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बेटी के भरण-पोषण के लिए तैयार हुआ पिता, हाईकोर्ट ने मुकदमा खत्म किया
26-Nov-2025 12:51 PM
बेटी के भरण-पोषण के लिए तैयार हुआ पिता, हाईकोर्ट ने मुकदमा खत्म किया

छत्तीसगढ़' संवाददाता 

बिलासपुर, 26 नवंबर। हाई कोर्ट में जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन ने एक आदेश में कहा है कि अविवाहित बेटी की देखभाल, भरण-पोषण और विवाह का खर्च उठाने से कोई भी पिता पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने कहा कि बेटी का पालन-पोषण, शिक्षा और शादी का खर्च उठाना पिता का पवित्र उत्तरदायित्व है, जिससे वह मुकर नहीं सकता। अदालत ने यह भी कहा कि कन्यादान हिंदू पिता का पवित्र दायित्व माना गया है।

मसूरजपुर के एक व्यक्ति ने अपनी 25 वर्षीय अविवाहित बेटी के मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी। बेटी ने फैमिली कोर्ट में हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 और 3(बी) के तहत आवेदन देकर भरण-पोषण और विवाह खर्च की मांग की थी। उसका कहना था कि पिता सरकारी शिक्षक हैं, जिन्हें हर माह 44,642 रुपए वेतन मिलता है। वे दूसरी शादी कर चुके हैं और उसकी जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं।

फैमिली कोर्ट ने 2 सितंबर 2024 को आदेश दिया था कि पिता बेटी को शादी होने तक हर माह 2500 रुपए भरण-पोषण दें और विवाह के खर्च के लिए 5 लाख रुपए मुहैया कराएं। इस आदेश को चुनौती देते हुए पिता ने हाई कोर्ट में यह कहते हुए अपील की कि सुप्रीम कोर्ट के रजनीश बनाम नेहा केस के मुताबिक दोनों पक्षों ने शपथ पत्र नहीं दिया था, इसलिए फैमिली कोर्ट का आदेश गलत है।

डिवीजन बेंच ने पिता की दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अविवाहित बेटी खुद अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती और अधिनियम की धारा 3(बी)(2) में अविवाहित बेटी को भी भरण-पोषण की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसलिए पिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। फैसले में अदालत ने पूनम सेठी बनाम संजय सेठी के निर्णय का हवाला देते हुए दोहराया कि पिता अपनी अविवाहित बेटियों की देखभाल, शिक्षा और विवाह के खर्च से मुकर नहीं सकता।

सुनवाई के दौरान पिता की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि वह हर माह भरण-पोषण देगा और शादी के लिए तय किए गए 5 लाख रुपए तीन माह के भीतर जमा कर देगा। हाई कोर्ट ने इस आधार को लेते हुए अपील खारिज कर दी।

 


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