संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विकलांग और विचलित महिला के घड़ों की दुकान पर मार करती फौलादी मशीनी बांह की खुशी...
सुनील कुमार ने लिखा है
12-May-2026 3:43 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : विकलांग और विचलित महिला के घड़ों की दुकान पर मार करती फौलादी मशीनी बांह की खुशी...

महाराष्ट्र के छत्रपति शंभाजी नगर का एक वीडियो आया है, वहां सडक़ किनारे अवैध कब्जे हटाते हुए सरकारी दानवाकर मशीन बुरी तरह से विकलांग एक महिला के घड़ों की दुकान को तोड़ रही है। मशीन की दानवाकार बांह से घड़ों को तोडऩा मानो काफी न हो, कर्मचारी भी लाठियां लेकर घड़े तोड़ रहे हैं और पटक-पटककर भी। इस वीडियो को देखना इतना तकलीफदेह है कि यह महिला जो शारीरिक रूप से विकलांग और मानसिक रूप से कुछ कमजोर दिख रही है, वह टूटे हुए घड़ों के टुकड़े उठा-उठाकर रख रही है जिसकी कि कोई कीमत नहीं रह गई है। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शहर की महिला मेयर सडक़ किनारे से ठेलों को हटाते हुए यह धमकी देते दिखती हैं कि उनका हाथ उठ जाएगा, वे हाथ उठाती भी हैं, हवा में मारने के लिए क्योंकि ठेले वाला कुछ दूर था। कई दूसरे शहरों के ऐसे वीडियो आते हैं जिनमें म्युनिसिपल के लोग, या पुलिस कर्मचारी सडक़ किनारे से सब्जी वालों के ठेले पलटाते दिखते हैं, या टोकरियों को लात मार-मारकर सब्जियां बिखराते हुए। यह भी तब होता है जब वे रहमदिल होते हैं, वरना उनकी लाठियां लोगों की पीठ पर भी पड़ती हैं।

यह किस तरह का देश है जिसमें मेहनत मजदूरी करके सार्वजनिक जगह पर परिवार चलाने लायक कमाई करने पर तो सरकार की मार पड़ती है, लेकिन जहां बड़े-बड़े नामी-गिरामी कारखाने सैकड़ों-हजारों एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं, वहां उन पर सरकार से लेकर अदालत तक सबकी मेहरबानी रहती है। शहरों में बड़े-बड़े कारोबारी कॉम्प्लेक्स अवैध निर्माण से बनते हैं, और म्युनिसिपल नियमों के खिलाफ जाकर उनके साथ एक फर्जी किस्म का समझौता करके उन्हें नियमित कर देती हैं। जिस तरह एक सांसद या विधायक का दल-बदल अपात्रता पाता है, लेकिन दो-तिहाई सांसद विधायक अलग होने पर उनका बाल भी बांका नहीं होता, बख्शीश में सूटकेस भी मिल जाते हैं, वैसे देश में दिन के कुछ घंटों के लिए सडक़ किनारे ठेले लगाने, या एक मामूली सी कमजोर गुमटी लगाकर छोटी सी मजदूरी कमाने पर सरकारी लाठियां चलती हैं।

भारत में यह पूरा सिलसिला इतना अमानवीय है कि ऐसा लगता है कि इस देश में गरीब दूसरे दर्जे के नागरिक हैं, और नियम-कानून तोडऩे वाले पैसे वाले लोग प्रीमियम दर्जे के भारतीय हैं। लेकिन अफसरों और सरकारी अमले का, निर्वाचित नेताओं का नागरिकता का दर्जा चाहे अलग हो, उनके भीतर इंसानियत का दर्जा बड़ा ही घटिया रहता है। सडक़ किनारे घड़े बेचकर कोई महिला लखपति या करोड़पति नहीं हो सकती, वह अधिक से अधिक गर्मी के कुछ महीनों में बाकी के कुछ महीनों के लायक थोड़ा सा पैसा बचा सकती है। लेकिन उसके घड़ों को तोडऩे में जो सुख जिन लोगों को मिलता है, वे मनोविज्ञान की जुबान में परपीडक़ रहते हैं, यानी दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर खुद सुख पाने वाले। और यह सब उस देश में है, जिसमें हर चौथे पेड़ के नीचे सिंदूरपुते ईश्वर बैठे हैं, हर कुछ किलोमीटर पर मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च हैं, जहां सरकारी अमला तरह-तरह के धार्मिक प्रतीक ओढ़े हुए जनता पर जुल्म करने पर आमादा रहता है। और अब तो एक नई बात भी हो गई है, देश का सुप्रीम कोर्ट जनहित याचिका सुनने से कतराने लगा है, उसके खिलाफ कहने लगा है, जुर्माने लगाने लगा है। जबकि सबसे कमजोर और सबसे गरीब की कई किस्म की आह की आवाज सुप्रीम कोर्ट तक जनहित याचिकाओं के माध्यम से ही पहुंचती थी। संसद और विधानसभाओं में खेमेबाजी इतनी अधिक हो गई है कि एक-दूसरे को सुनने को बजाय, एक-दूसरे को अनसुना करने के लिए पार्टी स्तर की गिरोहबंदी होती है, और सबसे गरीब की तकलीफ की बात सदनों में उठना बंद सरीखा हो गया है। कई सदन तो ऐसे हो गए हैं जहां पर बहुत से सदस्यों की जनहित के किसी मुद्दे को उठाने से अधिक दिलचस्पी इस बात पर रहती है कि किस कुबेर के किस मुद्दे को न उठाकर उस कुबेर की सेवा की जाए। जब देश की सदनें ऐसे अंदाज में काम करने लगें, सुप्रीम कोर्ट को जनहित याचिकाओं से परहेज होने लगे, बड़े मीडिया को कारोबार के अभिनंदन और स्तुति से बड़ा जनहित और कुछ न लगे, तब विकलांग और विचलित गरीब घड़ेवाली पर बरसती फौलादी मार शायद बहुत सारे लोगों का ध्यान भी न खींच पाए। वह विचलित महिला घड़ों के टूटे हुए टुकड़े बटोरते हुए कुछ वैसी ही दिखती है जैसी फिलिस्तीन के गाजा में मलबे के बीच अपने मरे हुए बच्चों की गुडिय़ा थामे हुए उनकी मां बैठी रहती है।

