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(आज 22 मार्च जल संसाधन दिवस पर विशेष)
-प्राण चड्ढा
पांच दशक पहले किसी ने शायद सोचा होगा कि पानी की बोतल 20 रुपये में मिलेगी। पर अब हम देख रहे हैं। ब्रान्डेड पानी की बोतल महानगरों के होटलों में दूध की कीमत से दो गुनी कीमत पर बेची जाती है।
राजस्थान की सास-बहू की एक कथा है- छोटी बहू को यह शिकायत थी कि सास बड़ी बहू को उससे अधिक चाहती है। छोटी बहू पानी की मटकी भर कर घर ला रही थी कि दरवाज़े से टकरा कर फूट गई, सास ने डांटा और कहा देख कर चलना था।
कुछ देर बाद बड़ी बहू की मटकी उसी जगह पर टकरा कर फूटी और घी बिखर गया। सास ने उसे कुछ नहीं कहा।
यह देख छोटी बहू बिफर पड़ी और सासूमां से शिकायत की। बड़ी की मटकी का घी बह गया और आप चुप रहीं। मेरी मटकी फूटी और पानी बह गया, तो मुझे खरी-खोटी सुना दीं।
सास ने जवाब दिया- पानी की जरूरत घी से ज्यादा होती है। बिना घी हम रह सकते हैं, पानी बिना जीवन नहीं बचेगा।
अब दूसरी गाथा- आधुनिक दुबई की। मेरी बेटी प्रीति अबूधाबी में रहती थी और मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर एडमिन थी। यानि वेतन अच्छा-खासा। यहां से दुबई गए कुछ करीबियों को प्रीति ने रात्रि भोज पर होटल में आमंत्रित किया। भोज के बाद उसने आधी खाली बोतलों से दो बोतल पानी भरकर साथ रख लिया। यहां से गये अथितियों को समझ नहीं आई। ऐसा क्यों? चकित थे।
प्रीति ने उन्हें बताया कि यहां पानी को कोई बर्बाद नहीं करता। इसे कार में रख वह आबूधाबी ले जाएगी, जो घर में काम आएगा। मेहमान जब घूम कर स्वदेश आये तो पानी की बचत का सबक समझ कर सीख गए थे।
आने वाला कल कैसा होगा? वक्त बदल रहा है। मीठे पानी की कमी हो रही है। उसमें प्रदूषण का धीमा जहर घुल रहा है। जल ही जीवन है, यह जुमला बन गया है। हम वक्त को यदि जाने समझें नहीं तो आने वाली पीढ़ी पानी के लिए तरस जाएगी। क्या तीसरे या अगले किसी महायुद्ध को पानी के लिए लड़ा जाएगा? यह भविष्यवाणी पहले ही हो चुकी है। इसे गलत सबित करना वैश्विक चुनौती है।


