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35 साल पुराने विवाह में तलाक की मांग खारिज
01-Feb-2026 12:13 PM
35 साल पुराने विवाह में तलाक की मांग खारिज

हाईकोर्ट ने कहा, क्रूरता और परित्याग के ठोस सबूत चाहिए

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 1 फरवरी। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 35 वर्षों से चले आ रहे वैवाहिक संबंध को समाप्त करने की मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि इतने लंबे विवाह में क्रूरता और परित्याग जैसे गंभीर आरोप केवल सामान्य कथनों या अनुमानों के आधार पर स्वीकार नहीं किए जा सकते। अदालत ने पति की अपील निरस्त कर परिवार न्यायालय, बेमेतरा के फैसले को बरकरार रखा।

बेमेतरा जिले के निवासी गिरिधर दुबे ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। पति का कहना था कि उनकी पत्नी झगड़ालू है, मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है और पिछले 14–15 वर्षों से बेटी व दामाद के घर रह रही है। पेशे से पुजारी पति ने इन आधारों पर विवाह विच्छेद की मांग की।

पत्नी ने पति के आरोपों को चुनौती देते हुए कहा कि उनके चरित्र पर संदेह किया जाता था, अपशब्द कहे जाते और मारपीट की जाती थी। उन्होंने यह भी बताया कि वे उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पीड़ित हैं, लेकिन पति ने कभी इलाज का खर्च नहीं उठाया। परिस्थितियों के दबाव में उन्हें बेटी के घर रहना पड़ा।

परिवार न्यायालय, बेमेतरा ने 5 जुलाई 2023 को पति की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि पत्नी द्वारा दो वर्ष या उससे अधिक अवधि का जानबूझकर परित्याग सिद्ध नहीं हुआ। साथ ही, क्रूरता के आरोप अस्पष्ट और सामान्य पाए गए, जिन्हें ठोस साक्ष्यों का समर्थन नहीं मिला।

अपील पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की युगल पीठ ने कहा कि पत्नी का अलग रहना मात्र तलाक का आधार नहीं हो सकता। क्रूरता सिद्ध करने के लिए विशिष्ट घटनाएं, स्पष्ट आरोप और मजबूत प्रमाण अनिवार्य हैं। पति के गवाहों के बयान सामान्य और अविश्वसनीय पाए गए, जबकि महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट के अनुसार पत्नी के कथन अधिक विश्वसनीय प्रतीत होते हैं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि तलाक जैसे गंभीर मामलों में फैसले अनुमान या सामान्य आरोपों पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों पर आधारित होने चाहिए। चूंकि इस प्रकरण में न तो क्रूरता और न ही परित्याग सिद्ध हुआ, इसलिए अपील खारिज की जाती है।

 


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