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बहुत से लोग अपने बच्चों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं कि उनकी संगत किस तरह की है, किस तरह के बच्चों के साथ वे उठते-बैठते हैं, क्लास में वे सामने की बेंच पर बैठने वालों के साथ रहते हैं, या फिसड्डी समझे जाने वाले बच्चों के साथ? जिम्मेदार मां-बाप को यह फिक्र बहुत सताती है। बात सही भी है, बहुत से महान लोगों और विचारकों ने कुसंगति को लेकर कई बातें कही और लिखी हैं। लेकिन मां-बाप भी जिसे कुसंगति न गिनते हों, वैसी भी कुसंगति होती है।
आज का यह कॉलम मैं किसी जलती-सुलगती राजनीतिक बात को समर्पित नहीं कर रहा हूं, दुनियाभर में हो रही घटनाओं को भी एक दिन के लिए बख्श दे रहा हूं, क्योंकि आसपास के बच्चों की बड़ी फिक्र होती है, क्योंकि उनमें से बहुत से अपने मां-बाप की कुसंगति में हैं। बहुत सी ऐसी खामियां हैं जो कि मां-बाप से बच्चों में आ जाती हैं, और फिर चूंकि मां-बाप खुद उन्हीं खामियों के पुतले रहते हैं, उन्हें इन्हें दूर करना न सूझता है, न उनके बस में रहता है।
मुझे बहुत बरस पहले की एक बात याद है, मैं नौजवान ही रहा होऊंगा और हमारे मोहल्ले के पहचान के एक कॉलेज प्राध्यापक थे। सब जानते थे कि वे नशा भी करते थे। मैं जिस प्रेस में काम करता था उससे सौ कदम पर एक दारू भ_ी थी, भ_ी का मतलब वहां शराब बनती नहीं थी, लेकिन वहां देशी शराब बिकती थी जिसे लोग वहीं बैठकर पी लेते थे। एक दिन मैंने देखा कि ये प्रोफेसर साहब दिन की रौशनी में वहीं स्कूटर रोककर किनारे बैठकर दारू पी रहे हैं, और स्टैंड पर लगी उनकी स्कूटर पर उनकी, शायद 10-12 बरस की बेटी बैठी हुई थी। देखकर खून इतना खौला कि उनसे कोई बातचीत न रहने पर भी मैं रुका और जाकर उन्हें बहुत बुरी तरह झिडक़ा कि बेटी के सामने इस तरह दारू पीते शर्म नहीं आती? इतने शराबियों के बीच में बेटी को यहां बिठा रखा है? वह बात और तनातनी कहां तक पहुंची, वह अभी याद नहीं है, लेकिन अभी भी अगर कोई लोग अपने दुपहियों पर पीछे बच्चों को बिठाए हुए सिगरेट-बीड़ी पीते चलते हैं, और मैं किसी दुपहिए पर हूं, तो साथ-साथ चलकर उन्हें रोकता और टोकता जरूर हूं कि आपकी शौक के धुएं से हो सकता है कि आपके पहले पीछे बैठे आपके बच्चे को कैंसर हो जाए। बात बहुत हमलावर रहती है, कई लोग इस पर बहुत बुरी प्रतिक्रिया करते हैं, और मैं आत्मरक्षा के लिए पहले यह अंदाज लगाने की कोशिश कर लेता हूं कि यह आदमी जेब में चाकू रखने वाला तो नहीं होगा, उसके बाद ही नसीहत का प्रवचन शुरू करता हूं।
बहुत से ऐसे मां-बाप मैंने देखे हैं जो कि बच्चों को सिगरेट, तंबाखू, या गुटखा लाने भेज देते हैं। बच्चों के सामने इस किस्म का नशा करने वाले मां-बाप उन्हें यह मौन सहमति और अनुमति तो दे ही देते हैं कि जब उनकी उम्र हो जाए, वे भी यही काम कर सकते हैं। अपनी मिसाल से बड़ी और कोई नसीहत नहीं हो सकती। बहुत कम संख्या में, लेकिन कुछ मां-बाप ऐसे भी देखे हैं जो नाबालिग बच्चों को दारू लेने भी भेज देते हैं। वैसे तो शराब दुकानदारों को कमउम्र बच्चों को शराब देनी नहीं चाहिए, लेकिन कमउम्र बच्चों को तो किसी भी तरह का तंबाखू भी नहीं बेचना चाहिए, लेकिन दुनिया में भला कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों को नशा नहीं बेचा जाता, जहां बच्चों की देह नहीं बेची जाती?
