ताजा खबर
आसपास की कुछ मामूली और सतही घटनाओं पर लिखने का आसान सा लालच छोडक़र जब दुनिया और मानव संस्कृति के व्यापक हित के मुद्दों पर लिखने का सोचें, तो चीजें सरहदें छोडऩे लगती हैं। जब आसमान के किसी पंछी की नजरों से, या अंतरिक्ष के किसी उपग्रह के कैमरे से धरती को देखा जाए, उसके मुद्दों को देखा जाए, तो देशों की सरहदें नहीं दिखतीं, सिर्फ उपमहाद्वीप दिखते हैं, समंदर और जमीन का फर्क दिखता है। ऐसे में बातें किसी एक देश के भीतर कैद नहीं रहतीं, वे सरहदों के आरपार कई देश या कई उपमहाद्वीप पार करते दिखती हैं। ऐसी ही एक बात यह लगती है कि क्या अब दुनिया में लोकतंत्र, चुनाव, संविधान, मानवाधिकार, बुनियादी हक, और मानवीय मूल्य की कोई जगह धरती पर रह गई है? आज दुनिया के अधिकतर देशों का जो हाल दिखता है, वह परले दर्जे की आत्मकेन्द्रित, आत्ममुग्ध, और स्वार्थी सरहदों का दिखता है, जिन्हें अपने से परे के भले से बहुत ही कम लेना-देना है। लोकतंत्र जो कि अभी हाल के दशकों तक दुनिया की सभ्यता में शासन व्यवस्था की सबसे अच्छी व्यवस्था माना जाता था, पिछले कुछ दशकों में इस रफ्तार से हाशिए पर चले गया है कि मानो सडक़ किनारे, फुटपाथ के पार, किसी बड़े शोरूम के शोकेस के चबूतरे पर बैठा हुआ लोकतंत्र दुनिया के राजपथ पर नंगा नाच देख रहा हो। आज दुनिया के बहुत से देशों में लोकतंत्र महज चुनावतंत्र रह गया है, और लोकतांत्रिक कहे और समझे जाने वाले चुनावों के भीतर भी वह महज एक बहुमत-तंत्र बन गया है, जो कि लोकतांत्रिक चाहे बिल्कुल भी न हो, वोटरों के अधिक बहुमत को जो सुहाता हो, वही निर्वाचिततंत्र आज लोकतंत्र मान लिया गया है। लेकिन क्या सचमुच ही लोकतंत्र कभी निर्वाचन, और बहुमत द्वारा निर्वाचन तक सीमित था? क्या वह कभी सिर्फ चुनाव का मोहताज था? क्या वह दो चुनावों के बीच लोकतंत्र के खात्मे पर भी उस तरह का तंत्र था जिसकी लाश हर पांच बरस में कब्र से निकालकर मेडागास्कर में समारोह मनाया जाता है? जिन्हें मेडागास्कर की यह परंपरा न मालूम हो उनकी जानकारी के लिए वहां पर लोग अपने दफन किए गए पूर्वजों की लाशों को हर पांच साल में कब्र से निकालते हैं, पूरा कबीला और रिश्तेदार इकट्ठा होते हैं, इन लाशों को निकालकर उन्हें नए कपड़ों में, या रेशमी कफन में सजाते हैं, नाच-गाने, ढोल-नगाड़े, और भोज के साथ उत्सव मनाते हैं। क्या यह सब कुछ कई देशों में हर पांच बरस में होने वाले चुनाव सरीखा नहीं लग रहा!
अभी किसी ने राममनोहर लोहिया का उनके वक्त का लिखा हुआ पोस्ट किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में पांच महाशक्तियों को मिले हुए वीटो के अधिकार को लोहिया ने एक किस्म से सवर्ण जाति व्यवस्था करार दिया था, और इस व्यवस्था के चलते हुए किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की संभावना को नकार दिया था। आज का माहौल संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह अप्रासंगिक बना देने का चल रहा है। ट्रम्प अपना एक घरेलू पांव-पोंछने किस्म का अंतरराष्ट्रीय मंच बनाना चाहता है जो कि कहने के लिए तो शांति कायम करने के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन वह उसे अपने निजी गिरोह की तरह बनाना चाहता है, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र नाम की पंचायत अप्रासंगिक हो जाए। दूसरी तरफ आधी सदी हो गई अमरीका और इजराइल बार-बार यह साबित कर रहे हैं कि फिलीस्तीन के मामले में संयुक्त राष्ट्र के कितने भी प्रस्ताव वे कुचल सकते हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। इसे देखते हुए यह लगता है कि आधी सदी पहले लोहिया का यह कहना कि दुनिया में बराबरी की जगह पांच ताकतवर देशों की जागीर बना देने का काम संयुक्त राष्ट्र में वीटो ने किया है। उन्होंने कहा था कि जहां पांच देशों को वीटो का अधिकार है, वहां न तो न्याय हो सकता है, न शांति। लोहिया का कहना था कि दुनिया में औपनिवेशिक शासन भले खत्म हुआ हो, जैसा कि हिन्दुस्तान में ब्रिटिश गुलामी खत्म हुई थी, लेकिन वीटो ने औपनिवेशिक शासन को नई शक्ल दे दी है। पांच देश (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, और चीन) पूरी दुनिया के फैसले रोक सकते हैं, रोक ही रहे हैं। आज अगर हम देखें तो फिलीस्तीन, यूक्रेन, सीरिया जैसे बहुत से मोर्चों पर संयुक्त राष्ट्र में वीटो लगाकर इनमें से कोई न कोई महाशक्ति यूएन के बहुमत और जनमत को रोक सकती है।
