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हसदेव खनन पर रोक को लेकर सिंगल बेंच का आदेश बरकरार
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 24 अप्रैल। हसदेव अरण्य क्षेत्र को बचाने से जुड़ी याचिका में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अदालतें कानूनी ढांचे से ऊपर जाकर हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा व न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिका खारिज कर दी गई थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पर्यावरणीय क्षति की भरपाई केवल आर्थिक मुआवजे से नहीं हो सकती, यह विचार भले ही आकर्षक लगे, लेकिन जब भूमि अधिग्रहण और वन विचलन की प्रक्रिया कानूनी रूप से पूरी हो चुकी हो, तब न्यायालय उसमें दखल नहीं दे सकता।
खंडपीठ ने कहा कि अदालत पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन उसे सार्वजनिक हित और विकास कार्यों के बीच संतुलन भी बनाए रखना होता है। विशेष रूप से तब, जब परियोजनाएं काफी हद तक पूरी हो चुकी हों और उनका व्यापक जनहित से संबंध हो।
कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता अपने अधिकार या वैधानिक स्थिति को साबित करने में विफल रहे। साथ ही, मामले में देरी, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने और मूल आदेशों को चुनौती न देने जैसी कमियां भी सामने आईं।
मालूम हो कि याचिका में घुटबर्रा गांव के ग्रामीणों द्वारा अपने पारंपरिक वन अधिकारों के तहत जंगल और जैव विविधता की रक्षा का दावा किया गया था। ग्रामीणों ने 2011 में ग्राम सभा के जरिए खनन का विरोध किया था और 2012 में परियोजना रोकने की मांग भी की थी।
अदालत ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत इस स्तर पर पहले से स्वीकृत खनन और वन विचलन को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों और अंतिमता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने 8 अक्टूबर 2025 के एकल पीठ के निर्णय को सही ठहराया और अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।


