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हाईकोर्ट ने कहा- पीड़ित के पास वैध जाति प्रमाणपत्र नहीं था
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 23 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी अपराध को सिद्ध करने के लिए पीड़ित का वैध जाति प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है। अदालत ने इस आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 6 महीने की सजा को निरस्त कर दिया, हालांकि जुर्माने की राशि 500 से बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दी गई है।
यह फैसला न्यायमूर्ति एन.के. व्यास की एकल पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह ठोस रूप से सिद्ध होना जरूरी है कि पीड़ित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और आरोपी उस वर्ग से नहीं है। इसके लिए केवल मौखिक दावा पर्याप्त नहीं, बल्कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना आवश्यक है।
मामला करीब 21 वर्ष पुराना है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर विवाद के दौरान आरोपियों ने जातिसूचक गालियां दीं, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। इस आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धाराओं 294, 323, 506/34 और एससीएसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत मामला दर्ज किया था।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की। बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ता का जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी दस्तावेज था, जिसे सक्षम प्राधिकारी का वैध प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता।
अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल जाति बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध करना जरूरी है। इसी आधार पर सजा को रद्द किया गया, लेकिन आरोपियों पर जुर्माना बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दिया गया।


