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कोरोना महामारी के बीच राजनीतिक संकट से जूझता नेपाल
29-May-2021 1:22 PM
कोरोना महामारी के बीच राजनीतिक संकट से जूझता नेपाल

नेपाल में स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंता है कि नये चुनावों की गहमागहमी में कोरोना संक्रमण और फैल सकता है. सांसदों का एक धड़ा संसद को भंग किए जाने के खिलाफ था लेकिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली चुनाव कराने पर आमादा हैं.

  डॉयचे वैले पर लेखानाथ पांडे की रिपोर्ट

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने शनिवार को संसद भंग कर दी थी. उसके बाद से इस हिमालयी देश में प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों और गुटों के बीच घमासान मचा हुआ है. राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से कहा गया कि ये फैसला कार्यवाहक प्रधानमंत्री और नेपाल में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएन-यूएमल के नेता केपी शर्मा ओली की सिफारिश पर किया गया था. छह महीने में दूसरी बार है जब संसद भंग की गयी है. इससे पहले दिसम्बर में उसे भंग किया गया था.

नेपाल में राजनीतिक गतिरोध
राष्ट्रपति के आदेश के बाद, 140 से भी अधिक सांसदों ने, जिनमें ओली की पार्टी के सदस्य भी हैं, नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर विपक्षी नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा की अगुआई में सरकार के गठन की मांग की थी. ओली से अलग होने वाले 23 सीपीएन-यूएमएल नेताओं में से एक झपत रावल ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम यहां अपने हस्ताक्षरों के साथ याचिका देने आए थे क्योंकि प्रधानमंत्री ओली ने दावा किया था कि हम उनकी तरफ हैं.” उनके मुताबिक, "हमने संसद को बहाल रखने और लोकतंत्र और संघीय गणतान्त्रिक व्यवस्था के खिलाफ साजिश को बेनकाब करने का फैसला किया था.”

इस हस्ताक्षर अभियान के बावजूद भंडारी ने नये चुनाव कराने के लिए नवंबर की तारीख का ऐलान कर दिया था. कम से कम दो दर्जन याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी हैं जिनमें नेपाली संसद को फौरन बहाल करने और देउबा को नया प्रधानमंत्री बनाने की मांग की गयी है. कानूनी जानकारों का आकलन है कि न्यायपालिका को किसी फैसले तक पहुंचने में कुछ हफ्ते भी लग सकते हैं और कई महीने भी.

महामारी की आड़ में राजनीतिक लाभ?
यह राजनीतिक संकट उस समय आया है जब ओली की सरकार पर, पड़ोसी भारत से फैली कोरोनावायरस संक्रमण की नयी लहर पर सही ढंग से नियंत्रण न कर पाने के आरोप लग रहे हैं. नेपाल में कोविड-19 के रोजाना 8000 मामले आ रहे हैं और पहले से खस्ताहाल स्वास्थ्य ढांचे पर बोझ बढ़ गया है. आलोचकों का कहना है कि ओली, समर्थन जुटाने के लिए राजनीतिक रैलियों और सभाओं की तैयारी में व्यस्त हैं. सिविल सोसायटी के नेता युग पाठक ने डीडब्ल्यू को बताया कि ओली ने संसद को भंग करने की सिफारिश करने में जल्दीबाजी इसलिए दिखायी क्योंकि नये चुनाव तो महामारी की वजह से हाल फिलहाल में तो होंगे नहीं.

उनका आरोप है कि "प्रधानमंत्री गाहेबगाहे संविधान का उल्लंघन करते रहे हैं. ऐसा लगता है कि वह प्रधानमंत्री बने रह सकें इसलिए किसी भी कीमत पर संसद को खत्म कर देना चाहते हैं.” उनके मुताबिक ओली की चुनाव कराने की मंशा है नहीं बल्कि वह "अपना राजपाट बढ़ाए रखना चाहते हैं.” पाठक कहते हैं, "यह साफ है कि महामारी के दौरान चुनाव नहीं हो सकते. ओली का इरादा यही है कि स्वास्थ्य इमरजेंसी के बाद चुनाव स्थगित करा दिए जाएं.”

चुनावी अभियानों के लिए जोखिम भरा समय
पिछले दिनों एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वास्थ्य मंत्री हृदयेश त्रिपाठी ने कहा कि कड़े लॉकडाउन से संक्रमण की दर में कमी आ रही थी. उन्होंने दावा किया कि चुनाव नवंबर में अपने नियत समय पर ही होंगे. स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि महामारी के दौरान नये चुनावों की घोषणा खतरनाक है, इससे लोग उत्तेजित होंगे और धरना प्रदर्शन और रैलियां करने निकल पड़ेंगे. नेपाल के स्वास्थ्य सेवा विभाग में रोग-विज्ञान और रोग नियंत्रण यूनिट के पूर्व निदेशक बाबुरामा मारासिनी ने डीडब्ल्यू को बताया कि चुनावी रैलियां और विरोध प्रदर्शनों से लोगों की जान पर खतरा बन आएगा.  

वह बताते हैं, "अगले एक या दो महीनों में संक्रमण की चेन को तोड़ पाना नामुमकिन है क्योंकि वायरस पहले ही समुदायों, गांवों और देहातों में फैल चुका है.” मारासिनी कहते हैं कि गांवों में शहरों की अपेक्षा बीमारी के फैलाव पर काबू पाने में ज्यादा समय लग सकता है. ग्रामीण इलाकों में हेल्थकेयर और चिकित्सा सुविधाओं की कमी है. लोग भी महामारी के प्रोटोकॉल पर अमल करने में कोताही करते हैं या हिचकते हैं. शारीरिक दूरी रखने, मास्क पहनने और संपर्कों की शिनाख्त से भी बचते हैं.

अभी सिर्फ नेपाल की ढाई प्रतिशत आबादी को ही टीका लग पाया है. नेपाल को वैक्सीन के आयात में भी कठिनाई आ रही है. मार्च में भारत से आने वाली वैक्सीन की खेप भी रुक गयी क्योंकि भारत खुद कोविड 19 की दूसरी लहर से जूझ रहा है. अलबत्ता चीन ने बुधवार को कहा कि वो नेपाल को दस लाख वैक्सीन मुहैया करा देगा. मारासिनी को आशंका है कि "आने वाले महीनों में इंफेक्शन रेट भले ही गिरने लगेगा लेकिन आगे त्योहार भी आ रहे हैं और चुनावी अभियान भी चलेंगे तो कहीं ये सब मिलकर महामारी की तीसरी लहर का सबब न बन जाएं.” (dw.com)
 


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