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पाकिस्तान की इस हिंदू लड़की ने लिखी सफलता की नई कहानी
11-May-2021 9:12 AM
पाकिस्तान की इस हिंदू लड़की ने लिखी सफलता की नई कहानी

PAKISTAN HINDU YOUTH COUNCIL


-रियाज़ सुहैल

"मैंने अपने मोबाइल से सभी सोशल मीडिया ऐप्स को डिलीट कर दिया, सामाजिक संबंध ख़त्म कर दिए और आठ महीने दिल और जान से सीएसएस की तैयारी की, और आख़िरकार कामयाब हो गई."

डॉक्टटर सना राम चंद वह पहली हिंदू लड़की हैं, जिनका नाम सेंट्रल सुपीरियर सर्विस (सीएसएस) परीक्षा पास करने के बाद पाकिस्तान प्रशासनिक सेवा (पूर्व जिला प्रबंधन समूह या डीएमजी) के लिए सुझाया गया है.

सिंध में 20 लाख के लगभग हिंदू आबादी रहती है. पूर्व में इस समुदाय की अधिकांश लड़कियों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रोज़गार को प्राथमिकता दी है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस रुझान में बदलाव आया है और उन्होंने पुलिस और न्यायपालिका से जुड़े क्षेत्र में रोज़गार पाने का रुख किया है.

सीएसएस की वार्षिक परीक्षा 2020 में कुल 18,553 उम्मीदवार शामिल हुए थे और इनमे टेस्ट और इंटरव्यू के बाद केवल 221 लोगों का चयन किया गया है.

सीएसएस परीक्षा में सफलता की दर 2 प्रतिशत से भी कम रही है और उनमें से पाकिस्तान की सेवा करने के लिए जिन 79 महिलाओं का चयन किया गया है, उनमे डॉक्टर सना राम चंद भी शामिल हैं.

डॉक्टर सना, सिंध प्रांत के शिकारपुर ज़िले में स्थित क़स्बा चक की रहने वाली हैं. उन्होंने प्राइमरी से कॉलेज तक की शिक्षा वहीं से प्राप्त की है. उनके पिता स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.

इंटर में अच्छे अंक प्राप्त करने के बाद, उन्होंने सिंध के चांडका मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और सिविल अस्पताल, कराची में हाउस जॉब की.

हालिया दिनों में वह सिंध इंस्टीट्यूट ऑफ यूरोलॉजी एंड ट्रांसप्लांट (एसआईयूटी) से यूरोलॉजी में एफसीपीएस कर रही हैं. कुछ महीनों में, वह सर्जन बन जाएँगी.

बीबीसी से बात करते हुए डॉक्टर सना ने बताया कि कॉलेज तक तो उनका यही लक्ष्य था की उन्हें डॉक्टर बनना है. सना वह बहुत ही होशियार छात्रा रही हैं और उन्हें शैक्षणिक उपलब्धि के लिए पदक भी मिला था.

एमबीबीएस के बाद, एफसीपीएस ठीक चल रहा था, और इस बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें सीएसएस करना है.

सिंध के सरकारी अस्पतालों की स्थिति और मरीज़ों की परिस्थिति को देखकर डॉक्टर सना राम चंद का दिल टूट गया और उन्होंने सीएसएस करने का फ़ैसला किया.

वह कहती हैं, "मैंने पहले दृढ निश्चय किया हुआ था कि एक सर्जन और यूरोलॉजिस्ट बनना है. इस क्षेत्र में बहुत कम लड़कियाँ हैं. चांडका अस्पताल या जो दूसरे सरकारी अस्पताल हैं, उनको जब मैंने देखा कि न यहाँ मरीज़ों की कोई देखभाल है और न हमारे पास संसाधन. वहाँ काम करने का माहौल परेशान करने वाला था."

वह आगे कहती हैं, "इसके विपरीत, ब्यूरोक्रेसी आपको एक ऐसा प्लेटफॉर्म देती है जहाँ आप कुछ न कुछ बदलाव ला सकते हैं. मैं एक डॉक्टर के रूप में मरीज़ों के इलाज के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन इससे अवसर सीमित हो जाता है. ब्यूरोक्रेसी में अधिक अवसर हैं जिससे हम समस्याओं को हल कर सकते हैं. यही मेरा टर्निंग प्वाइंट था."

