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वन्यजीवों की मौत पर बहानों का इत्र ना सींचें अफसर
07-Apr-2022 9:25 AM
वन्यजीवों की मौत पर बहानों का इत्र ना सींचें अफसर

बिलासपुर का चिड़ियाघर कानन पेंडारी मृत्यु शैय्या पर है। यहां हर दुर्भल जीव की मौत हो रही है। उम्रदराज बाघिन चेरी का शिकार उसके नाती भैरव ने नाइट इंक्लोजर में घुस कर 4 अप्रैल को किया। इस घटना से जू की चूलें हिल गई। जाहिर हुई है जू की अव्यवस्था और अफसरशाही की मगरूर हालत।

दशकों पहले इस जू का जो सपना विधानपुरुष मथुरा प्रसाद दुबे ने देखा था, वह खण्डित हो गया है। तीन साल में यहां बंदी वन्यजीवों की मौत का आंकड़ा अपने में रिकार्ड है। इनमें टाइगर, भालू, हिपोपोटेम्स जैसे अत्यंत दुर्भल जीव शामिल हैं।

कभी यहां फारेस्टर ठाकुर विश्वनाथ कार्यरत थे। 16 साल यहां रहकर वे डिप्टी रेंजर पद से रिटायर्ड हुए। वे वेतन तो सरकार से लेते थे, पर काम जू के वन्यजीवों के लिए करते। युवा शेर उनको देखता तो जंगले से पीठ उनकी तरफ करता और चाह करता था कि- आओ दुलार कर दो। मगरमच्छ को वे बुलाते तो दूर से तैरता चला आता। दरियाई घोड़ा भी उनको पहचानता थ। डॉ पीके चंदन और जू प्रभारी रहे जायसवाल भी वन्यजीवों के हमदर्द माने जाते रहे।

लेकिन अब जू के वन्य जीवों से अधिक यहां के अफ़सरों को अपने आला अफसरों के सत्कार की फिक्र है। रायपुर से वन विभाग के एक आला अफसर 4 अप्रैल को अचानकमार के कोर जोन में ट्रैकिंग के लिए आए तो इस जू के अफ़सर उनके सत्कार में लगे थे। बाघिन चेरी की मौत की खबर उनको वहीं मिली। ऐसा तो गुलामी के दौर में भी नहीं होता रहा होगा।

कानन पेंडारी जू के जीव किन अफ़सरों के हवाले है, यह अब साफ है। जू में मूक जीव हैं। क्या ये अफ़सर उनकी बात और तकलीफ समझते होंगे? इनकी प्राथमिकता ही कुछ औऱ लग रही है।

जंगल में टाइगर बेवजह कभी शिकार नहीं करता। वन में चीतल सांभर उसे नहीं देख पाए या अलार्म काल नहीं होती हो, तो उनको भी पता नहीं लगता और देखकर भी अनदेखा कर टाइगर उनके नजदीक से गुजर जाता है, बस पेट भरा होना चाहिए। एक शिकार के बाद वह दो तीन दिन तक उसे चाव से खाता है। झुंड में छांट कर कमजोर, बीमार जीवों का ही टाइगर शिकार करता है। इस बात को सभी जानते हैं।

इस सबके मद्देनजर यह कहना लाजिमी होगा कि जू में टाइगर भैरव उस रात बहुत भूखा होगा और वह अपने नाइट इंक्लोजर से निकलकर किसी तरह टाइग्रेस चेरी के एरिया में पहुंचकर उसे शिकार बनाया हो।

जू में नौकरी को वन्यजीवों की सेवा मानने वालों की कमी है। इसे समय और पैसे से ऊपर मानने वाले ठाकुर विश्वनाथ जैसे वनजीव प्रेमियों की आज दरकार है। अब भी वक्त है विश्वनाथ जैसे एक दो और रिटायर्ड कर्मियों को जू एडवाइजर के रूप में जोड़ा जाए। सम्मान और सम्मान राशि दी जाए। उनके अनुभवों के लाभ से बीमार चल रहे जू और कर्मचारियों में वन्यजीव के लिए अपनत्व का बीजारोपण स्वमेव हो जाएगा। काम में सरकारी और अफसरशाही इस जू की बीमारी की जड़ है, जिसका उन्मूलन नितांत जरूरी है।

-प्राण चड्ढा, वन्यजीव प्रेमी व वरिष्ठ पत्रकार


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