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नयी दिल्ली, 11 फरवरी। उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश व्यापमं परीक्षा घोटाले में एक व्हिसलब्लोअर के खिलाफ जाति-आधारित हिंसा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कानून के शासन के प्रति निष्ठा के लिए अदालत को यह याद रखना आवश्यक है कि यदि इस जिम्मेदारी का सावधानीपूर्वक निर्वाह नहीं किया जाता, तो प्रक्रिया स्वयं ही सजा बन सकती है।
आनंद राय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 2022 में एक रैली के दौरान एक सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कथित हिंसा और दुर्व्यवहार से जुड़े जाति-आधारित अत्याचारों के मामले में आरोप तय करने को बरकरार रखा गया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने राय के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत लगे आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अदालत को जानबूझकर एक वास्तविक मामले और एक ऐसे मामले के बीच अंतर करना चाहिए जो केवल संदेह या अनुमान पर आधारित हो।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘प्रथम दृष्टया मामला न होने के बावजूद किसी मामले को आगे बढ़ने देना, किसी व्यक्ति को कानूनी आवश्यकता के बिना आपराधिक कार्यवाही के तनाव और अनिश्चितता के हवाले करना है। कानून के शासन के प्रति निष्ठा के लिए न्यायालय को यह याद रखना आवश्यक है कि यदि इस जिम्मेदारी का सावधानीपूर्वक निर्वाह नहीं किया गया तो प्रक्रिया स्वयं ही दंड बन सकती है।’’
मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप साबित करने के लिए कई तत्वों का मौजूद होना आवश्यक है।
पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत आरोपी को यह जानकारी होनी चाहिए कि पीड़ित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है या संपत्ति ऐसे व्यक्ति की है।(भाषा)