पिछले एक दशक में दुनिया में लोकतंत्र की बुनियाद खोखली होने की बात दुनिया के कुछ साखदार संस्थानों ने दर्ज की है। स्वीडन के वी-डेम इंस्टीट्यूट, और फ्रीडम-हाऊस जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट हैं कि दुनिया की बड़ी आबादी अब ऐसे देशों में रह रही है जिन्हें पूर्ण लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनावों के बीच नागरिक अधिकारों का दायरा लगातार सिमटता चला जाता है। मीडिया, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, और नागरिक समाज, इन सब पर धीरे-धीरे सत्ता का दबाव बढ़ता चला गया है। ऐसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती हैं कि लंबे समय से उदार लोकतंत्र का गढ़ माना जाने वाला योरप अब हंगरी और पोलैंड में बदले हालात झेल रहा है जहां संविधान और न्यायपालिका को सरकारों के अनुकूल ढालने की हमलावर कोशिशें हुई हैं, और जारी हैं। इन्हीं संस्थाओं की रिपोर्ट कहती है कि शरणार्थियों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर मानवाधिकारों की भाषा धीरे-धीरे राष्ट्रवादी उन्माद में बदलती जा रही है। योरप और उसके बाहर जो देश उदार लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के प्रतीक बने हुए थे, वे भी आज शरणार्थियों, विदेशियों, और नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर कट्टर रूख दिखा रहे हैं। इस संदर्भ में दुनिया भर में आज भारत के मौजूदा हालात, और यहां की राजनीति को भी आंका जा रहा है कि इस विशाल लोकतंत्र में आज लोकतंत्र किस तरफ जा रहा है, कितना बचा हुआ है।
इस मुद्दे पर दुनिया भर के जानकार विचारकों का लिखा हुआ पढऩा फिक्र खड़ी करता है कि किस तरह अमरीका में पिछले चुनाव हारने के बाद ट्रम्प ने अमरीकी संसद पर हमला करवाकर अमरीकी मतदाताओं के बहुमत के फैसले को भी खारिज करने की एक हिंसक कोशिश की थी। और इस बार तो ट्रम्प का रूख दुनिया के इतिहास से ही इंसाफ और लोकतंत्र नाम के शब्दों को हटा देने का है। इस बार ट्रम्प का सबसे बड़ा शिकार तो खुद अमरीका हुआ है जिसने अपने ढाई सौ बरस के इतिहास की अभूतपूर्व तानाशाही झेलना शुरू किया है, एक बरस गुजरा है, तीन बरस अभी बाकी है।
अब दुनिया के देश एक-दूसरे से रिश्ते रखते हुए फौज और कारोबार को सबसे ऊपर रख रहे हैं, अपने देश की हिफाजत, अपने लोगों के रोजगार सबसे ऊपर रख रहे हैं। दुनिया में जितनी महीन किस्म की चीजें हुआ करती थीं, वे धीरे-धीरे पिछले कुछ बरसों में चर्चा से भी बाहर होने लगी। किसी को याद है कि एक वक्त योरप के देश भारत से कालीन आयात करना बंद कर चुके थे क्योंकि इस देश में कालीन उद्योग में पतली और छोटी उंगलियों वाले बाल मजदूरों को बड़े पैमाने पर झोंका जाता था। किसी देश में बाल मजदूरी, किसी देश में कम मजदूरी, किसी देश में मजदूर कानूनों का कोई और उल्लंघन देखते हुए सभ्य कहे जाने वाले देश उनका बहिष्कार करते थे। आज हालत यह है कि पौन लाख फिलीस्तीनी लाशें गिर जाने के बाद भी अमरीका के साथ-साथ योरप के कुछ दूसरे देश भी इजराइल को हथियार देना जारी रखे हुए थे। एक तरफ जहां बाल मजदूरी की फिक्र की जा रही थी, वहां फिलीस्तीन में दसियों हजार बच्चों की बमों से मौत को भी सामान्य मान लिया गया है।
दुनिया में लोकतंत्र अब ताकतवर देशों की गिरोहबंदी, देशों के अपने आर्थिक और फौजी मतलब, अपने देश के धर्म, और अपनी नस्ल की बेहतरी, अपने रंग का बोलबाला, ऐसे तमाम मुद्दों में उलझकर रह गया है। सभ्यता ने मानो धरती का एक चक्कर काट लिया है, कुछ सौ बरस लोकतंत्र ने गुजारकर अब दम तोड़ दिया है, और सबसे ताकतवर की लीडरशिप वाली जंगली ताकत अब सभ्यता की नई परिभाषा बन गई है, वही अब लोकतंत्र है!


