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हवन भोग भंडारा के बाद भागवत कथा विश्राम ली-वागीश महाराज
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 27 जनवरी । गुप्त नवरात्रि पर पुरानी बस्ती स्थित श्री महामाया मंदिर में जारी श्रीमद् भागवत कथा यज्ञ महोत्सव का सोमवार को हवन भोग भंडारा पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ।भागवत कथा के प्रवचन कर्ता वृंदावन वासी मारुति नंदन आचार्य वागीश जी महाराज ने गणतंत्र दिवस के पावन पर्व का स्मरण करते हुए श्रद्धालुओं को भारत भूमि के लिए भगवान भी तरसते हैं। क्योंकि स्वर्ग में भागवत श्रवण का पुण्य नहीं मिलता। उन्होंने श्रद्धालुओं को जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा, गीत गवाया।
महाराज श्री ने कथा में बताया कि भगवान कृष्ण का एक नाम पृथ्वीधर है। उन्होंने पृथ्वी का उद्धार किया। महिषासुर को इंगित करते हुए बताया सही याने ब्राह्मण अर्थात ब्राह्मणों का अनादर नहीं करना चाहिए। यदि ब्राह्मण ना होते तो पृथ्वी का उद्धार नहीं होता। राजनीति अपनी जगह है, किंतु संगम में ब्राह्मणों की चोटियां खींची की गई।
महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को सचेत किया कि सबका खाता बही लेखा-जोखा ऊपर तैयार हो रहा है। यहां बच जाओगे चित्रगुप्त के खाते से नहीं बच पाओगे। दान का फल तब मिलता है, जब ग्रहिता उसके योग्य हो। उन्होंने कहा दान कम दो, अच्छा दो, उपयोगी दो। धन का उपयोग परमार्थ के लिए होना चाहिए। उपभोग तो अपने लिए होता ही है। हम अर्थ और स्वार्थ में जी रहे हैं। इसलिए जीवन व्यर्थ हो गया है। कोई दान करें उसे कभी रोकना मत दान को रोकने के लिए चतुराई बुद्धिमता का उपयोग गलती से मत करना। जो भी ब्राह्मण के धन को बलात प्राप्त करता है वह 60 हजार वर्ष तक मल मूत्र के बीच में समय व्यतीत करता है। द्वारिका में जो सभा है वह सुधर्म सभा है। इस सभा में भूख प्यास नहीं लगता। कितने लोग भी आ जाए एक आसन हमेशा खाली मिलेगा।
महाराज श्री ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए की सुदामा गरीब ब्राह्मण नहीं थे। वह मांगते नहीं थे, जो मिलता था उसमें संतोष करते थे। जो प्राप्त है वही पर्याप्त है। सुदामा को गरीब या भिखारी ब्राह्मण मत समझना। सबसे बड़ा अमीर सुदामा थे। उनके पास प्रभु रूपी धन संतोष रूपी धन था। खाने को अन्न नहीं, पहनने को वस्त्र नहीं, रहने को छत नहीं फिर भी मांगते नहीं थे। पत्नी का नाम सुशीला था। सुशीला का अर्थ सु शीला है। नारी को सुशील होना चाहिए।
उन्होंने नारी के श्रृंगार का वर्णन करते हुए कहा कंगन समर्पण, कमर का कर धन संयम, पायल सदाचारी का प्रतीक है। सुशीला ने चार घरों से चावल मंगा ताकि अलग-अलग घरों से मांगा गया चावल कोई छोटा मोटा टूटा होगा। सुदामा भले न जाने श्री कृष्णा जान जाएंगे की भिक्षा में मांगा गया चावल है। द्वारपालों ने सुदामा की स्थिति को देखते हुए कहा यह प्रभु का बाल सखा नहीं हो सकता। एक मुट्ठी चावल मानो तीनों लोग दे दिए। हंसी मजाक ना छोटे से करना चाहिए ना बड़े से करना चाहिए बल्कि बराबरी वालों से करनी चाहिए। नारद जी ने अधिकांश समय द्वारिका में बिताया क्योंकि चारों लोक में भ्रमण क्यों करूं जब मेरा प्रभु द्वारिका में है।
रायपुर के 10 दिवसीय प्रवास के बाद महाराज श्री आज वृंदावन वापस लौट गए। उन्हें माना विमानतल पर भव्य विदाई दी गई । न्यास समिति के अध्यक्ष व्यास नारायण तिवारी मंदिर व्यवस्थापक पं विजय कुमार झा एवं कार्यक्रम समन्वयक चंद्रशेखर दुबे विजय शंकर अग्रवाल एवं समस्त न्यासियों ने सभी का आभार, साधुवाद ज्ञापित किया है।


