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नयी दिल्ली, 19 जनवरी। उच्चतम न्यायालय ने मानसिक रोग से ग्रस्त बेघर लोगों को ‘‘बेहद संवेदनशील’’ बताते हुए सोमवार को कहा कि उनकी हालत ‘‘अत्यंत दयनीय’’ है। इसने केंद्र को उनके पुनर्वास के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के साथ आने का अंतिम अवसर दिया।
केंद्र सरकार के वकील द्वारा याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय और देने का अनुरोध किए जाने के बाद न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने जनहित याचिका मामले की सुनवाई के लिए नौ फरवरी की तारीख तय करते हुए ये टिप्पणियां कीं।
पीठ ने केंद्र की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नचिकेत जोशी से कहा, ‘‘हम आपको मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) को तैयार करने और जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दे रहे हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है और सबकुछ एसओपी के प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करता है। ये लोग बेहद दयनीय हालत में हैं और अत्यंत संवेदनशील हैं। कृपया अगली सुनवाई की तारीख पर एसओपी का मसौदा दाखिल करें।’’
वकील ने पीठ को सूचित किया कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर इस मामले में पेश होने वाले थे, लेकिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी और वह जवाब दाखिल नहीं कर सके।
अधिवक्ता गौरव बंसल व्यक्तिगत रूप से मामले में याचिकाकर्ता हैं। उन्होंने दलील दी कि यह तीसरी बार है जब केंद्र जनहित याचिका पर जवाब दाखिल करने में विफल रहा है, जिसमें मानसिक-सामाजिक दिव्यांगताओं से पीड़ित बेघरों के लिए नीति बनाने और उसे लागू करने के निर्देश मांगे गए हैं।
बंसल ने कहा, ‘‘यह मुद्दा उन बेघर लोगों से संबंधित है जो मानसिक रूप से बीमार हैं और भोजन की तलाश में सड़कों तथा सार्वजनिक स्थानों पर भटकते रहते हैं। उन्हें पुनर्वास की आवश्यकता है।’’ (भाषा)


