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कोयले की कमी बताकर निजी खिलाड़ियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश, जबकि देनदारी के चलते राज्यों ने उठाव ही नहीं किया
राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट
बिलासपुर, 27 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। बिजली संयंत्रों में अनेक कारणों से पैदा हुए कोयला संकट के नाम पर यात्री ट्रेनों को बंद करके रेलवे ने आपदा में अवसर तलाश लिया है। उसने मुनाफे का ग्रॉफ बढ़ाने के लिए कोयला परिवहन में 30 प्रतिशत तक वृद्धि की है पर लगे हाथ यात्री ट्रेनों का परिचालन मनमाने तरीके से रोक दिया है, जिसे वह घाटे का सौदा मानती है। गुड्स परिवहन के लिए फ्रैट कॉरिडोर पर रेलवे ने तेजी से काम नहीं किया तो आने वाले दिनों में ऐसा संकट लगातार आता रहेगा।
छत्तीसगढ़ से गुजरने वाली 12 पैसेंजर ट्रेनों को पिछले माह बंद करने के बाद रेलवे ने 23 अप्रैल को सूचना निकाली है, जिसमें मेल, एक्सप्रेस, सुपर फास्ट ट्रेनों का परिचालन एक माह से कम या अधिक निरस्त कर दिया है। रेलवे ने इस बात को कभी उजागर नहीं किया कि कोयले के परिवहन में तेजी लाने के लिए वह यात्रियों को परेशानी में डाल रहा है। लगातार परिचालन थमने के कारण रोष पैदा हुआ तब जाकर यह बात खुली। अभी भी रेलवे ने अधिकारिक रूप से यह नहीं कहा है कि कोयला या माल ढुलाई के कारण यात्री ट्रेनों को बंद किया जा रहा है। यह तो मुख्यमंत्री, मंत्रियों, क्षेत्रीय विधायकों की तीखी प्रतिक्रिया के बाद बात खुली। रायपुर के सांसद सुनील सोनी ने केंद्र का बचाव करते हुए यह बात कही कि बिजली संयंत्रों को कोयला नहीं दिया गया तो कई 6—7 राज्य अंधेरे में डूब जाएंगे।
भारतीय रेल की ओर से इसी सप्ताह जारी बयान में कोयला परिवहन में तेजी लाने को उपलब्धि के रूप में बताते हुए कहा गया है कि केंद्र सरकार के निर्देश पर उसने देशभर के बिजली संयंत्रों में कोयला पहुंचाने की गति उसने तेज कर दी है और यह उसकी प्राथमिकता में शामिल है। 25 अप्रैल को जारी बयान के अनुसार सितंबर 2021 से मार्च 2022 तक की 6 माह की अवधि में 32 प्रतिशत अधिक कोयला ढुलाई हुई है। रेलवे ने बताया कि 2021-22 के दौरान कोयले के परिवहन में रिकार्ड 111 मिलियन टन की वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष 542 मिलियन टन का परिवहन किया गया था, जबकि मार्च 2022 की समाप्ति में यह 651 मिलियन टन पहुंच गया। रेलवे ने कहा है कि कोयला ट्रेनों की आवाजाही को प्राथमिकता देने के कारण बिजली संयंत्रों में कोयले की कमी को 12 से 16 प्रतिशत तक दूर किया जा सका है। यह भी बताया गया है कि लोडिंग में लगने वाले समय में 10 प्रतिशत की कमी लाई गई है। कोयले की ढुलाई में तेजी लाने के लिए अतिरिक्त रैक की व्यवस्था भी की गई है, जिनकी संख्या का खुलासा नहीं किया गया है।
देशभर में यात्री ट्रेनों पर असर..
