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उपचुनाव विशेष-2
चुनाव नामक फिल्म के दर्शक बनने को मजबूर बंगाल के लोग
आसनसोल से बिकास के शर्मा
साल 2020 की शुरुआत में ही कोरोना काल ने देश में दस्तक दी थी। पूरा वर्ष कोरोना की चपेट में रहा और जैसे ही 2021 का आगमन हुआ पश्चिम बंगाल राज्य में विधानसभा के चुनाव हेतु अलार्म बज गया। साल 2021 में फरवरी से लेकर जून तक चुनावी माहौल ही रहा और जैसा कि प्रैक्टिस में है चुनावी दंगल के चालू रहने से किसी भी सरकारी दफ्तर में माहौल भी चुनावी ही होता है।
डेढ़ वर्ष तक कोरोना की मार झेल चुके लोगों के सामने विधानसभा चुनाव एकाएक ही आ गया था क्यों कि ज्यादातर जनमानस को विधानसभा चुनाव के टलने की आश्वस्ति थी। लेकिन कोरोना के बीच में ही राज्य विधानसभा के चुनाव हुए, यद्यपि पूरी एहतियात के साथ कोविड 19 के निर्धारित नियमों के तहत की चुनाव संचालन किया गया। विधानसभा चुनाव में कोरोना काल में ज्यादातर लॉकडाउन की मार झेलने वाले लोगों ने घरों से बाहर निकलने का सुनहरा मौका नहीं छोड़ा और 82.3 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था।
चुनाव बीता और तृणमूल की ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन भी हो गया। विधानसभा के चुनाव के बाद पांच सीटों पर पिछले साल सितम्बर से नवंबर के मध्य उपचुनाव किए गये। भवानीपुर में ममता बनर्जी ने जीत दर्ज की जिसके बाद खर्दहा, शांतिपुर, दिनहाता एवं गोसाबा विधानसभा सीटों के लिए में अक्टूबर माह में उपचुनाव आयोजित किए गये। सबसे चौंकाने वाली बात यह हुई कि विधानसभा के उपचुनाव संपन्न होते ही नववर्ष 2022 ने दस्तक दी और लोगों के अंदर एक नया उत्साह जागा।
चीजें प्लान की जा रहीं थीं और साधारण जिंदगी पटरी पर लौटने को थी कि अचानक पश्चिम बंगाल राज्य निर्वाचन आयोग ने जनवरी माह में राज्य में नगर निगमों एवं निकायों के चुनावों की घोषणा कर दी। ठीक इसके पूर्व कोलकाता नगर निगम के चुनाव हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में चले तृणमूल-भाजपा के गतिरोध के बीच संपन्न कराये गये थे। जानकारों की मानें तो चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा परेशानी का सामना साधारण जनता एवं स्कूली बच्चों को करना होता है। क्यों कि राज्य के सभी शासकीय कार्यालयों में चुनावी मूड इस कदर छाया होता है कि लोगों के अपने कार्य करवाने में असहनीय धैर्य धारण कर चुनाव के बीतने का इंतजार करने की अनिवार्यता होती है।
डिबेट लोकन्यास के निदेशक और सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ कुमार सिंह की मानें तो चुनाव में लोग एक राशन कार्ड तक को बनवाने अथवा पेंशन योजना का आवेदन भी देने संबंधित कार्यालयों में जाते हैं तो उन्हें चुनाव में व्यस्तता का हवाला देकर अधिकारी - कर्मचारी द्वारा बैरंग लौटा दिया जाता है। इसके साथ ही शासकीय स्कूलों का प्रयोग वोटिंग सेंटर एवं सुरक्षा में लगे जवानों, चाहे केंद्रीय वाहिनी हों अथवा राज्य पुलिस, के विश्राम हेतु किया जाता है जिससे करीब चार दिनों तक बच्चों के पठन पाठन का काम ठप रहता है।
वर्तमान में आसनसोल लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव का दौर चल रहा है। भाजपा से तृणमूल में शामिल हो जाने के बाद बाबुल सुप्रियो ने आसनसोल सीट के सांसद पद से इस्तीफा पेश किया था। जिसके बाद यहां उपचुनाव की स्थिति निर्मित हुई। बाबुल को जहां तृणमूल ने बालीगंज से विधानसभा के चुनाव हेतु मैदान में उतारा है वहीं सत्तादल ने सिने अभिनेता सह पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा पर आसनसोल लोकसभा क्षेत्र में बाजी लगाई है। श्री सिन्हा का यहां सामना आसनसोल दक्षिण की भाजपा विधायक अग्निमित्रा पाल से हो रहा है। ऐसे में अगर सीट से भाजपा प्रार्थी चुनाव जीतकर सांसद बनतीं हैं तो आसनसोल दक्षिण क्षेत्र में फिर से कुछ महीनों में चुनाव करवाना संवैधानिक अनिवार्यता होगी।
शिल्पांचल के लोगों का कहना है कि लगातार चुनावों का होना जनता के पैसों की होली जलाने के बराबर है। लोगों ने कहा कि जीते हुए जनप्रतिनिधि को टिकट देकर चुनाव की संख्या को बढ़ाने में मदद मिलती है। शिल्पांचल की राजनीति को नजदीक से देखने वाले पूर्व सांसद आरसी सिंह की मानें तो आजकल चुनाव में धनबल और बाहुबल का आधिक्य है, जिससे वोटिंग के दिन भी लोग सकते में आ जाते हैं। इतनी गहमागहमी एवं फोर्स को देखकर कई ऐसे लोग हैं जो वोट डालने से भी घबरा जाते हैं। अल्पावधि में लगातार चुनाव का होना बेहतर संकेत नहीं है।
कुल्टी नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष मधुरकांत शर्मा की मानें तो चुनाव चाहे कोई सा भी हो, उसका गहरा असर निकायों की कार्यप्रणाली पर होता है। उन्होंने बताया कि लगातार चुनाव मोड में अगर राज्य रहता है तो किसी भी स्थिति में जनता के कार्यों की गति को धीमा करने से कोई नहीं रोक सकता। ज्ञातव्य हो कि चाहे आसनसोल नगरनिगम हो अथवा जिला प्रशासन का दफ्तर, सभी जगहों पर चुनावी व्यस्तता की वजह से जनहित के कार्य बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं।
आसनसोल लोकसभा एवं बालीगंज विधानसभा उपचुनावों के बाद चार माह के भीतर दुर्गापुर नगर निगम के चुनाव की तारीख आने की संभावना है। वहीं अगले साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल की सभी ग्राम पंचायतों के चुनाव भी होने वाले हैं। तो क्या यह माना जाए कि बंगाल प्रांत की जनता चुनाव नामक किसी फिल्म के दर्शक बनकर रह गयें हैं।


