्षण किया। जांच के दौरान अरारोट नाम से लेबल लगे मिठाई के 50 किलो के पैक्ड बैग का सैंपल लिया गया और उसे रायपुर स्थित राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला भेजा गया।
31 अक्टूबर 2011 को आई रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नमूना गुणवत्ता मानकों पर खरा जरूर है, लेकिन वह अरारोट नहीं बल्कि कॉर्न स्टार्च था। इस आधार पर इसे मिसब्रांडेड घोषित किया गया।
इस मामले में अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी ने 22 मई 2012 को खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 52 के तहत एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके खिलाफ सत्र न्यायालय में दायर अपील भी 2019 में खारिज हो गई थी।
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वे अरारोट या कॉर्न स्टार्च के व्यापारी नहीं, बल्कि खाद्य उत्पाद बनाने वाले हैं और यह नमूना केवल कच्चे माल का था। साथ ही यह भी कहा गया कि सैंपल की जांच रायपुर के बजाय गाजियाबाद की केंद्रीय लैब में होनी चाहिए थी।
वहीं राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई है और कार्रवाई पूरी तरह वैध है।
हाईकोर्ट ने सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि रायपुर की लैब अधिकृत है, इसलिए उसकी रिपोर्ट पूरी तरह मान्य है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गलत लेबलिंग (मिसब्रांडिंग) अपने आप में अपराध है, भले ही उत्पाद की गुणवत्ता सही क्यों न हो। साथ ही कोर्ट ने कहा कि खाद्य उत्पाद के व्यापार में शामिल व्यक्ति की भी जिम्मेदारी होती है और वह केवल निर्माता पर नहीं डाली जा सकती।
अदालत ने माना कि निचली अदालत का फैसला कानून और तथ्यों के अनुरूप है और उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है। इस आधार पर अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया गया।