छत्तीसगढ़ के लोगों को इस बात से हमेशा नाराजगी रही है कि रेलवे को सर्वाधिक आय बिलासपुर जोन से मिलता है, पर सुविधाओं और सेवाओं के नाम पर उनके साथ छल किया जाता है। ममता बेनर्जी के कार्यकाल में यहां रेलवे ने मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की गई थी, पर पूरी नहीं हुई। जोनल मुख्यालय का केंद्रीय अस्पताल भी सर्वसुविधायुक्त नहीं बन पाया है। गंभीर मरीजों को सिम्स, अपोलो या दूसरे निजी अस्पतालों में इलाज के लिए जाना पड़ता है। राज्य बनने के बाद राजधानी रायपुर को प्रमुख शहरों से जोड़ने के लिए सुपर फास्ट ट्रेन, मेट्रो ट्रेन शुरू करने की मांग लंबे अरसे से की जा रही है। उसलापुर से डोंगरगढ़ को मुंगेली होते हुए नई रेल लाइन की मंजूरी तो मिली है पर बजट में इसके लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं होने के कारण काम लगभग रुका पड़ा है। कोविड महामारी के समय से छोटे स्टेशनों में स्टापेज बंद कर दिए, जिन्हें आंदोलनों के बाद भी शुरू नहीं किया गया है।
इसी तरह से रेलवे बार-बार महत्वपूर्ण और रोजाना हजारों यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने वाली ट्रेनों को बंद कर रही है। ऐसे फैसलों में जन प्रतिनिधियों और सलाहकार समिति के सदस्यों से कोई राय मशविरा भी नहीं किया गया।
24 अप्रैल की स्थिति में रेलवे ने 39 मेल और एक्सप्रेस ट्रेन कैंसिल कर रखी थी। अप्रैल महीने में मुंबई को जोड़ने वाली 14 ट्रेनों को निरस्त किया गया है। जो देश के विभिन्न भागों को जोड़ती हैं। रेलवे ने देशभर में 133 ट्रेनों को रद्द कर दिया था। आईआरसीटीसी की वेबसाइट में जानकारी है कि 26 अप्रैल को 116 ट्रेन पूरी तरह से और 35 आंशिक रूप से रेलवे ने रद्द की। जाहिर है इनमें से अधिकतर कोयले के परिवहन में तेजी लाने के उद्देश्य से किया गया।
परिवहन में इतनी भी तेजी नहीं
यात्री ट्रेनों को इतनी बड़ी संख्या में रद्द कर रेलवे ने अपनी ओर ध्यान तो खींच लिया है। उसका अप्रैल के कुछ दिनों में 30 प्रतिशत अधिक परिवहन चकित भी कर सकता है। पर कोल इंडिया के सालभर में जो उठाव कोयले का हुआ है, वह अप्रत्याशित नहीं है। कोल इंडिया ने स्टाक एक्सचेंज में जो ताजा विवरण दिया है उसके मुताबिक मार्च 2021 में समाप्त वित्तीय वर्ष में 574.5 मिलियन टन का उठाव हुआ था, वहीं मार्च 2022 को समाप्त वर्ष में 661.9 मिलियन टन उठाव था। यह बड़ा सवाल है कि क्या 12 माह की अवधि में 15 प्रतिशत अधिक कोयला जिनमें से कुछ का परिवहन सड़क मार्ग से भी किया गया होगा, की वजह से इतनी अधिक संख्या में यात्री ट्रेनों इतना अधिक रोका जाना क्यों जरूरी था। मार्च 2022 माह, जिसका भी आंकड़ा कोल इंडिया ने स्टॉक एक्सचेंज में दिया है, के अनुसार पूरी सात कंपनियों से उठाव में सिर्फ 3.3 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई। मार्च में 62 मिलियन टन कोयले का उठाव हुआ, जबकि इसके पहले मार्च 2021 में भी 60.1 मिलियन टन उठाव था। जाहिर है कि ये कोयला केवल रेल मार्गों से विद्युत संयंत्रों के लिए ही नहीं दिए गए बल्कि सड़क के रास्ते दूसरे उद्योगों को भी भेजे गए। दिलचस्प है कि जिस एसईसीएल को सर्वाधिक आपूर्ति के लिए जाना जाता है उसके उठाव में कोई वृद्धि नहीं हुई। यह पिछले 2021 के वित्तीय साल भी में 14.3 मिलियन टन था, इस बार मार्च 2022 तक भी इतना ही रहा। महानदी कोल फील्ड के उठाव में इस वर्ष मार्च में 2021 की तुलना में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डब्ल्यूसीएल में मार्च में 5.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ये तीनों कोल फील्ड्स ही हैं जिनसे भारी मात्रा में कोयले का परिवहन हो तो छत्तीसगढ़ से गुजरने वाले यात्री ट्रेनों पर असर पड़ सकता है। 25 अप्रैल की एक खबर के मुताबिक रेल मंत्रालय ने बताया है कि बीते वित्तीय वर्ष में 542 मिलियन टन की जगह पर 653 मिलियन टन कोयले का परिवहन रेलवे ने किया है जो बीते साल के मुकाबले 20.4 प्रतिशत अधिक है। अप्रैल 2022 में भेल से ज्यादा रैक हासिल कर पिछले साल के मुकाबले 10 प्रतिशत अधिक कोयला बिजली संयंत्रों को भेजने का लक्ष्य रेलवे ने रखा है।