लेकिन मैं इससे परे की कुछ बात करूं तो बहुत से मां-बाप या परिवार के बालिग सदस्य घर पर बात करते हुए बच्चों के सामने कई किस्म की नाजायज जुबान का इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग अबे, साले जैसी मामूली लगने वाली गालियां देते हैं, नतीजा यह होता है कि परिवार के भीतर न सही, बाहर ही बच्चे इनका इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। बहुत से लोग अपने बच्चों की किसी गलत जानकारी को झूठ कहने लगते हैं, और बच्चों को झूठा। मुझे खुद अपने परिवार में लोगों को यह समझाने में खासी बड़ी दिक्कत होती है कि गलत जानकारी, और झूठी जानकारी, ये दो बिल्कुल अलग-अलग बातें होती हैं। गलत जानकारी बिना किसी दुर्भावना के भी हो सकती है, लेकिन झूठ के पीछे एक कोशिश और एक भावना अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है।
छोटे-छोटे बच्चे भी उनके सामने होने वाली बातचीत से कब कैसे पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह बड़ों को पता भी नहीं चलता। अभी मैंने परिवार के एक छोटे 7 बरस के बच्चे से कहा कि तुम्हारी तस्वीर मैंने अपनी एक पाकिस्तानी दोस्त को भेजी थी, और उसने देखकर कहा कि तुम्हारी मुस्कुराहट मुझसे एकदम मिलती है। इस पर उसने कहा कि आपकी दोस्त पाकिस्तानी है? मेरे हां कहने पर उसका अगला सवाल था, पाकिस्तानी आपकी दोस्त कैसे हो सकती है? मैं सदमे में गाड़ी टकराते-टकराते रह गया और उससे कहा कि पाकिस्तान में तो मेरे बहुत से दोस्त हैं, पाकिस्तानी क्यों दोस्त नहीं हो सकते? तो उसके अगले जवाब ने मुझे कुछ राहत दी, और उसने कहा कि पाकिस्तान तो दूसरा देश है, वहां आपके दोस्त कैसे हो सकते हैं? मैं एकदम दहशत में आ गया था कि उसने 7 बरस की उम्र में कहीं यह तो नहीं सुन लिया था कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है। उसकी समस्या भौगोलिक थी, सांप्रदायिक नहीं थी, यह मेरे लिए राहत की बात थी।
लेकिन आज हिंदुस्तान में आपको ऐसे करोड़ों परिवार मिलेंगे जिनमें किसी दूसरे देश को लेकर, दूसरे धर्म या दूसरी जाति को लेकर नफरती बातें घर के भीतर होना बिल्कुल आम है। नतीजा यह है कि ऐसे परिवारों के बच्चे भी नफरत से सराबोर बड़े होते हैं।
मां-बाप परिवार में सौ किस्म की गलत बातें करते हैं, और बच्चे कब उन्हें सीख लेते हैं, कब उन्हें अपना पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह पता भी नहीं चलता।
मुझे दो घटनाएं याद हैं जिन्हें लेकर मैं उन परिवारों में दुबारा कभी नहीं गया। एक बहुत बड़े कारोबारी, जाहिर है कि किसी सवर्ण परिवार के रहे होंगे, उन्होंने यूं ही बातचीत करने के लिए एक दिन सुबह मुझे नाश्ते पर बुलाया। मैं रिपोर्टिंग करता था, और अलग-अलग किस्म के लोगों से मिलना मुझे अपने फायदे का लगता था। फिर एक संपन्न कारोबारी के घर नाश्ते पर कुछ सीखना कुछ खराब बात तो रहती नहीं। मैं उनके घर सुबह पहुंच गया।
उनकी बेटी, जो कि उस वक्त स्कूल और कॉलेज के बीच कहीं रही होगी, वह नाश्ता करा रही थी, हम सोफे पर बैठे हुए थे, और जाहिर है कि बीच के नीचे टेबिल पर नाश्ता रखने के लिए उस लडक़ी को बार-बार झुकना पड़ रहा था। परिवार बहुत संपन्न था, ऐसे काम के लिए नौकर भी हो सकते थे, लेकिन शायद मेहमान के सम्मान के लिए परिवार के लोग परोस रहे थे। वह लडक़ी कुछ ऐसे खुले गले का कपड़ा पहनी हुई थी जो कि परिवार के भीतर शायद अटपटा न रहा हो, लेकिन एक मेहमान के सामने, इस तरह झुक-झुककर नाश्ता रखते और परोसते हुए वह ड्रेस बड़ा ही अटपटा लग रहा था। मैं तो बाहरी व्यक्ति था, मेरी तो नीयत भी खराब हो सकती है कि मुझे ये बातें दिख रही थीं, लेकिन मेरा मानना है कि परिवार के लोगों को भी अपनी जवान होती लडक़ी के बारे में कुछ अधिक सावधान