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डाक कर्मी ही अपने परिजनों, मित्रों के नाम खाते खोलने मजबूर
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 2 जनवरी । प्रदेश का डाक अमला वित्त वर्ष के इन अंतिम दिनों में डाक जीवन बीमा (पीएलआई) और बचत खाते खोलने खुलवाने के दबाव में परेशान हैं। इसे पूरा करने वह अपने परिजनों, मित्रों के नाम से अनावश्यक रूप से खाते खुलवा रहा है। इसके चलते एक बार खुले खातों में दूसरी तीसरी किश्त के बाद लोग रकम जमा नहीं कर रहे।
मिली जानकारी अनुसार यह सिलसिला लिखित 3-4 वर्षों से जारी है। इसकी शुरुआत पूर्व में एक महिला सीपीएमजी के कार्यकाल से हुई थी। अपना टारगेट पूरा करने डाक कर्मी बड़े पैमाने पर डमी खाते और बीमा पालिसी खोलने से भी गुरेज नहीं कर रहे। जानकार कर्मचारियों ने बताया कि पालिसी खरीदने के समय ही एक दो माह प्रीमियम की किश्त जमा करने के बाद इतिश्री कर ली जाती है। मार्च अप्रैल तक एक दो किश्तों तक विभाग को करोड़ों का बिजनेस दिखाने का अवसर मिल जाता है। उसके बाद की किश्तें जमा नहीं की जाती। ऐसे 90% पालिसियां सालों तक प्रीमियम पेंडिंग में चली जाती हैं। कुछ ग्रामीण शाखा डाकपाल ही 10-20 प्रतिशत आरपीएलआई पालिसी की निरंतरता बनाए रखने में सफल हो पाते हैं।
पीएलआई की डमी पालिसी शहरी इलाकों के डाकघरों में बहुतायत में खोले जा रहे हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति आरडी, एमआईएस, और अल्प बचत खातों की भी है। डाक कर्मियों पर अक्टूबर से ही नए खाते खोलने खुलवाने का फरमानी दबाव आ जाता है। और फरवरी मार्च आते आते हर माह टारगेट बढ़ाने का क्रम जारी रहता है। इसका विरोध करने पर अफसरों के द्वारा सीआर बिगाड़ने, ट्रांसफर के साथ नोटिस देने जैसे उपक्रमों का इस्तेमाल किया जाता है।
बीते 3-4 वर्षों से इस दबाव से निपटने पोस्ट मास्टर, पोस्टल असिस्टेंट अन्य कर्मी अपने,परिजनों और मित्रों के नाम से खाते खुलवाने लगे हैं। इसके लिए डाक कर्मी अपने व्यय से 15-20 हजार रुपए लगाकर खाते खुलवाते हैं। टारगेट पूरा करने के एक साल बाद खाता बंद करवा दिया जाता है। इसके चलते एक एक डाक कर्मी के पास दर्जनों खाते हो गए हैं। अधिकारियों के बिजनेस टारगेट के दबाव में डाकघरों में डमी खातों की संख्या बढ़ती जा रही है। और रेवेन्यू कलेक्शन के नाम पर विभाग को किसी तरह का बड़ा फायदा नहीं होता। वहीं इसकी आड़ में कुछ अधिकारी खासकर उप संभागीय डाक निरीक्षक और उनसे वरिष्ठ अधिकारी अपने मातहत कर्मचारियों पर कार्रवाई का डर या कार्रवाई भी करने लगे हैं।