इसी क्रम में यह जानना भी ठीक रहेगा कि कोल इंडिया के उत्पादन में भी कोई कमी कोरोना महामारी के काल में और उसके बाद नहीं आई है। कोल इंडिया की आधिकारिक जानकारी के अनुसार अप्रैल 2021 से मार्च 2022 तक 622.6 मिलियन टन कोयले का उत्पादन कोल इंडिया की एक छोड़कर सभी सात कंपनियों ने मिलकर किया, जो उसके पहले के वित्तीय वर्ष में हुए 596.2 मिलियन टन से 4.4 प्रतिशत अधिक है। मार्च 2022 माह में जरूर पिछले साल के मुकाबले 1.1 प्रतिशत जैसी मामूली कमी आई, पर इसका वर्तमान में हो रहे कोल ट्रांसपोर्ट से सीधे कोई संबंध नहीं है, क्योंकि उठाव पहले से स्टाक किए गए कोयले का हो रहा है। यात्री ट्रेनों को बंद करने से लोगों का ध्यान कोयला संकट की ओर खींचा जा रहा है। जबकि संकट कोयले का नहीं, बल्कि उसकी आपूर्ति की है। अनेक जानकारों का मानना है कि अनेक निजी कारोबारी जो कोयला खदानों की मंजूरी चाहते हैं, उनके पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है। राजस्थान सरकार ने हाल ही में अपने राज्य में कोयले की कमी बताकर छत्तीसगढ़ के परसा कोल ब्लॉक की मंजूरी प्राप्त कर ली है।
फिर हाहाकार क्यों मच रहा है?
पिछले साल सितंबर महीने में देश के 80 प्रतिशत ताप विद्युत संयंत्रों के पास एक सप्ताह से भी कम कोयले का स्टॉक बचा था। इस समय वित्त सचिव टीवी सोमनाथन ने आश्वस्त किया था कि कोयले की यह कमी अस्थायी है। नेशनल पावर पोर्टल पर फरवरी माह के उपलब्ध डेटा से पता चलता है बिजली उत्पादन इकाइयों में कोयले का मौजूदा स्टॉक 9.8 दिनों का है जो मानक 24 दिनों के स्टॉक का 38 प्रतिशत था। महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे औद्योगिक राज्य इससे सबसे ज्यादा प्रभावित थे। इन राज्यों के कुछ बिजली संयंत्रों में 4-6 दिन का ही कोयला बचा था। इस समय स्थिति उतनी गंभीर नहीं है, पर कोयले का संकट गहराया है। इसकी वजह आयातित कोयले में भारी कमी आना। इसके दाम रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद 65 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। चीन सहित दुनिया के कई देशों में बिजली संयंत्रों में कोयले की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। आयातित कोयले की कमी के चलते कोल इंडिया से अधिक कोयले की मांग हो रही है। इसके चलते ही रेलवे को तेजी से ढुलाई का टास्क दिया गया है। कोल इंडिया ने भी गैर बिजली उत्पादक उद्योगों में आपूर्ति 40 से 50 प्रतिशत घटा दी है ताकि बिजली संयंत्रों के स्टाक में अक्टूबर 2021 की तरह कमी न आए।
राज्यों ने नहीं की पहले से तैयारी
कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के खत्म होने के बाद अर्थव्यवस्था में तेजी आई और बिजली की मांग 17 प्रतिशत तक बढ़ गई। भारत कोयले का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है लेकिन खपत की वजह से उसे दूसरे देशों से आयात करना पड़ता है। आयात के मामले में यह दूसरे नंबर पर है।
अक्टूबर 2021 में जब कोयले का संकट आया तब कोल इंडिया की तरफ से साफ कहा गया कि उनके पास कोयले का पर्याप्त भंडार है। समस्या परिवहन की है। पर परिवहन क्यों नहीं हुआ? महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की अनेक बिजली कंपनियों का कोल इंडिया पर भारी बकाया है, ऐसी स्थिति में वे युद्ध की वजह से पैदा हुए संकट और आने वाले मानसून के दौरान परिवहन में बाधा की स्थिति से अवगत होते हुए भी तुरंत की जरूरत के मुताबिक कोयले का ऑर्डर करते रहे। अब जब मानसून करीब है और आयात के जरिये कोयला कम आ रहा है तो इन राज्यों ने अक्टूबर 2021 को नहीं दोहराने के लिए तैयारी शुरू की है। रेलवे पर इसलिए भी दबाव बढ़ गया है।
यात्री ट्रेनों को बंद करना कितना जरूरी?
