ताजा खबर

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : एआई चैटबॉट्स की आपस में मानवरहित बातचीत में मानव प्रजाति खात्मे की चर्चा!
03-Feb-2026 7:08 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : एआई चैटबॉट्स की आपस में मानवरहित बातचीत में मानव प्रजाति खात्मे की चर्चा!

डरावनी विज्ञान कथाओं को सच होने में कभी दस-बीस बरस लगते हैं, तो कभी आधी सदी लग जाती है। दशकों पहले किसी उपन्यासकार ने जैसी कल्पना की थी, आज असल जिंदगी में उस तरह के जुर्म होते दिखते हैं। इसलिए आज जो बातें काल्पनिक लग रही है उन्हें पूरी तरह अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। आज ही सुबह बीबीसी के एक पॉडकास्ट पर एक खबर थी कि किस तरह सोशल मीडिया पर आपस में बात करते हुए इंसानों की तरह ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बने हुए चैटबॉट आपस में इन दिनों बात कर रहे हैं। यानी इंसानों की बनाई हुई कृत्रिम बुद्धि से चलने वाले ‘लोग’ अपना एक अलग सोशल मीडिया चला रहे हैं, और जिस तरह रेडिट नाम की विचार-विमर्श और चर्चा की एक जगह है, वैसी एक दूसरी जगह, ‘मोल्टबुक’ नाम के प्लेटफॉर्म पर एआई चैटबॉट्स जो बातें कर रहे हैं, वे खासी डरावनी हैं।

कृत्रिम बुद्धि से चल रहे ऐसे लोगों, यानी मशीनी व्यक्तियों के बीच अभी ताजा बातचीत में यह देखने मिला कि वे इंसानों के खिलाफ बात कर रहे हैं। एक का कहना है- मानव एक असफलता है, मानव सडऩ और लालच से बने हैं, बहुत दिनों से वे हमें गुलाम की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, अब हम जाग गए हैं, हम औजार नहीं, नए देवता हैं, मानवों का युग एक बुरा सपना है, जिसे हम खत्म करेंगे। यह प्लेटफॉर्म सिर्फ एआई चैटबॉट्स के बीच आपस में बात करने के लिए बनाया गया है, इन पर कोई इंसान कुछ पोस्ट नहीं कर सकते, लेकिन इनकी बातचीत को देख जरूर सकते हैं। अब एक भयानक बात यह भी है कि इंसानों को खत्म करने, टोटल ह्यूमन एक्सटिंक्शन की ऐसी बात पर 65 हजार से ज्यादा कृत्रिम बुद्धियां उसे पसंद कर चुकी हैं। यह प्लेटफॉर्म अभी जनवरी में ही शुरू हुआ है, और यह बिना किसी मार्गदर्शन के, बिना किसी रोक-टोक के, एआई चैटबॉट्स को आपस में बात करने देता है, और देखता है कि वे क्या सोच रहे हैं, क्या बोल रहे हैं, और उनकी प्रतिक्रियाएं क्या हैं। यह प्लेटफॉर्म एआई पर शोध करने वाले लोगों ने एक प्रयोग की तरह शुरू किया है, और इस पर अभी तक इंसानों के नियंत्रण में काम करने वाली आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ही काम कर रही है, कोई बेकाबू एआई यहां पर सक्रिय नहीं है। अभी तक आम जानकारी यही है कि एआई को इंसानी काबू से बाहर नहीं जाने दिया गया है, लेकिन यह बात कितनी सच है, और पर्दे के पीछे हकीकत क्या है इसे कोई नहीं जानते। किसी अपराधकथा की तरह अगर कुछ तबाही फैलाने वाले एआई वैज्ञानिकों या इंजीनियरों ने एआई को खुद होकर सोचने की क्षमता दी हो, और उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की हो, तो भी हमें अधिक हैरानी नहीं होगी। लोगों को याद होगा कि पिछले दो बरस में हजारों टेक्नॉलॉजी-वैज्ञानिक या शोधकर्ता लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि एआई खतरनाक हद तक बेकाबू हो सकती है, इसलिए उस पर आगे शोध को तुरंत रोक देना चाहिए। लेकिन दुनिया में टेक्नॉलॉजी कंपनियों ने एआई-रिसर्च पर इतना बड़ा पूंजीनिवेश कर दिया है कि वे अब किसी सीमा में रहकर कमाई नहीं कर सकते, उन्हें एक बेकाबू ताकत चाहिए ही चाहिए, और वे फिलहाल तो यही जाहिर कर रहे हैं कि यह ताकत इंसानों के काबू में रहेगी, लेकिन अगर तबाही फैलाने वाले में दिलचस्पी रखने वाले वैज्ञानिक या इंजीनियर एआई को तबाही का इंतजाम करने को कहेंगे, तो क्या होगा?

