संपादकीय
छत्तीसगढ़ में बीती शाम आईएएस अफसरों के कामकाज में फेरबदल की एक सबसे लंबी लिस्ट आई। इस काडर के पौने दो सौ से कम अफसर हैं, और उनमें प्रशिक्षुओं को छोड़ दें, तो 43 अफसरों की यह लिस्ट करीब एक चौथाई अफसरों के कामकाज बदलने की है। इस सरकार के कार्यकाल को भी ढाई बरस होने जा रहे हैं, और एक किस्म से यह प्रशासन का मध्यावधि फेरबदल है। अब शायद विधानसभा चुनाव तक इतने बड़े फेरबदल की नौबत न आए। बोलचाल की भाषा में भारत में आईएएस लोगों के लिए अफसरशाही, और नौकरशाही जैसी भाषा परंपरागत रूप से इस्तेमाल होते आई है, और रोजाना के काम की जमीनी हकीकत देखें, तो यह बात कुछ हद तक सही भी लगती है। निर्वाचित और सत्तारूढ़ नेता तो औसतन पांच बरस के लिए ही आते हैं, लेकिन अफसर 30-35 बरस तक रहते हैं, और अफसरशाही शब्द बहुत गलत भी नहीं रहता। अब यह निर्वाचित नेताओं पर निर्भर करता है कि वे जनहित के लिए इस मजबूत सरकारी मशीनरी का किस तरह इस्तेमाल करते हैं। आईएएस अफसरों के साथ-साथ आईपीएस, और आईएफएस अफसर भी यूपीएससी की उसी चयन सूची से आते हैं, और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनाव में जीतकर आए, या न आए, इसमें इन तीनों सेवाओं के अफसरों का काफी कुछ योगदान रहता है। ये खुद तो चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी की जीत और हार इन अफसरों के कामकाज से जुड़ी रहती है, इसलिए इन अफसरों की तैनाती राज्य की जनता के हित में, सरकार के बेहतर कामकाज के लिए, और सत्तारूढ़ पार्टी की वापिसी के लिए, तीनों के लिए महत्वपूर्ण रहती है।
जैसा कि हमने ऊपर इसे सबसे बड़ा मध्यावधि फेरबदल कहा है, इसके बाद चुनाव तक इन अलग-अलग विभागों, और इन जिलों में हो सकता है कि कोई बड़ा फेरबदल न हो, और कल नई तैनाती वाले अफसरों के कामकाज ही इस सरकार को चुनाव तक ले जाएं। भारत में नौकरशाही और निर्वाचित में से सत्तारूढ़ नेताओं के बीच संबंध बड़े जटिल रहते हैं। लोकतंत्र में उम्मीद तो की जाती है कि नीतियां निर्वाचित नेता बनाएं, और उन पर अमल अफसर करें। लेकिन जहां-जहां मंत्री कमजोर पड़ते हैं, पेशेवर और चतुर अफसर वहां नीतियां बनाने का काम करने लगते हैं, और अदूरदर्शी नेता तबादलों और ठेकों को अपना विशेषाधिकार मान लेते हैं। यह सिलसिला अफसरों के लिए तो नुकसानदेह नहीं होता, लेकिन नेताओं के लिए बड़ा नुकसानदेह रहता है, क्योंकि उन्हें पांच बरस बाद जनता के बीच दुबारा जाना है। कई राज्यों में यह देखने में आता है कि किस तरह अगले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी से नाराजगी निकालते हुए जनता उसे निपटा देती है, और चुनावी भाषा में उसके लिए एंटीइंकमबेंसी जैसा एक जुमला बड़ा इस्तेमाल होता है। लोग आमतौर पर यह मान लेते हैं कि निर्वाचित विधायकों या सांसदों से, मंत्रियों से जनता की नाराजगी निकलती है, और सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव हार जाती है। हकीकत तो यह रहती है कि सरकार से नाराजगी सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से नाराजगी नहीं रहती, वह सरकार के कुल कामकाज से नाराजगी रहती है, जिसमें अफसरों का कामकाज भी शामिल रहता है। अगर अफसरों का कामकाज अच्छा रहे, तो सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कोई एंटीइंकमबेंसी की मजबूत लहर नहीं उठ सकती। हम किसी नए रहस्य की बात नहीं कर रहे, बल्कि इतने दशकों से सत्ता को करीब से देखते रहने की वजह से जो एक मामूली सी समझ विकसित हुई है, महज उसी की बात कर रहे हैं। इसमें से कोई भी बात न तो छत्तीसगढ़ की आज की सरकार पर अलग से लागू होती है, न ही इस सरकार पर कुछ कम या अधिक लागू होती है। हम एक जिम्मेदार डॉक्टर की तरह एक जेनेरिक दवाई लिख रहे हैं, और लोग दवा दुकानदार की तरह इसमें अपनी मर्जी का ब्राँड भर सकते हैं। यह बात देश-प्रदेश की किसी भी सरकार पर बराबरी से लागू होती है, और इसे एक आम चर्चा की तरह ही देखना चाहिए।
