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दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : लड़कियों और महिलाओं के शोषण का नुकसान सिर्फ उन्हें नहीं, बाकियों को भी..
सुनील कुमार ने लिखा है
20-Jan-2026 4:19 PM
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : लड़कियों और महिलाओं के शोषण का नुकसान सिर्फ उन्हें नहीं, बाकियों को भी..

अभी इसी महीने राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप के दौरान दिल्ली के करीब फरीदाबाद की होटल में 17 साल की एक नाबालिग राष्ट्रीय स्तर की शूटर ने अपने कोच अंकुश भारद्वाज पर प्रदर्शन-मूल्यांकन के बहाने होटल के कमरे में बुलाकर यौन शोषण का आरोप लगाया। इसके बाद नेशनल रायफल एसोसिएशन ने इस कोच को निलंबित किया, और पाक्सो के तहत एफआईआर दर्ज हुई। लोगों को 2023-24 में भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप और सुप्रीम कोर्ट की दखल से लिखी जा सकी उनकी एफआईआर याद होगी। उस वक्त के इस सांसद पर अंतरराष्ट्रीय कैम्पों में नाबालिग पहलवान लड़कियों के यौन शोषण के आरोप लगे थे, और 2024 में सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद हुई जांच अदालत पहुंची थी। हरियाणा के रिवाड़ी में इसी बरस 2026 में एक हॉकी कोच को कोचिंग के दौरान 12वीं की छात्रा से बलात्कार करके उसे गर्भवती करने में गिरफ्तार किया गया। ऐसे मामले भारत में हर कुछ महीनों में सामने आते ही हैं। मध्यप्रदेश में उज्जैन और रीवां में प्रशिक्षकों ने नाबालिग एथलीट का देह शोषण किया, राजस्थान में भी जिम्नास्ट कोच पर ऐसा ही आरोप लगा।

2023 में संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था और यूनेस्को ने खेलों में लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें यह तथ्य लिखा गया था कि भारत में करीब एक तिहाई महिला खिलाडिय़ों ने पुरूष कोच से यौन शोषण, उत्पीडऩ, या गलत बर्ताव का सामा किया। यह आंकड़ा कई अध्ययन, सर्वेक्षण, और रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी पर आधारित था। जो भारत में राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के खेल संस्थानों में महिला खिलाडिय़ों की स्थिति बताता है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि यह इतना बड़ा अनुपात  पुरूष प्रशिक्षकों के दबदबे और उन्हें मिली हुई अनुपातहीन ताकत से जुड़ा है जहां प्रशिक्षक के अंधाधुंध अधिकारों के सामने नौजवान या नाबालिग खिलाड़ी लड़कियां अक्सर चुप रहती हैं क्योंकि उनका खेल जीवन खतरे में पड़ सकता है। भारत में यह समस्या अधिक गंभीर इसलिए है कि अधिकतर प्रशिक्षक पुरूष हैं, और महिला प्रशिक्षकों के अलावा भी महिला सहयोगी कर्मचारियों की कमी रहती है।