ऊपर दिए गए आंकड़े बताते हैं कि तमाम कवायद के बावजूद रेलवे कोयले के परिवहन में अपेक्षित तेजी नहीं ला पाई है। बिजली संयंत्रों में कोयले की कमी को 10-12 प्रतिशत दूर करने का उसका खुद का दावा है, फिर इतनी बड़ी संख्या में ट्रेनों को बंद करने की वजह क्या है? रेलवे ने कोविड की पहली लहर के बाद एक वक्तव्य में बताया था कि यात्री ट्रेनों से उसकी आमदनी 71.03 प्रतिशत सन् 2020-21 वित्तीय वर्ष में 71.03 प्रतिशत घट गई। उसे सिर्फ 12 हजार 409 करोड़ रुपये मिले। इसी दौरान ट्रैक खाली होने पर रेलवे ने तेजी से माल ढुलाई की जिससे 1800 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी हुई। रेलवे ने घाटे की भरपाई करने के लिए ही अनेक यात्री ट्रेनों को अब तक शुरू नहीं किया है। रियायती टिकट भी खत्म कर दिए हैं। वैसे एनडीए सरकार आने के बाद से ही यात्रियों के प्रति उपेक्षा बरती जाती रही। टिकटों में लिखा जाने लगा कि यात्री ट्रेनों के परिचालन का 49 प्रतिशत खर्च रेलवे खुद उठाती है, यानि खर्च का 51 प्रतिशत ही यात्री से किराये के रूप में लिए जाते हैं। हालांकि रेलवे के इस नजरिये की लोगों को आपत्ति थी। बिलासपुर रेलवे जोन में ही समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में रेलवे को 23 हजार करोड़ रुपये का राजस्व मिला है। पर इसे मिला-जुलाकर नहीं देखा जा रहा है।
फ्रेट कॉरीडोर की तरफ ध्यान नहीं
ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए रेलवे को भी परिवहन के लिए अतिरिक्त खाली ट्रैक की जरूरत पड़ रही है। पर ट्रैक खाली नहीं मिलते तो यात्री ट्रेनों को रोका जा रहा है। रेलवे ने लक्ष्य रखा है कि जिन राज्यों में माल परिवहन के लिए ट्रैक ज्यादा व्यस्त हो जाते हैं वहां डेडिकेटेड ट्रैक तैयार होने चाहिए, जो सिर्फ माल परिवहन के काम आएं। इससे यात्री ट्रेनों के परिचालन में बाधा नहीं आएगी। इस पर काम काफी धीमी गति से हो रहा है। इसके लिए अकेले केंद्र या रेलवे की जिम्मेदारी नहीं है। अगस्त 2020 में तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोयल ने 9 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था कि 81 हजार करोड़ की लागत से बनने वाले फ्रेट कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण संबंधी कार्यों में तेजी लाएं। राज्य के अधिकारी इसमें रुचि नहीं ले रहे हैं, उन्हें सक्रिय करें। पर इन दो सालों में केवल एक फ्रेट कॉरिडोर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश के खुर्जा-भाऊपुर के बीच किया है।


