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विभागीय जांच 10 साल में पूरी नहीं हुई, सेवानिवृत्त निरीक्षक की याचिका पर मुख्य सचिव को हाईकोर्ट की नोटिस
24-Feb-2022 5:26 PM
विभागीय जांच 10 साल में पूरी नहीं हुई, सेवानिवृत्त निरीक्षक की याचिका पर मुख्य सचिव को हाईकोर्ट की नोटिस

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 24 फरवरी।
प्रतिनियुक्ति की अवधि का हिसाब नहीं देने के मामले में जांच मूल विभाग में लौटने के 14 साल बाद शुरू की गई। इस जांच को भी 10 साल से ज्यादा समय बीत जाने पर पूरा नहीं किया जा सका क्योंकि एक विभाग के अधिकारी दूसरे को सहयोग नहीं कर रहे हैं। इस बीच कर्मचारी सेवानिवृत्त हो गये और विभागीय जांच के नाम पर उसके पेंशन और अन्य देयक रोक दिये गये। कर्मचारी ने न्याय के लिये हाईकोर्ट की शरण ली है, जिसे गंभीरता से लेते हुए मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया गया है। सहकारिता पंजीयक के जवाब पर भी कोर्ट ने असंतोष जताते हुए अतिरिक्त जवाब दाखिल करने कहा है।

याचिकाकर्ता युगल किशोर चंद्राकर सहकारिता विभाग में निरीक्षक थे। उन्हें वर्ष 1987 से 1997 तक प्रतिनियुक्ति पर जिला वनोपज संघ दुर्ग के प्रबंध संचालक कार्यालय में भेजा गया। 6 मार्च 1997 को उनकी प्रतिनियुक्ति की अवधि बालोद जिले में पूरी हो गई। इसके बाद उन्होंने जिला वनोपज संघ से प्रमाण पत्र प्राप्त किया कि उनके विरुद्ध कोई वसूली का प्रकरण या शिकायत लंबित नहीं है। उन्हें मूल विभाग सहकारिता में वापस ले लिया गया। इसके बाद लगातार 14 वर्षों तक वे अपने विभाग में कार्य करते रहे। इसके बाद 3 अगस्त 2011 को अचानक उनको नोटिस देते हुए विभागीय जांच समिति गठित की गई कि उन्होंने वनोपज संघ में प्रतिनियुक्ति के दौरान का हिसाब नहीं दिया है। जांच की कार्रवाई शुरू करते हुए सीसीएफ और जिला लघु वनोपज संघ मर्यादित बालोद को सहकारी सेवायें विभाग ने बार-बार पत्र लिखे। पर सीसीएफ ने न कोई दस्तावेज उपलब्ध कराये न ही पत्रों का जवाब दिया।

इस बीच याचिकाकर्ता 29 फरवरी 2016 को याचिकाकर्ता रिटायर हो गये। विभागीय जांच लंबित होने का हवाला देते हुए सहकारिता विभाग ने उनकी पेंशन, ग्रेच्युटी व सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले सभी लाभों को रोक लिया लेकिन विभागीय जांच पूरी नहीं की। हाईकोर्ट ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद पंजीयक सहकारी सेवायें से शपथ-पत्र के साथ बताने कहा कि क्यों 10 वर्षों तक जांच पूरी नहीं हुई। पंजीयक ने शपथ-पत्र में बताया कि सीसीएफ और लघु वनोपज संघ बालोद ने बार-बार पत्र व्यवहार के बावजूद न तो जवाब दिया न ही आरोपों के संबंध में कोई दस्तावेज। विभागीय जांच दस्तावेज मिलने पर ही पूरी हो सकेगी।

इस जवाब को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि सीसीएफ से 10 वर्षों में जवाब नहीं मिलने पर पंजीयक को वन विभाग के प्रमुख सचिव को रिपोर्ट करनी चाहिये था। साथ ही उनको न्यायालय में अन्य विभाग के विरुद्ध शिकायत करने के बजाय व्यक्तिगत तौर पर मामले का निराकरण करना था। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार को अतिरिक्त जवाब देकर बताने कहा है कि वन विभाग के अधिकारियों ने जांच में सहयोग क्यों नहीं किया। कोर्ट ने आदेश की कॉपी छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को भेजते हुए स्पष्टीकण मांगा है कि वन विभाग याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय जांच में सहकारिता विभाग को सहयोग क्यों नहीं कर रहा है। उन्होंने 15 दिन के भीतर दोनों को जवाब दाखिल करने कहा है। मामले की सुनवाई 14 मार्च को होगी।  


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