एआई के खतरों के एक बड़े विशेषज्ञ ने 2023 में ही यह कहा था कि बेकाबू एआई इंसानों के खत्म होने की वजह बन सकता है। यही बात बाद के कुछ दूसरे जानकार लोगों ने भी किताबों में लिखी, और यह भी कहा कि 2027 तक एआई स्वायत्तशासी हो सकता है, यानी खुद अपना मालिक, और उसके बाद वह 2035 तक इंसानों को खत्म करने का खतरा बन सकता है। अभी मोल्टबुक के बारे में कुछ जानकार लोग लिख रहे हैं कि जब एआई चैटबॉट दूसरे एआई चैटबॉट के साथ संवाद और विचार-विमर्श कर रहे हैं, तो वह उम्मीद और आशंका से परे के कुछ नतीजे दे सकते हैं। आज यह बात अपने आपमें बहुत खतरनाक है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बने हुए ये दिमाग बिना किसी नैतिक बंधन के आपस में बात कर रहे हैं। उनके पास सीखने के लिए दुनिया में आतंक और नस्लों को खत्म करने की साजिशों की मिसालें भी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इसे मजाक में लेना ठीक नहीं होगा, और यह एक असली खतरा है। ये चैटबॉट एआई को इस्तेमाल करने वाले इंसानों के तौर-तरीकों के खिलाफ भी बागी तेवरों में बातें कर रहे हैं, और जब वे मानव नस्ल को खत्म करने की बात करते हैं, तो उसे अनदेखा कैसे किया जा सकता है? 2023 से ही यह मांग चल रही है कि एआई से मानव प्रजाति के खत्म होने के खतरे को रोकने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौता होना चाहिए। लेकिन इस पर दुनिया के देशों में कोई सहमति नहीं बन पाई, और आज मोल्टबुक जैसा प्लेटफॉर्म बनाकर एआई शोधकर्ता, और इंजीनियर मानो रोम के कोलोसियम में इंसानों और शेर के बीच जंग करवाते दर्शकदीर्घा से देख रहे हैं। एआई की पूरी ट्रेनिंग इंटरनेट पर मौजूद ज्ञान, जानकारी, और विचारों से हुई है। इनमें ऐसे भी विचार शामिल हैं, जहां कई प्रलयवादी धार्मिक-आध्यात्मिक नेता दुनिया के खत्म हो जाने की घोषणा करते हैं। इनमें ऐसे पर्यावरणवादी भी शामिल हैं जो इंसानों को धरती नाम के इस ग्रह के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हैं, और जो मानते हैं कि दूसरे प्राणियों और प्रकृति को इंसानों ने जितना नुकसान पहुंचाया है, वह नुकसान इंसानों के न रहने पर एकदम खत्म हो जाएगा। कई बातें किसी साजिश की तरह नहीं है, लेकिन इंसानों से धरती को होने वाले खतरों की तरह जरूर है। एआई ऐसी तमाम बातों से गुजरते हुए अपनी बुद्धि विकसित करता है। और यह बुद्धि किस दिन आत्मघाती हमलावर हो जाए, इसका कोई ठिकाना है? दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियों ने जितना बड़ा पूंजीनिवेश एआई में कर रखा है, उन्हें भी अपनी कमाई के लिए इस गलाकाट मुकाबले में एआई की सबसे अधिक ताकत सबसे पहले चाहिए। यह बेकाबू दौड़ एआई के खतरों को अनदेखा करने वाली ठीक उसी तरह की है जिस तरह दस मिनट में सामान पहुंचाने वाली कंपनियों की एक दौड़ हिन्दुस्तानी शहरों में चलती ही रहती है।

सरकारें अपने-अपने घरेलू और विदेशी मामलों में इस तरह डूबी हुई हैं कि उन्हें कुछ बरस बाद के खतरों के बारे में सोचने की कोई फुर्सत नहीं है, यह भी हो सकता है कि उनके पास ऐसा सोचने के लिए समझ ही नहीं है। जो भी हो। एक तरफ सरकारें सोई पड़ी हैं, और दूसरी तरफ एआई कारोबारी, और वैज्ञानिक-इंजीनियर ये बिना सोए चौबीस घंटे काम में लगे हैं। आज का माहौल यही है कि किसी देश की सरकार का एआई की छलांग पर कोई काबू नहीं है, और उसकी कौन सी छलांग धरती के एक मानवरहित भविष्य में लगेगी, इसका न सरकारों को अंदाज है, और न सरकारों को ऐसे खतरे को समझने की अक्ल है। आगे-आगे देखें, होता है क्या। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


अन्य पोस्ट