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पीजी मेडिकल प्रवेश पर हाईकोर्ट ने साफ किया- संस्थागत आरक्षण जारी रहेगा, एमबीबीएस छात्रों को मिलेगा 50% आरक्षण
20-Jan-2026 1:26 PM
पीजी मेडिकल प्रवेश पर हाईकोर्ट ने साफ किया- संस्थागत आरक्षण जारी रहेगा, एमबीबीएस छात्रों को मिलेगा 50% आरक्षण

'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 20 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पीजी (पोस्ट ग्रेजुएट) मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश को लेकर अपने पहले के आदेश में बदलाव किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य के मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले छात्रों को संस्थागत कोटा  के तहत आरक्षण देना पूरी तरह कानूनी है। इस फैसले के बाद छत्तीसगढ़ के एमबीबीएस छात्रों को पीजी प्रवेश में 50 प्रतिशत सीटें मेरिट के आधार पर संस्थागत आरक्षण में मिल सकेंगी।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने अपने पूर्व आदेश के उस हिस्से को हटा दिया है, जिसमें राज्य सरकार को श्रेणी के आधार पर किसी भी तरह के अंतर से रोका गया था। अब यह स्पष्ट हो गया है कि संस्थागत कोटे के तहत आरक्षण देना कानून के दायरे में है।

यह मामला शुभम विहार निवासी डॉ. समृद्धि दुबे की याचिका से जुड़ा है। याचिका में छत्तीसगढ़ मेडिकल पीजी प्रवेश नियम 2025 के नियम 11(ए) और 11(बी) को चुनौती दी गई थी, जिनमें राज्य के मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले छात्रों को प्राथमिकता दी गई थी। 20 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने इन नियमों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 18 दिसंबर 2025 को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को हाईकोर्ट से स्पष्टीकरण मांगने की छूट दी। इसके बाद सरकार ने हाईकोर्ट में आवेदन दाखिल किया और कहा कि डोमिसाइल (निवास) आधारित आरक्षण समाप्त कर दिया गया है तथा अब केवल संस्थागत आधार पर ही प्राथमिकता दी जा रही है।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने तर्क दिया कि 50% एमबीबीएस सीटें ऑल इंडिया कोटा से भरी जाती हैं, जिनमें अन्य राज्यों के छात्र आते हैं। इसलिए यह डोमिसाइल आधारित भेदभाव नहीं है। एक दिसंबर 2025 को नियमों में संशोधन कर 50% सीटें संस्थागत कोटा और 50% सीटें ओपन मेरिट के लिए तय की गई हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि डोमिसाइल आधारित आरक्षण गलत है, लेकिन सीमित स्तर पर संस्थागत प्राथमिकता दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने अपने पुराने आदेश की वह शर्त हटा दी, जो सरकार को उम्मीदवारों में अंतर करने से रोकती थी।
अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के तन्वी बहल मामले के अनुरूप संस्थागत आरक्षण लागू कर सकेगी।


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