अंतरराष्ट्रीय
-मोहम्मद ज़ुबैर ख़ान
पाकिस्तान में संसद के उच्च सदन को संबोधित करते हुए, वहाँ के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने सदस्यों को आश्वासन दिया कि अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर ड्रोन ऑपरेशंस के लिए पाकिस्तान कोई सैन्य अड्डा या एयर बेस नहीं दे रहा है.
मंगलवार को फ़लस्तीनी-इसराइल संघर्ष पर चल रही बहस के बाद अपने नीतिगत बयान में, विदेश मंत्री ने अतीत में अमेरिका को दिए गए एयरबेस का ज़िक्र करते हुए सीनेटरों से कहा कि "अतीत को भूल जाएँ."
उन्होंने कहा, "ये सदन और पाकिस्तान की जनता मेरी गवाही याद रखे कि पीएम इमरान ख़ान के नेतृत्व में इस देश में अमेरिका को कोई सैन्य अड्डा नहीं दिया जाएगा."
इसी तरह, पिछले दिनों पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी पाकिस्तान की तरफ़ से अमेरिका को कोई नया एयरबेस देने से संबंधित दावों का ज़ोरदार खंडन करते हुए कहा था कि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच साल 2001 में एयर लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन (एएलओसी) और ग्राउंड लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन (जीएलओसी) समझौते हुए थे. इन समझौतों के अनुसार दोनों देश मिलकर काम करते हैं.
ये स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है, जब समाचार एजेंसी एएफ़पी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया है कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना की मदद के लिए पाकिस्तान ने अपनी हवाई और ज़मीनी सीमाओं को इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी है.
बीबीसी से बात करते हुए, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ज़ाहिद हफीज़ चौधरी ने कहा कि विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से अपना पक्ष बता दिया है और वह इस पर और कुछ नहीं कह सकते.
लेकिन सवाल यह है कि साल 2001 में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच होने वाले एएलओसी और जीएलओसी समझौते क्या हैं, जिसके तहत दोनों देश एक दूसरे का सहयोग करते हैं?
इन समझौतों के बारे में पूर्व राजनयिक ज़मीर अकरम ने कहा कि 9/11 की घटना के बाद, इन समझौतों के तहत अमेरिका को पाकिस्तान में अपने हवाई अड्डे स्थापित करने की अनुमति मिली थी, लेकिन इन हवाई अड्डों को 2011 में बंद कर दिया गया था.
एएलओसी और जीएलओसी क्या हैं?
ज़मीर अकरम के अनुसार, 9/11 के बाद, अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवादियों पर हमलों के लिए हवाई और ज़मीनी मदद की ज़रूरत थी, जिसके लिए पाकिस्तान और अमेरिका के बीच दो समझौते हुए थे.
इन समझौतों के अनुसार, एएलओसी के तहत अमेरिका को हवाई अड्डे और जीएलओसी के तहत ज़मीनी रास्ते इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी.
सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल अमजद शोएब के अनुसार, ये समझौते आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक जंग के दौरान हुए थे और इस दौरान अमेरिका बलूचिस्तान में ख़ासदार के पास वाशक क्षेत्र में स्थित शम्सी एयर बेस और सिंध के जैकोबाबाद में स्थित शहबाज़ एयर बेस का इस्तेमाल कर रहा था.
इन दोनों हवाई अड्डों से अमेरिकी विमान उड़ते थे, जबकि शम्सी एयर बेस का इस्तेमाल अमेरिकी ड्रोन हमलों के लिए भी किया जाता था.
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अमजद शोएब के अनुसार, शाहबाज़ एयरबेस को साल 2011 से पहले ही बंद कर दिया गया था, लेकिन शम्सी एयर बेस अमेरिका की तरफ से महमंद एजेंसी में सलालाह हमले के बाद नवंबर 2011 में बंद कर दिया गया था.
इसके बाद अमेरिका पर पाकिस्तान के हवाई और ज़मीनी रास्तों के इस्तेमाल करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था.
अमजद शोएब ने कहा कि कुछ समय के लिए, अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान तक अपनी रसद पहुँचाने की भी अनुमति नहीं दी जा रही थी, लेकिन बाद में अमेरिका को ज़मीनी रास्ते की अनुमति दे दी गई थी और शम्सी एयरबेस को अमेरिका से ख़ाली करा लिया गया था.