डॉक्टर सना के अनुसार, उन्हें सीएसएस का विचार 2019 में आया. उन्होंने तैयारी शुरू कर दी और 2020 में पेपर दिए और पास हो गई.

लेकिन फिर भी उन्होंने एफसीपीएस को जारी रखा और चिकित्सा अधिकारी की नौकरी नहीं छोड़ी. उन्होंने कोविड वार्ड की ड्यूटी के साथ इंटरव्यू की तैयारी की.

सामाजिक संपर्क ख़त्म और नींद कम
डॉक्टर सना राम चंद का कहना है कि लोगों को सफलता दिखाई देती हैं, लेकिन इसके पीछे जो संघर्ष है वो दिखाई नहीं देता है. सुबह आठ बजे से लेकर रात के आठ बजे तक, उनकी वार्ड में ड्यूटी रहती, फिर वह सीधे लाइब्रेरी जाती थी.

"मैंने अपने मोबाइल से सभी सोशल मीडिया अकाउंट और व्हाट्सऐप को डिलीट कर दिया था. अपना सामाजिक जीवन भी इस तरह ख़त्म कर दिया था कि अपने चचेरे भाई की शादी में भी नहीं गई थी. मुश्किल से छह से सात घंटे सो पाती थी."

"लड़काना की चिलचिलाती गर्मी में भी मुझे पढ़ाई करनी होती थी. मैं कहीं भी आती-जाती, तो रास्ते में पढ़ लेती थी. मोबाइल फोन में किताब होती थी और जितने अंग्रेजी अखबार हैं वो सब पढ़ती थी."

डॉक्टर सना कहती हैं कि वह नौकरी नहीं छोड़ सकती थी और अपनी पढ़ाई भी नहीं छोड़ना चाहती थी. "अगर आप नौकरी करते हैं तो पढ़ भी सकते हैं. बात यह है कि आप कितने दृढ़ हैं."

उनका मानना है कि "अगर आपको यह करना है तो करना है. फिर आप कोई बहाना नहीं बना सकते कि मेरी तो नौकरी बहुत कठिन है."

सना राम चंद का कहना है कि उनके जो दोस्त थे वो छह-छह महीने तैयारी करते थे, जबकि वह एक महीने में तैयारी करके परीक्षा देती थी.

वह कहती हैं कि "पहली कोशिश में सफल होने का फ़ॉर्मूला केवल इतना सा है कि आप कितनी तवज्जो देते हैं. आपने ख़ुद को कितना समर्पित किया हुआ है और दिन में कितने घंटे बैठकर आप पढ़ते हैं."

सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया ने माता-पिता को बदल दिया
डॉक्टर सना राम चंद के माता-पिता उनके सीएसएस से ख़ुश नहीं थे, लेकिन उनकी सफलता के बाद, उन्होंने भी उन्हें प्रोत्साहित किया.

उनके अनुसार, जिस तरह दूसरों के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे ब्यूरोक्रेसी में आएँ, उनके माता-पिता ऐसा नहीं चाहते थे. उन्होंने अपनी माँ से कहा था कि वो उन्हें एक कोशिश करने दें. अगर पास हो गई, तो ठीक है, अन्यथा वह चिकित्सा के फील्ड को जारी रखेंगी.

"जब लिखित परीक्षा का रिज़ल्ट आया, तो उस समय मेरी तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई और लोगों ने इसकी सराहना की, जिसके बाद मेरे माता-पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और कहा कि अपने शौक को पूरा करो. अब मेरे पास माता-पिता का सपोर्ट है जो पहले नहीं था."

डॉक्टर सना की चार बहनें हैं उनका कोई भाई नहीं है. वह कहती है कि उन्होंने कभी यह महसूस नहीं किया कि वह किसी पुरुष से कम है. उनके अनुसार, ब्यूरोक्रेसी में कई महिलाएँ हैं जो बहादुर हैं और अच्छा काम करती हैं, वह उन्हें ही फॉलो करेंगी.

"किसी को कहने की ज़रूरत नहीं होती कि मैंने सीएसएस किया है, इसलिए आप भी करें. मैं किसी हिंदू लड़की को बैठा कर यह नहीं कहूंगी. कोई इंसान कर रहा है, तो पूरे पाकिस्तान में उसकी सराहना हो रही है, इस तरह दूसरे का ख़ुद ही दिल करता है. मुझे भी यह बनना चाहिए, अगर यह कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं?" (bbc.com)


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