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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 21 फरवरी। छत्तीसगढ़ में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा और असरदार फैसला आया है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि सीजी बोर्ड से जुड़ी प्राइवेट हिंदी और इंग्लिश मीडियम स्कूलों में 5वीं और 8वीं क्लास की सालाना परीक्षाएं अब स्कूल शिक्षा विभाग खुद कराएगा। ये फैसला उन कई स्कूलों के लिए झटका है जो बिना मान्यता के या संदिग्ध तरीके से चल रहे थे। लंबे समय से ये स्कूल अभिभावकों और बच्चों को सीबीएसई से जुड़े होने का झांसा देकर ठग रहे थे, जबकि उनके पास न तो सही मान्यता थी और न ही सरकार की इजाजत। अब सरकार स्तर पर परीक्षाएं होने से ऐसे स्कूलों पर शामत आएगी।
ये मामला छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई की क्वालिटी, पारदर्शिता और नियमों के पालन पर सवाल उठाए थे। जस्टिस एनके चंद्रवंशी की बेंच ने इस पर फैसला सुनाया और एसोसिएशन की याचिका खारिज कर दी। लेकिन साथ ही, शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने उपरोक्त फैसला दिया।
पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ की शिक्षा में कई बदलाव देखे गए हैं। 2024 में राज्य कैबिनेट ने 5वीं और 8वीं क्लास के लिए बोर्ड परीक्षाएं फिर से शुरू करने का फैसला लिया था, ताकि बच्चों की पढ़ाई का स्तर सुधरे। लेकिन 2025 में हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों को इन केंद्रीकृत परीक्षाओं से छूट दे दी थी, क्योंकि एसोसिएशन ने इसके खिलाफ याचिका दाखिल की थी। उस वक्त जस्टिस बीडी गुरु की बेंच ने प्राइवेट स्कूलों को पुराने पैटर्न पर परीक्षाएं कराने की इजाजत दी। अब 2026 में ये नया आदेश आया है, जो खासतौर पर सीजी बोर्ड से जुड़ी प्राइवेट स्कूलों पर लागू होगा। ये फैसला शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने और फर्जी स्कूलों पर नकेल कसने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
कई अभिभावक और शिक्षाविद इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। वहीं, कुछ प्राइवेट स्कूल संचालक इसे चुनौती मान रहे हैं। वे कहते हैं कि इससे उनके स्कूलों की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा।
सरकारी आदेश के बाद निजी स्कूलों की 5वीं, 8वीं बोर्ड परीक्षाओं में पेपर सेटिंग से लेकर मूल्यांकन तक सब कुछ सरकारी स्तर पर होगा।
मालूम हो कि इसके पहले नो-डिटेंशन पॉलिसी के चलते बच्चों को बिना फेल किए प्रमोट कर दिया जाता था, लेकिन बाद में माना गया कि इससे उनके सीखने की क्षमता पर विपरीत असर पड़ा है। अब परीक्षाओं से उनका असली स्तर पता चलेगा। हालांकि, कुछ राज्य जैसे कर्नाटक और तमिलनाडु में अभी भी नो-डिटेंशन पॉलिसी चल रही है।
हाईकोर्ट के इस फैसले का दूरगामी असर होने वाला है। माता-पिता अब अपने बच्चों के लिए बेहतर स्कूल चुन सकेंगे।


