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हाईकोर्ट ने कहा- क्रूरता और कथित संबंध दोनों को पति ने स्वीकार कर लिया था
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 20 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले में निचली अदालत द्वारा पारित तलाक के आदेश को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि पति ने पत्नी द्वारा की गई कथित क्रूरता को माफ कर दिया था, क्योंकि एफआईआर और आपसी विवादों के बावजूद दोनों ने लगातार सात साल तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहकर वैवाहिक संबंध बहाल कर लिया था।
कोर्ट के अनुसार, पत्नी ने वर्ष 2008 में दहेज प्रताड़ना को लेकर आईपीसी की धारा 498-ए के तहत मामला दर्ज कराया था। 2009 में पति और उसके परिजन इस प्रकरण में बरी हो गए। इसके बाद वर्ष 2010 से दिसंबर 2017 तक दोनों साथ रहे। यह तथ्य इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पति ने कथित क्रूरता को माफ कर दिया था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पति को यदि पत्नी के किसी अन्य पुरुष से संबंध की जानकारी 2 अक्टूबर 2017 को थी, तो उसके बावजूद वह 17 दिसंबर 2017 तक पत्नी के साथ रहा। इससे यह सिद्ध होता है कि इस आरोप को भी पति ने व्यवहार में स्वीकार कर लिया था।
कोर्ट ने यह भी संदेह जताया कि यह आरोप तलाक याचिका में देरी से संशोधन के जरिए जोड़ा गया, जिससे इसकी विश्वसनीयता कमजोर होती है।
पत्नी ने परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने 498-ए की एफआईआर और कथित अवैध संबंध को क्रूरता मानते हुए पति के पक्ष में तलाक दे दिया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) के तहत तलाक का आधार इस मामले में बनता ही नहीं है।
मामले के अनुसार, पति-पत्नी का विवाह वर्ष 2003 में हुआ था। वर्ष 2017 में पत्नी के घर छोड़ने के बाद पति ने तलाक की कार्यवाही शुरू की, लेकिन हाईकोर्ट ने सभी परिस्थितियों को देखते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली और तलाक का आदेश रद्द कर दिया।


