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'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 6 जनवरी। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत 109 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को राहत मिली है। वर्षों से लंबित नियमितीकरण विवाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से लेकर क्युरेटिव याचिका तक सभी स्तरों पर कर्मचारियों के पक्ष में फैसले आए हैं। अब इन कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी मानते हुए सभी सेवा लाभ देने का रास्ता साफ हो गया है।
इन 109 कर्मचारियों को 5 मार्च 2008 के राज्य शासन के आदेश के आधार पर 26 मार्च 2008 को नियमित किया गया था। 15 जनवरी 2009 को केंद्रीय विश्वविद्यालय बना और सभी कर्मचारी नियमित कर्मचारी के रूप में विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे। उन्हें 31 मार्च 2009 तक नियमित वेतन भी मिला। इसके बाद बिना किसी नोटिस के उनका वेतन घटाकर कलेक्टर दर पर कर दिया गया। इससे आहत कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
मामला लंबित रहते हुए 19 फरवरी 2010 को कर्मचारियों का नियमितीकरण आदेश रद्द कर दिया गया। इसके खिलाफ कर्मचारियों ने रिट याचिकाएं दायर कीं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 6 मार्च 2023 को आदेश दिया कि 2010 का रद्दीकरण आदेश टिकाऊ नहीं है और कर्मचारियों का नियमितीकरण वैध है।
सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए विश्वविद्यालय ने रिट अपील दायर की, जिसे खंडपीठ ने 21 जून 2023 को खारिज कर दिया। इसके बाद विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की, जिसे 15 मई 2024 को खारिज कर दिया गया। इतना ही नहीं, रिव्यू याचिका और फिर क्युरेटिव पिटिशन भी दायर की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2 दिसंबर 2025 को क्युरेटिव याचिका खारिज कर विवाद पर अंतिम विराम लगा दिया।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं करने पर कर्मचारियों ने अवमानना याचिका दायर की, जिसमें विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर, रजिस्ट्रार और एमएचआरडी सचिव को नोटिस जारी किया गया। इससे विश्वविद्यालय पर कानूनी दबाव और बढ़ा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय के नियमित कर्मचारी माने जाएंगे और नियमितीकरण अधिनियम 2009 की धारा 4(डी) के तहत उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। वे नियमितीकरण की तिथि से सभी लाभ पाने के हकदार होंगे। पूरे मामले में कर्मचारियों की ओर से दीपाली पांडे ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक प्रभावी पैरवी की।