सत्तारूढ़ पार्टियों को कई तरह के जायज और नाजायज राजनीतिक दबावों के तहत काम करना पड़ता है। ऐसे में कुछ बहुत ईमानदार या कड़े अफसर कभी-कभी असुविधा का सामान भी बन जाते हैं। कुछ दूसरे व्यावहारिक अफसर बांस की तरह लचीले रहते हैं, और वे झुकने की, मुडऩे की एक सीमा तक राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठा लेते हैं। हर राज्य में चूंकि अफसर बहुत लंबा काम किए हुए रहते हैं, कामकाज की उनकी निजी शैली, उनके साथ काम करने की संभावनाओं और सीमाओं को सबसे वरिष्ठ अफसर भी अच्छी तरह जानते हैं, और राजनीतिक पार्टियों के पुराने अनुभवी नेता भी इससे वाकिफ रहते हैं। इनके अलावा हर सरकार में असरदार रहने वाले सत्ता के कुछ दलाल भी सत्ता को अफसरों के मिजाज के बारे में पहले दिन से बताते रहते हैं। यह एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती रहती है कि पार्टी की उम्मीदों और जरूरतों को पूरा करते हुए, अपने निजी राजनीतिक भविष्य की जरूरतों का इंतजाम करते हुए किस तरह सरकार चलाई जाए कि बदनामी इतनी न हो कि अगले चुनाव में मुश्किल हो जाए। सत्तारूढ़ नेताओं के सामने यह छोटी चुनौती नहीं रहती है। कुछ पार्टियों की सरकारें ऐसी भी रहती हैं जो अपने आपको अपने राष्ट्रीय संगठन के लिए एटीएम साबित करने में गर्व हासिल करती हैं।
अब चूंकि छत्तीसगढ़ में सरकार का कार्यकाल पर्याप्त हो चुका है, यह धीरे-धीरे ढाई बरस तक पहुंचने को है, और इसके बाद का कामकाज, सरकार की छवि, चुनाव तक एक माहौल बनाने में काम आने वाली बातें हैं। अब तक की योजनाओं का तजुर्बा, वित्तीय प्रबंधन, यह सब कुछ अब पर्याप्त देखा जा चुका है। छत्तीसगढ़ राजनीतिक रूप से देश में सबसे अधिक स्थिरता वाला प्रदेश है। पिछले 25 बरस के अस्तित्व में कभी इक्का-दुक्का मंत्री के हटने के अलावा कोई अस्थिरता नहीं आई है। हर मुख्यमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा किया है, और डॉ.रमन सिंह तो लगातार तीन कार्यकाल से देश के गिने-चुने ऐसे नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में कुल दो पार्टियों की राजनीति और राज वाले छत्तीसगढ़ में सरकार के राजनीतिक और प्रशासनिक फैसले लेना कई दूसरे प्रदेशों के मुकाबले आसान है। यहां कोई गठबंधन नहीं है, कि गठबंधन के साथियों के साथ समझौते करने हैं। यहां तस्वीर बिल्कुल साफ है, दो पार्टी, दोनों राष्ट्रीय पार्टियां, दोनों के मुख्यमंत्री अब तक पूरे-पूरे कार्यकाल वाले रहे, और इसलिए प्रशासन कहें, या नौकरशाही कहें, उसके साथ निर्वाचित नेताओं के काम करने में भी एक स्थाई निरंतरता बनी रही है। इन सबको देखते हुए यह राज्य देश के बहुत से अस्थिर और भूकंपीय राज्यों के मुकाबले बड़ा अच्छा प्रदेश है। यहां पर नेताओं और अफसरों के बीच में एक बेहतर तालमेल होने की अच्छी मजबूत जमीन है, अब उस जमीन पर इनके बीच काम कैसा हो, यह इन दोनों तबकों पर निर्भर करता है, खासकर निर्वाचित तबके पर।
छत्तीसगढ़ के कल के शायद 43 आईएएस अफसरों के तबादलों को लेकर हमने आज की यह चर्चा शुरू की है, और वही का वही मंत्रिमंडल बना हुआ है, अफसरों में फेरबदल होते भी रहना चाहिए, ताकि हर विभाग या जिले को उस अफसर की कल्पनाशीलता और क्षमता का सबसे अच्छा हिस्सा मिल जाए। लेकिन इसके साथ ही तकरीबन तमाम अफसरों में हर दो-तीन बरस में फेरबदल भी होना चाहिए, ताकि वे प्रशासन या अपने विभाग के मुखिया बनने की नौबत आने तक अधिकतर विभागों या शाखाओं के कामकाज से अच्छी तरह वाकिफ रहें। अब यह कल्पना नहीं की जा सकती कि किसी अफसर के मुख्य सचिव बनने तक उसने सरकार के कुल तीन या चार विभागों में पूरी नौकरी खपा दी हो, वह बहुत बुरी प्रशासनिक नौबत रहेगी। इसलिए हम फेरबदल को किसी सजा या पुरस्कार की तरह नहीं देखते, बल्कि यह होते रहना चाहिए। हमने कुछ बहुत ही काबिल अफसरों को महत्वहीन समझे जाने वाले विभागों में काम करने पर उन्हें बहुत महत्वपूर्ण विभाग बनाते हुए भी देखा है। ऐसा ही सुधार कुछ बहुत काबिल मंत्री भी अपने विभागों में कर सकते हैं। अफसर और मंत्री एक-दूसरे से लगातार सीखते हुए चल सकते हैं, बस मंत्रियों को यह याद रखना चाहिए कि पांच बरस बाद के चुनाव में उनके अफसर उम्मीदवार नहीं रहेंगे, जनता के बीच उन्हें अपने पार्टी के निशान को लेकर अकेले ही जाना पड़ सकता है। भारतीय लोकतंत्र में यह जटिल व्यवस्था जितनी जटिल है, उतनी ही दिलचस्प भी है। जिस ब्रिटिश व्यवस्था के नक्शेकदम पर यह नौकरशाही बनी है, उसमें एक तीखे व्यंग्य की शैली पर बने हुए एक टीवी सीरियल, यस मिनिस्टर, को देखना चाहिए। मिनिस्टरों को भी, और अफसरों को भी।