हालिया ख़बरों के बारे में बात करते हुए सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अमजद शोएब ने कहा कि हो सकता है अब अमेरिका को ज़मीन और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने की इजाज़त दी जाए, लेकिन जंगी हवाई अड्डे इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी.
उनका कहना था कि संभावित तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में गृहयुद्ध का ख़तरा महसूस किया जा रहा है.
उन्होंने कहा, "अल्लाह करे ऐसा न हो, लेकिन अगर ऐसा होता है, तो फिर संभावित तौर पर अफ़ग़ानिस्तान की सरकार और नागरिकों को ज़मीनी रास्ते से मदद मुहैया की जा सकती है. अमेरिका अपनी वापसी के लिए भी ज़मीनी और हवाई मार्गों का उपयोग कर सकेगा."
साउथ एशियन स्ट्रेटेजिक स्टेबिलिटी इंस्टीट्यूट की डायरेक्टर जनरल और रक्षा विश्लेषक डॉक्टर मारिया सुल्तान के अनुसार, आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में सहयोगी होने के नतीजे मे गंभीर वित्तीय नुक़सान के अलावा पाकिस्तान सीधे तौर पर ख़ुद आतंकवाद का शिकार बन गया था.
वो कहती हैं, "अमेरिका ने इस दौरान भारत के साथ भी संबंध बढ़ा लिए थे, जिसके बाद पाकिस्तान ने इन दो समझौतों की समीक्षा की थी."
ज़मीर अकरम ने कहा कि यह स्पष्ट है कि अमेरिका को पाकिस्तान से किसी भी तरह के हमले करने की इजाज़त नहीं होगी.
वो कहते हैं, "इसका मतलब यह है कि वह पाकिस्तान में कोई हवाई या ज़मीनी जंगी अड्डे नहीं बना सकेगा. अमेरिका ज़मीनी रास्तों को केवल अपनी वापसी के लिए इस्तेमाल कर सकेगा."
अमेरिका को एयर बेस न देने की वजह
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अमजद शोएब ने कहा कि साल 2001 में हवाई अड्डे देने के कारण अलग थे.
वो कहते हैं, "उस समय, पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक वैश्विक अभियान का हिस्सा था, लेकिन अब स्थिति अलग है. कोई भी सरकार संसद की अनुमति के बिना अमेरिका को ऐसी अनुमति नहीं दे सकती है, और अगर ऐसी अनुमति दी जाती है, तो सरकारों को अवाम की गंभीर प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है."
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान के बाद अपने हवाई अड्डे बनाने के लिए रूस से अलग हुए मध्य एशियाई देशों से संपर्क किया था, लेकिन वहाँ अमेरिका को रूस की बढ़ती भागीदारी के कारण अनुमति नहीं मिल सकी थी.
वहीं डॉक्टर मारिया सुल्तान ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि वह अफ़ग़ानिस्तान से निकल कर पाकिस्तान में बैठ कर अपने हथियार इस्तेमाल करे.
वो कहती हैं, "यानी अफ़ग़ानिस्तान की जंग पाकिस्तान में बैठ कर लड़ी जाए, लेकिन इस समय पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में शांति चाहता है. पाकिस्तान ने आतंकवाद पर कुछ हद तक काबू पा लिया है और पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान की जंग से बाहर निकलना चाहता है."
डॉक्टर मारिया का कहना है कि अमेरिका के पास न केवल अफ़ग़ानिस्तान में कई हवाई अड्डे हैं, बल्कि इसके अलावा उसके भारत के साथ कई रक्षा समझौते भी हैं और अरब सागर में भी उनका जंगी बेड़ा मौजूद है.
वो कहती हैं, "इन परिस्थितियों में, नहीं लगता कि पाकिस्तान भी अमेरिका को हवाई अड्डे देगा."
अमजद शोएब के मुताबिक़ पाकिस्तान की अमेरिका को एयरबेस न देने की एक और बड़ी वजह चीन है.
वो कहते हैं, "पाकिस्तान और चीन समान हितों वाले दो अच्छे दोस्त हैं. ऐसी स्थिति में जब अमेरिका वैश्विक स्तर पर चीन का खुलकर विरोध कर रहा है, पाकिस्तान अपने सबसे क़रीबी दोस्त को नाराज़ करते हुए अमेरिका को हवाई अड्डा इस्तेमाल करने नहीं दे सकता है."
डॉक्टर मारिया सुल्तान ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि पाकिस्तान कभी भी चीन के मुक़ाबले में अमेरिका को तरजीह नहीं देगा. (bbc.com)