यह देश रह किसके लिए गया है? बहुत से लोगों को, खासकर उन लोगों को जो कि पढ़ते हैं, और खबरों को देखते हैं, उन्हें यह सवाल नाजायज लग सकता है कि देश तो यहां के सभी लोगों के लिए है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह देश सडक़ किनारे बिना किसी अवैध निर्माण के खुले आसमान तले घड़े बेचकर जिंदा रहने वाली महिला का भी है? क्या यह देश किसी बचे हुए पेड़ के साए में बैठकर जूते सुधारने वाले का भी है? क्या यह देश सडक़ किनारे चाट-गुपचुप बेचकर परिवार का गुजारा चलाने वाले का भी है? या फिर यह देश उन बड़े होटल-मालिकों का ही है जिनके लिए समंदर और नदियों के, जंगल और पहाड़ों के कानूनों को भी पलट दिया जाता है? ये सवाल देश के भीतर संपन्न और विपन्न, राजा-तबके, और प्रजा-तबके के बीच का एक खाई जैसा गहरा, और समंदर जैसा चौड़ा फासला भी बताता है। यह सवाल निराश करता है कि इसके लिए अब अपनी ही संतानों के बीच सगी और सौतेली जैसा फर्क हो गया है, संपन्न और ताकतवर संतानें सगी, विपन्न और कमजोर तबके की संतानें सौतेली।

जिन निर्वाचित नेताओं से भारत के ऐसे लोकतांत्रिक विरोधाभासों की बात उठाने की उम्मीद की जाती है, वे सूटकेस उठाने में व्यस्त हैं। जिनको अब भी इस लोकतंत्र पर आस्था है, उनके अंधविश्वास पर हम उन्हें बधाई देने के अलावा और क्या कर सकते हैं?

यह देश रह किसके लिए गया है? बहुत से लोगों को, खासकर उन लोगों को जो कि पढ़ते हैं, और खबरों को देखते हैं, उन्हें यह सवाल नाजायज लग सकता है कि देश तो यहां के सभी लोगों के लिए है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह देश सडक़ किनारे बिना किसी अवैध निर्माण के खुले आसमान तले घड़े बेचकर जिंदा रहने वाली महिला का भी है? क्या यह देश किसी बचे हुए पेड़ के साए में बैठकर जूते सुधारने वाले का भी है? क्या यह देश सडक़ किनारे चाट-गुपचुप बेचकर परिवार का गुजारा चलाने वाले का भी है? या फिर यह देश उन बड़े होटल-मालिकों का ही है जिनके लिए समंदर और नदियों के, जंगल और पहाड़ों के कानूनों को भी पलट दिया जाता है? ये सवाल देश के भीतर संपन्न और विपन्न, राजा-तबके, और प्रजा-तबके के बीच का एक खाई जैसा गहरा, और समंदर जैसा चौड़ा फासला भी बताता है। यह सवाल निराश करता है कि इसके लिए अब अपनी ही संतानों के बीच सगी और सौतेली जैसा फर्क हो गया है, संपन्न और ताकतवर संतानें सगी, विपन्न और कमजोर तबके की संतानें सौतेली।

जिन निर्वाचित नेताओं से भारत के ऐसे लोकतांत्रिक विरोधाभासों की बात उठाने की उम्मीद की जाती है, वे सूटकेस उठाने में व्यस्त हैं। जिनको अब भी इस लोकतंत्र पर आस्था है, उनके अंधविश्वास पर हम उन्हें बधाई देने के अलावा और क्या कर सकते हैं? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


अन्य पोस्ट