गरियाबंद

छग की धरती महान सपूतों की जननी है-चन्द्रशेखर साहू
06-Apr-2026 4:31 PM
छग की धरती महान सपूतों की जननी है-चन्द्रशेखर साहू

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

नवापारा राजिम, 6 अप्रैल। भाजपा के चम्पारण-तामासिवनी मंडल स्तरीय प्रशिक्षण वर्ग अष्टम सत्र में वक्ता पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू ने छत्तीसगढ़ की धरोहर एवं सांस्कृतिक विरासत पर अपनी बात रखते हुए बताया कि जहां पर हम प्रशिक्षण ले रहे हैं वह स्थान ऐसे चार धरोहर के बीच में स्थित है जहां एक ओर बहुत ही नजदीक उत्तर दिशा में प्राचीन नगरी आरंग है जो राजा मोरध्वज ने अपने पुत्र ताम्रध्वज को आरा (आरी) से काटने की कथा प्रचलित है जो भगवान कृष्ण के भक्त थे जिनके कहने पर यह दुष्कर कार्य किया था, जहां सबसे अधिक शिवलिंग है।

तो दूसरी ओर कुछ ही दूर में दक्षिण दिशा में बहुत ही प्रसिद्ध राजिम है जहां वनगमन के काल में भगवान श्रीराम माता सीता एवं भाई लक्ष्मण संग आए थे और वहीं माता सीता ने अपने करकमलों से त्रिवेणी संगम महानदी के बीचों बीच रेत से शिवलिंग की स्थापना करके पूजा-अर्चना की थी जो आज कुलेश्वर महादेव मंदिर के नाम से विश्व विख्यात है। जहां लोमष ऋषि आश्रम है। तो भक्तिन माता राजिम के नाम भी दर्ज है जिनके नाम पर राजिम नगरी बसा हुआ है जो बहुसंख्यक तेली समाज की आराध्य कुल माता है। जहां प्राचीन विशाल भगवान राजिम लोचन के मंदिर निर्मित है। जिसे पहले पद्मावती नगरी के नाम जाना जाता था ।

उन्होंने बताया कि समीप में ही पूर्व दिशा में धार्मिक नगरी सिरपूर है जहां चीनी यात्री व्हेनसांग समुद्री मार्ग से जलयात्रा करके भारत पहुंचे थे और फिर वे यहां सिरपूर आए जो कभी श्रीपूर के नाम से ख्यातिलब्ध था जो समृद्धि का प्रतीक है और वे नागवंशी राजाओं की राजधानी के रूप में में भी था जहां पौराणिक लक्ष्मण मंदिर एवं बौद्ध बिहार तथा जैन मंदिर भी है । तो पश्चिम में कुछ ही फलांग पर चंदखूरी है जहां कौशल नरेश की पुत्री और भगवान श्रीराम की माता कौशल्या का जन्म हुआ हुआ है जो एक मात्र कौशिल्या मंदिर का निर्माण हुआ है और पर्यटन स्थल के रूप में प्रगति में है। उन्होंने बताया पापमोचनी, जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी महानदी का उद्गम स्थल सिहावा है जहां श्रृंगि ऋषि ही नहीं बल्कि अन्य पूरे सात कुंभज अगस्त्य प्रमुख ऋषियों का पर्वत श्रृंखला है। और फिर आगे में बस्तर संभाग आता है जहां सात जिलों का समूह है जिस बस्तर में राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव आदिवासी संस्कृति एवं सभ्यता को बचाने शहीद हुए जहां के लोग बूढ़ादेव के रूप में भगवान शिव को पूजते हैं।

छत्तीसगढ़ की धरती महान सपूतों की जननी है गुरु घासीदास बाबा का जन्म गिरौदपुरी धाम में हुआ है जिन्होंने हिंदूओं को ईसाईयत से बचाने सतनाम पंथ की स्थापना की थी और मनखे-मनखे एक समान का नारा बुलंद किया था। और अनुयायियों को मांस व मंदिरा से दूर रहने प्रेरित किया था जिनके मानने वाले अनेक लोग असम राज्य और विदेशों में भी रहते है। अछूतों के उद्धारक पंडित सुंदरलाल लाल शर्मा का जन्म यहीं पास के ही चमसूर गांव में हुआ है। जिनकी अनेक काब्यकृति आज भी राजिम के पुश्तैनी मकान में संग्रहित हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ी ब्याकरण लिखा था और आजादी के आंदोलन में अपनी सारी पैतृक भूमि धन सम्पत्ति न्यौछावर कर दी ।


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