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जिलों में रजिस्ट्री ठप्प, फैसला जल्द
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 15 जनवरी। सरकार जमीन की गाइडलाइन दरों का पुनरीक्षण करने जा रही है। इस कड़ी में जिला मूल्यांकन समिति ने आपत्तियों का परीक्षण कर पुनरीक्षण का प्रस्ताव तैयार कर रही है। इस पर फैसला जल्द होने की उम्मीद है। खास बात ये है कि गाइड लाइन दरों में भारी वृद्धि के चलते प्रदेश के तकरीबन सभी जिलों में जमीन की रजिस्ट्री में काफी कम हो गई है।
आईजी (रजिस्ट्रेशन) पुष्पेन्द्र मीणा ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में बताया कि नई गाइडलाइन दरों पर आपत्तियों का परीक्षण परीक्षण जिला मूल्यांकन कमेटी कर रही है, और यह अंतिम चरण में हैं। उन्होंने कहा कि जिलों के प्रस्ताव आने के बाद जल्द ही पुनरीक्षण पर फैसला लिया जाएगा।
बताया गया कि जमीन की नई गाइडलाइन दरों पर घोषणा के बाद से विशेषकर रायपुर, दुर्ग, और राजनांदगांव में जमीन की रजिस्ट्री नहीं के बराबर हो रही है। इन जिलों में गाइड लाइन दरों में भारी वृद्धि पर काफी आपत्तियां आई है, और दरों की घटाने की मांग जोरशोर से हो रही है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल के अलावा कई सांसद और विधायकों ने सीएम विष्णुदेव साय से गाइड लाइन दरों को कम करने की मांग की है।
सरकार ने सात साल बाद जमीन की गाइडलाइन दरों में बढ़ोतरी की है। गाइडलाइन दरों में कई जगहों पर एक हजार फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई। इसका चौतरफा विरोध हुआ, और कुछ संशोधन किए गए। साथ ही दरों पर 31 दिसंबर तक आपत्तियां बुलाई गई थी। सबसे ज्यादा आपत्ति रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, और राजनांदगांव जिले में आई है। अंबिकापुर, जशपुर, रायगढ़ और कोरबा में भी गाइडलाइन दरों को लेकर काफी आपत्तियां आईं हैं।
आपत्तियों में यह कहा गया कि जमीन की वास्तविक कीमत से अधिक गाइडलाइन दर हो गई है। सूत्रों के मुताबिक आपत्तियों का परीक्षण चल रहा है। कहा जा रहा है कि कुछ जगहों पर जहां गाइडलाइन की दरें ज्यादा बढ़ गई है, वहां दरों में कमी की जा सकती है।
चर्चा है कि गाइड लाइन दरों में न्यूनतम 20 फीसदी से अधिक की कमी हो सकती है। कुछ जगहों पर गाइडलाइन दरों सौ फीसदी तक कमी हो सकती है।नई गाइडलाइन दरों में भारी वृद्धि के चलते जमीन के कारोबार पर असर पड़ा है।
दूसरी तरफ, जमीन के कारोबारी नई गाइडलाइन दरों के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की भी तैयारी कर रहे हैं।यह बताया गया कि सरकार ने गाइडलाइन दरों पर आपत्ति-दावे बुलाए बिना दरें लागू की हैं। कारोबारियों का कहना है कि दरों में संशोधन नहीं किया जाता है, तो हाईकोर्ट का विकल्प तैयार है।