रहना चाहिए था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, मेरे मेजबान अपनी बद्जुबानी के लिए बड़े ही कुख्यात थे। बाहर जहां कहीं मैं उनको सुनता था, वे परले दर्जे की चुनिंदा गंदी गालियां बरसाते ही रहते थे। लेकिन मुझे इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि जिस वक्त मैं उनके घर पर उनके साथ नाश्ता करूंगा, उनकी कोई जवान बेटी नाश्ता परोसेगी, और उसकी मौजूदगी में ही ये कारोबारी धरती पर मुमकिन सबसे गंदी किस्म की गालियां देते रहेंगे, और गंदी जुबान बोलते रहेंगे। दोनों वजहों से नाश्ता गले उतरना मुश्किल हो गया था, किसी मेजबान की बेटी को उस तरह देखना भी मुझे ठीक नहीं लग रहा था, हालांकि उन दिनों मेरी खुद की उम्र बहुत कम थी। दूसरी बात यह कि मैं किसी मजदूर महिला की मौजूदगी में भी किसी ठेकेदार या मिस्त्री की दी जा रही गालियां बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं टोक देता हूं, या हट जाता हूं, लेकिन नाश्ता छोडक़र वहां से उस दिन उठ जाना मुमकिन नहीं था।
ऐसा ही दूसरा वाकया मेरे एक बहुत ही अच्छे परिचित परिवार में हुआ, और वहां भी मुझे पहली ही बार जाना पड़ा था। वहां भी परिवार की लडक़ी की घरेलू पोशाक देखकर मुझे लगा था कि मां-बाप को कुछ अधिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। परिवार संपन्न था, इसलिए यह भी बात नहीं थी कि लडक़ी के पास गिने-चुने कपड़े थे और मेहमान के सामने उन्हीं कपड़ों में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। फिर उस लडक़ी की पोशाक सिर्फ संपन्नता का फैशन नहीं थी, किसी भी मेहमान के सामने पहनने लायक फैशन वह नहीं थी। अगर कुदरत की तरफ से मुमकिन होता, तो मैं यह चाह रहा था कि मैं आंखें और कान घर छोडक़र आया होता, ताकि किसी परिचित की शायद नाबालिग लडक़ी की देह इस तरह न देखना पड़ता, और उसकी मौजूदगी में ही उसके बाप के मुंह से दुनिया की सबसे अश्लील गालियां, और अश्लील भाषा न सुननी पड़ती।
अब इन दो घटनाओं को लेकर मुझे लगता है कि क्या किसी लडक़ी को उसकी कुसंगति के लिए कोसा जाए कि दूसरी खराब लड़कियों के साथ रहते हुए वह खराब कपड़े पहन रही है जिनमें बदन तरह-तरह से झांक रहा है? यह तो वह अपने घर में, मां-बाप के सामने कर रही है, मां-बाप की इसे पूरी तरह मौन या खुली सहमति भी है। इन दोनों जगहों पर मेरा जाना पहले से तय था, परिवार को मालूम था कि एक अतिथि इस वक्त आएगा, और उसे नाश्ता कराते हुए भी परिवार को यह मालूम था कि लडक़ी किन कपड़ों में नाश्ता परोस रही है। हो सकता है कुछ लोगों को इसमें मेरी ही नजरों में खोट लगे कि मैं जहां जाता हूं वहां देह देखने लगता हूं, लेकिन मैं ऐसा संन्यासी बनकर दिखावा करना नहीं चाहता कि मैं ऐसे वक्त पर आंखें घर छोडक़र आया हूं।
लोग अपने परिवार में काम करने वाले घरेलू कामगारों की जाति को लेकर, उनके रूप-रंग को लेकर भी गंदी जुबान में बातें करते हैं, किसी को अच्छी जाति का कहते हैं, किसी को बुरी जाति का कहते हैं, किसी को काली-कलूटी कहते हैं, तो किसी को बदशक्ल कहते हैं। नतीजा यह होता है कि ऐसे सारे राजनीतिक और सामाजिक पूर्वाग्रह, आपकी सारी सांप्रदायिकता, धर्मांधता, इन सबको आपके बच्चे आपसे ही सीख लेते हैं, उन्हें किसी और कुसंगति की जरूरत नहीं पड़ती। अब इन बातों के लिए क्या कहेंगे? क्या यह कहेंगे कि मोहल्ले के बुरे बच्चों की संगति में बच्चे बिगड़ गए हैं? संगति तो आपकी ही है, और एक बात लिखना कुछ कड़वा होगा, लेकिन दुनिया में बच्चे सबसे बुरी बातें अपने परिवार की संगति में ही सीखते हैं। इसे गले उतारना कुछ मुश्किल लगेगा, लेकिन पानी या शरबत के साथ कोशिश करके देखिए, शायद उतर जाए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