अभी 2026 में फरीदाबाद और हरियाणा के इन दो मामलों के सामने आने पर हमें इस मुद्दे पर लिखना जरूरी लग रहा है, और यह बात खेल से परे भी दूसरे कई दायरों पर भी लागू हो सकती है। हम खेल के संदर्भ में ही बात करें, तो जितने तरह का शोषण होता है, उसके लिए किसी न किसी अकेली जगह का इस्तेमाल होता है। कहीं मैदान या स्टेडियम के आसपास की इमारत का कोई कमरा, या खासकर किसी मुकाबले के दौरान होटल में खेल संघ के पदाधिकारियों, अधिकारियों, या प्रशिक्षकों के कमरों में ऐसा शोषण होता है। लगातार ऐसी शिकायतें बने रहने पर भी एक बहुत सहज और साधारण समाधान क्यों नहीं निकाला गया, यह हमारी समझ से परे है। किसी भी प्रशिक्षक या पदाधिकारी पर यह पूरी रोक रहनी चाहिए कि वे किसी भी खिलाड़ी से किसी बंद कमरे में न मिलें, और बेहतर तो यह हो कि वे अकेले में भी किसी जगह न मिलें। किसी महिला खिलाड़ी से किसी पुरूष प्रशिक्षक-पदाधिकारी मिलना हो तो आसपास या साथ में कोई दूसरी महिला खिलाड़ी, या महिला कर्मचारी अनिवार्य रूप से मौजूद रहे। किसी संघ का पदाधिकारी बनने, या टीम का प्रशिक्षक या फिजियोथेरेपिस्ट बनने के साथ ही इस तरह के घोषणापत्र पर दस्तखत करवाए जाने चाहिए, और हर खेल आयोजन, स्टेडियम, या दूसरी जगहों पर ऐसा नोटिस लगाया भी जाना चाहिए। बात सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, एक सबसे विकसित और कानूनी रूप से सबसे अधिक जागरूक देशों में से एक अमरीका में 2016 से 2018 के बीच अमरीकी जिम्नास्ट खिलाडिय़ों के बीच काम करने वाले लैरी नासर नाम के एक डॉक्टर ने इलाज के बहाने सैकड़ों लड़कियों का शोषण किया था। यह सिलसिला 1990 से उसने चला रखा था, जो कि 2016-18 के बीच सामने आया। 2015 में अमरीकी जिम्नास्टिक्स संघ को इसकी शिकायत मिली थी, लेकिन उसने इसे दबा लिया था। इस डॉक्टर ने अपने जुर्म का रिकॉर्ड भी रखा था, और चाइल्ड पोर्नोग्राफी के 30 हजार से ज्यादा सुबूत उसके कम्प्यूटर से पकड़ाए। उसकी शिकार पांच सौ से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं में ओलंपिक गोल्ड मैडलिस्ट लड़कियां तक शामिल थीं, और इनमें से एक ऐसी दिमागी हालत में पहुंच गई थी कि उसने ओलंपिक मुकाबले के बीच से हट जाना तय किया था। इस डॉक्टर को अलग-अलग मामलों में 60, 175, और 125 साल की कैद सुनाई गई। अमरीकी सरकार के न्याय विभाग ने इस मामले में अपने डॉक्टर की शिकार लड़कियों को कुल मिलाकर करीब 1150 करोड़ का मुआवजा दिया। इसके अलावा अमरीकी जिम्नास्ट संघ और ओलंपिक कमेटी पर भी मुकदमे चले, और वहां से भी करीब सवा चार सौ करोड़ का मुआवजा इन लड़कियों को मिला। 

भारत में हमें खिलाडिय़ों के शोषण पर ऐसे किसी मुआवजे का इंतजाम नहीं मालूम है। लेकिन यह बात चर्चा में आम रहती है कि प्रशिक्षकों, और खेल संघों के कई पदाधिकारी खिलाडिय़ों का शोषण करते हैं, उन्हें खुश किए बिना लड़कियों को न तो प्रशिक्षण-शिविरों में जाने मिलता, न ही किसी टीम में। यह पूरा सिलसिला भयानक दर्जे का अमानवीय मामला है, और खेल संघों पर जैसे ताकतवर लोगों का दबदबा रहता है, सत्ता से जुड़े हुए लोग हर तरह के खेल संघ पर देश से लेकर प्रदेशों तक काबिज रहते हैं, तो उनके खिलाफ किसी अदना सी खिलाड़ी की कोई शिकायत कहीं टिक भी नहीं पाती है। फिर बरसों की मेहनत से कोई खिलाड़ी लडक़ी जहां तक पहुंचती है, वहां किसी के खिलाफ शिकायत करने का एक मतलब यह भी निकलता है कि उसका आगे बढऩा बंद, और जहां है वहां से भी बाकी लोग मिलकर उसे हटा ही देते हैं।

स्कूल-कॉलेज, खेलकूद, दूसरे तरह के प्रशिक्षण और कार्यक्रम, तरह-तरह के आयोजन, एनसीसी या दूसरे सांस्कृतिक शिविरों को लेकर पूरे देश में एक साथ यह इंतजाम लागू होना चाहिए कि कोई भी पुरूष किसी लडक़ी या महिला से अकेले में न मिले। मिलना जरूरी हो तो सार्वजनिक और खुली जगह पर दूसरी लड़कियों और महिलाओं की मौजूदगी में ही बात करे। ऐसी हिफाजत इसलिए भी जरूरी है कि भारत में लड़कियों के हक सदियों से कुचले जाते रहे हैं, आज भी उन्हें बराबरी के मौके नहीं मिलते, और एक लडक़ी का शोषण हो जाने पर लाखों दूसरी लड़कियों के मां-बाप उन्हें बाहर भेजने से हिचकने लगते हैं। इसलिए सरकार या अदालत को दखल देकर एक बहुत साफ-साफ सुरक्षा निर्देश लागू करना चाहिए, जिसमें से एक बात हमने सुझाई है, लेकिन ऐसी और भी कई बातें जोड़ी जा सकती है, जोड़ी जानी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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